ये रास्ते बेज़ुबान नहीं, इनमें हजारों कहानियाँ दफन हैं,
कहीं संघर्ष का पसीना है, तो कहीं यादों का कफन है।
मैंने रास्तों से पूछा कि तुम इतने टेढ़े-मेढ़े क्यों हो?
रास्ता बोला—सीधे चलने वालों के अरमान थोड़े कच्चे होते हैं।
सीख पहली ये मिली कि हर चमकता पत्थर मंज़िल नहीं,
हर हाथ मिलाने वाला इंसान, सफर में शामिल नहीं।
घने जंगलों ने सिखाया कि ख़ामोशी में भी एक शोर है,
अपनी अंतरात्मा को सुनना ही, असली ज्ञान की ओर है।
नदियों के किनारे चलते हुए ये बात समझ में आई,
कि बहते रहना ही जीवन है, रुकना तो बस तन्हाई है।
ऊँचे पहाड़ों ने कहा कि सिर हमेशा ऊँचा रखना,
मगर पैरों को हमेशा ज़मीन की मिट्टी से जोड़े रखना।
कुछ रास्ते इतने वीरान थे कि खुद से बातें करनी पड़ी,
अपनी ही परछाईं के साथ, घंटों तक लंबी बहसें चली।
वहाँ सीखा कि सबसे मुश्किल काम है खुद को पहचानना,
भीड़ में तो आसान है, किसी और के पीछे हो लेना।
सीखा कि जो रास्ता आसान दिखे, वो अक्सर भटकता है,
जो कठिन और पथरीला हो, वही मंज़िल तक ले जाता है।
हर पत्थर जो पैरों में लगा, उसने एक नई राह दिखाई,
ठोकर खाकर ही मैंने, मंज़िलों की सही कीमत पाई।
रास्तों ने ये भी सिखाया कि कभी पीछे मुड़कर न देखना,
जो बीत गया वो धूल है, उसे बस यादों में ही रखना।
मुसाफिर वही है जो रास्तों को अपना घर मान ले,
नुकसान में भी नफ़ा और काँटों में भी गुलाब जान ले।
राहों की ये सीख मेरे जीवन का आधार बनेगी,
हर मुश्किल घड़ी में, ये बनकर मेरी पतवार चलेगी।
कलम उठाता हूँ और इन रास्तों को सलाम करता हूँ,
अपनी हर सीख को मैं, ज़िंदगी के नाम करता हूँ।
लेखक: वैभव कुमार सेजवार
SejwarInkOfficial
No comments:
Post a Comment