Wednesday, March 4

दोस्ती का रिश्ता (कविता)


ये कच्ची डोर है लेकिन, 
बड़ी मज़बूत होती है, 
जहाँ उम्मीद खो जाए, 
वहीं ये दूत होती है। 
हज़ारों हमसफ़र मिलते, 
मगर हर कोई यार नहीं, 
बिना बोले जो सब समझे, 
वही तो भूत होती है॥

कि जैसे धूप के मौसम, 
में कोई छाँव मिल जाए, 
कि जैसे प्यासे होंठों, 
को कहीं दरियाव मिल जाए। 
सफर में साथ चलने का, 
जो वादा उम्र भर कर ले, 
तो जैसे डूबती नैया, 
को कोई नाव मिल जाए॥

भले ही वक़्त की धूलें, 
पुराने खत मिटा देंगी, 
भले ही भीड़ दुनिया की, 
नया चेहरा दिखा देंगी। 
मगर जो दिल से जुड़ते हैं, 
वो कब अलग होते हैं, 
दुआएँ यार की हरदम, 
हमें मंज़िल दिखा देंगी॥


लेखक:- वैभव कुमार सेजवा र

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