Monday, March 23

मोहब्बत से परहेज़



सुकून के बारे में 
हम चाहते ही नहीं कि ये दिल कहीं खो जाए, दिल खोएगा तो हर पल तेरी याद सताएगी, 
याद सताएगी तो हर आहट पे तू याद आएगी, 
तेरी याद आएगी तो सुकून-ए-दिल चला जाएगा, 
जब सुकून ही न रहा तो चैन कहाँ से आएगा? 
हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!

वक्त की बर्बादी 
हम चाहते ही नहीं मोहब्बत का सिलसिला शुरू हो, 
सिलसिला शुरू हुआ तो बातों का दौर बढ़ेगा, 
बातों का दौर बढ़ा तो वक्त हाथों से निकलेगा, 
वक्त निकला तो फिर काम अधूरा रह जाएगा, 
अधूरा काम रहा तो तू खुद से नज़रें चुराएगा। 
हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!

 तन्हाई का डर 
हम चाहते ही नहीं तेरा साथ हमें मिल जाए, 
 साथ मिला तो फिर साथ चलने की आदत होगी, 
 आदत हुई तो फिर बिछड़ने में कयामत होगी, 
 बिछड़ गए तो तन्हाई हमें ज़िंदा जलाएगी, 
 मरने से बेहतर है कि ये नौबत ही न आएगी। 
 हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!

आँखों की नमी
 हम चाहते ही नहीं कि तुझसे आँखें चार हों, 
आँखें मिलीं तो फिर ख़्वाबों का घर सजेगा, 
ख़्वाब सजे तो हकीकत से रिश्ता टूटेगा, 
रिश्ता टूटा तो फिर आँखों में पानी आएगा, 
इतना रोयेगा कि सारा शहर जान जाएगा। 
हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!

दुनिया के सवाल 
हम चाहते ही नहीं कि हम बदनाम हो जाएं, बदनाम हुए तो फिर दुनिया सवाल पूछेगी, 
सवाल पूछा तो फिर जुबां लड़खड़ाएगी, 
जुबां लड़खड़ाई तो राज़ खुलकर आएगा, 
राज़ खुला तो तू महफ़िल में न जा पाएगा। 
हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!

नींद और बेकरारी 
हम चाहते ही नहीं कि तू नींदों में शामिल हो, नींदों में आए तो फिर जागना मुहाल होगा, 
जागे रहे तो तेरी यादों में बुरा हाल होगा, 
हाल बिगड़ा तो फिर चेहरा पीला पड़ जाएगा, 
इतनी उलझन में तू खुद को भूल जाएगा। 
हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!

वादों का बोझ 
हम चाहते ही नहीं कि कोई वादा वफ़ा करें, 
वादा किया तो उसे निभाने की फ़िक्र होगी, 
फ़िक्र हुई तो बस तेरे ही नाम का ज़िक्र होगा, 
ज़िक्र बढ़ा तो ये दिल दुनिया से कट जाएगा, 
दुनिया से कटे तो तू बिलकुल अकेला रह जाएगा। 
हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!

उम्मीद की टूटन 
हम चाहते ही नहीं कि तुझसे कोई उम्मीद हो, उम्मीद हुई तो फिर इंतज़ार करना पड़ेगा, 
इंतज़ार किया तो हर लम्हा मरना पड़ेगा, 
इंतज़ार न खत्म हुआ तो यकीन टूट जाएगा, 
यकीन टूटा तो खुदा भी हमसे रूठ जाएगा। 
हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!

 रश्क और जलन 
हम चाहते ही नहीं कि दिल में कोई जलन हो, जलन हुई तो तू गैरों से भी कतराएगा, 
 कतराया तो फिर अपनों को भी रुलाएगा, 
 अपनों को रुलाकर तू कहाँ चैन पाएगा, 
 इस जलन में तू राख की तरह जल जाएगा। 
 हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!

आखिरी अंजाम 
हम चाहते ही नहीं कि ये दास्तां शुरू हो, 
दास्तां शुरू हुई तो फिर अंत भी तो होगा, 
अंत हुआ तो दिल के टुकड़ों का अंबार होगा, 
टुकड़े समेटने में सारा जीवन गुज़र जाएगा, 
जिंदगी बीत गई तो फिर क्या खाक तू जी पाएगा? 
हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!

उलझन और इनकार

हम चाहते ही नहीं कि ये सिलसिला आगे बढ़े, 
सिलसिला बढ़ा तो मुलाकातों की प्यास जागेगी, 
प्यास जागी तो फिर रूह को तेरी तलाश होगी, 
तलाश हुई तो फिर ये दिल काबू में न रहेगा, 
जो काबू में न रहा तो ये दर-दर भटकता फिरेगा। 
हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!

हम चाहते ही नहीं कि तुम्हारी सादगी हमें लुभाए, 
सादगी ने लुभाया तो फिर तारीफों का दौर चलेगा, 
दौर चला तो फिर लफ़्ज़ों में तेरा ही अक्स ढलेगा, 
अक्स ढला तो फिर हम ख़ुद को भूल जाएंगे, 
खुद को भूलकर हम आखिर किधर जाएंगे? 
हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!

हम चाहते ही नहीं कि खामोशी में तेरी आवाज़ गूँजे, 
आवाज़ गूँजी तो फिर तनहाई का शोर बढ़ जाएगा, 
शोर बढ़ा तो फिर सन्नाटा भी हमें डराएगा, 
सन्नाटा डराया तो फिर हम अपनों से कतराएंगे, 
कतराए तो फिर हम अपनी ही नज़रों से गिर जाएंगे। 
हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!

यादों का बोझ

हम चाहते ही नहीं कि तुमसे कोई बात हो, 
बात हुई तो फिर बातों का सिलसिला बढ़ेगा, 
सिलसिला बढ़ा तो मुलाकातों की हसरत होगी, 
हसरत हुई तो फिर जुदाई का डर सताएगा, 
जुदाई का डर सताया तो इंसान जीते-जी मर जाएगा। 
हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!


पराया रिश्ता

हम चाहते ही नहीं कि कोई पराया अपना हो जाए, 
अपना हुआ तो फिर उससे उम्मीदें बँध जाएंगी, 
उम्मीदें बँधी तो फिर फरमाइशों का सिलसिला चलेगा, 
सिलसिला चला तो फिर हक जताने की बात आएगी, 
हक जताया तो फिर पाबंदियां भी साथ लाएंगी। 
हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!

हम चाहते ही नहीं कि परायों से दिल के तार जुड़ें, 
तार जुड़े तो फिर खामोशी का मतलब समझ आएगा, 
मतलब समझ आया तो फिर हम उसकी फिक्र में जिएंगे, 
फिक्र हुई तो फिर अपनी खुशियाँ दांव पर लगेंगी, 
खुशियाँ दांव पर लगीं तो फिर मन उदास हो जाएगा। 
हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!

हम चाहते ही नहीं कि कोई पराया हमारी आदत बने, 
आदत बनी तो फिर उसके बगैर जीना मुश्किल होगा, 
मुश्किल हुआ तो फिर हर सांस पर उसका नाम होगा, 
नाम हुआ तो फिर ये दुनिया इसे 'पागलपन' कहेगी, 
ज़माने ने पागल कहा तो फिर ये रिश्ता टूट जाएगा, 
रिश्ता टूटा तो फिर पराया तो पराया, 
अपना भी कोई न रहेगा। हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!

मिट्टी का घर

हम चाहते ही नहीं कि मिट्टी का कोई घर बन जाए, 
घर बना तो फिर उसे सहेजने की फ़िक्र होगी, 
फ़िक्र हुई तो फिर बारिशों से डर लगेगा, 
डर लगा तो फिर हर बूंद कलेजा चीर जाएगी, 
बूँदें गिरीं तो फिर दीवारें दरकने लगेंगी, 
दीवारें दरकीं तो फिर छत गिरने का खौफ होगा, 
खौफ हुआ तो फिर रातों की नींद उड़ जाएगी। 
हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!

हम चाहते ही नहीं कि मिट्टी की खुशबू मन को भाए, 
खुशबू भाई तो फिर जड़ों से जुड़ने का मोह जागेगा, 
मोह जागा तो फिर पक्के मकानों से नफरत होगी, 
नफरत हुई तो फिर दुनिया हमें पिछड़ा कहेगी, 
दुनिया ने टोका तो फिर स्वाभिमान को चोट लगेगी, 
चोट लगी तो फिर ये कच्चा घर बोझ बन जाएगा। 
हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!

हम चाहते ही नहीं कि इस घर में यादों के दीये जलें, 
दीये जले तो फिर रौशनी से साये बनेंगे, 
साये बने तो फिर तन्हाई और डराएगी, 
तन्हाई डराई तो फिर हम किसी का साथ ढूंढेंगे, 
साथ ढूंढा और न मिला तो फिर ये घर खंडहर हो जाएगा, 
खंडहर हुआ तो फिर इसमें यादों के सिवा कुछ न बचेगा, 
यादें बचीं तो फिर इंसान जीते-जी दफ़न हो जाएगा। 
हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!


सब चले जाते हैं

हम चाहते ही नहीं कि कोई दिल के करीब आए, 
करीब आया तो फिर साथ रहने की कसम होगी, 
कसम हुई तो फिर रूह को उसकी आदत होगी, 
आदत हुई तो फिर बिछड़ने का खौफ जागेगा, 
खौफ जागा तो फिर हर लम्हा शंका में बीतेगा, 
शंका हुई तो फिर रिश्ते में कड़वाहट आएगी, 
कड़वाहट आई तो फिर वो छोड़कर चला जाएगा, 
जब सब चले ही जाते हैं, 
तो कोई आए ही क्यों? 
हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!

हम चाहते ही नहीं कि किसी से उम्मीद-ए-वफा हो, 
उम्मीद हुई तो फिर इंतज़ार का दीया जलेगा, 
दीया जला तो फिर काली रातों से बैर होगा, 
बैर हुआ तो फिर पलकों पर नमी ठहर जाएगी, 
नमी ठहरी तो फिर चेहरा यादों का घर बन जाएगा, 
जब घर उजड़ना ही है, 
तो फिर ये घर बसे ही क्यों? 
हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!

हम चाहते ही नहीं कि महफिल में रौनक आए, 
रौनक आई तो फिर चिरागों का साथ होगा, 
साथ हुआ तो फिर बुझने का वक्त भी आएगा, 
वक्त आया तो फिर अंधेरा और गहरा लगेगा, 
अंधेरा हुआ तो फिर साया भी साथ छोड़ जाएगा, 
जब अंत में तन्हा ही रहना है, 
तो कोई मिले ही क्यों? 
हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!

_वैभव कुमार सेजवार_
#SejwarInkOfficial

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कुछ लोग बिछड़कर भी अपने रह जाते हैं... हर प्रेम... मंज़िल तक पहुँचे... यह ज़रूरी नहीं होता... कुछ प्रेम... रास्तों में बिछड़कर भी... उम्र भर...