Monday, March 23

मोहब्बत से परहेज़



सुकून के बारे में 
हम चाहते ही नहीं कि ये दिल कहीं खो जाए, दिल खोएगा तो हर पल तेरी याद सताएगी, 
याद सताएगी तो हर आहट पे तू याद आएगी, 
तेरी याद आएगी तो सुकून-ए-दिल चला जाएगा, 
जब सुकून ही न रहा तो चैन कहाँ से आएगा? 
हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!

वक्त की बर्बादी 
हम चाहते ही नहीं मोहब्बत का सिलसिला शुरू हो, 
सिलसिला शुरू हुआ तो बातों का दौर बढ़ेगा, 
बातों का दौर बढ़ा तो वक्त हाथों से निकलेगा, 
वक्त निकला तो फिर काम अधूरा रह जाएगा, 
अधूरा काम रहा तो तू खुद से नज़रें चुराएगा। 
हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!

 तन्हाई का डर 
हम चाहते ही नहीं तेरा साथ हमें मिल जाए, 
 साथ मिला तो फिर साथ चलने की आदत होगी, 
 आदत हुई तो फिर बिछड़ने में कयामत होगी, 
 बिछड़ गए तो तन्हाई हमें ज़िंदा जलाएगी, 
 मरने से बेहतर है कि ये नौबत ही न आएगी। 
 हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!

आँखों की नमी
 हम चाहते ही नहीं कि तुझसे आँखें चार हों, 
आँखें मिलीं तो फिर ख़्वाबों का घर सजेगा, 
ख़्वाब सजे तो हकीकत से रिश्ता टूटेगा, 
रिश्ता टूटा तो फिर आँखों में पानी आएगा, 
इतना रोयेगा कि सारा शहर जान जाएगा। 
हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!

दुनिया के सवाल 
हम चाहते ही नहीं कि हम बदनाम हो जाएं, बदनाम हुए तो फिर दुनिया सवाल पूछेगी, 
सवाल पूछा तो फिर जुबां लड़खड़ाएगी, 
जुबां लड़खड़ाई तो राज़ खुलकर आएगा, 
राज़ खुला तो तू महफ़िल में न जा पाएगा। 
हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!

नींद और बेकरारी 
हम चाहते ही नहीं कि तू नींदों में शामिल हो, नींदों में आए तो फिर जागना मुहाल होगा, 
जागे रहे तो तेरी यादों में बुरा हाल होगा, 
हाल बिगड़ा तो फिर चेहरा पीला पड़ जाएगा, 
इतनी उलझन में तू खुद को भूल जाएगा। 
हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!

वादों का बोझ 
हम चाहते ही नहीं कि कोई वादा वफ़ा करें, 
वादा किया तो उसे निभाने की फ़िक्र होगी, 
फ़िक्र हुई तो बस तेरे ही नाम का ज़िक्र होगा, 
ज़िक्र बढ़ा तो ये दिल दुनिया से कट जाएगा, 
दुनिया से कटे तो तू बिलकुल अकेला रह जाएगा। 
हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!

उम्मीद की टूटन 
हम चाहते ही नहीं कि तुझसे कोई उम्मीद हो, उम्मीद हुई तो फिर इंतज़ार करना पड़ेगा, 
इंतज़ार किया तो हर लम्हा मरना पड़ेगा, 
इंतज़ार न खत्म हुआ तो यकीन टूट जाएगा, 
यकीन टूटा तो खुदा भी हमसे रूठ जाएगा। 
हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!

 रश्क और जलन 
हम चाहते ही नहीं कि दिल में कोई जलन हो, जलन हुई तो तू गैरों से भी कतराएगा, 
 कतराया तो फिर अपनों को भी रुलाएगा, 
 अपनों को रुलाकर तू कहाँ चैन पाएगा, 
 इस जलन में तू राख की तरह जल जाएगा। 
 हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!

आखिरी अंजाम 
हम चाहते ही नहीं कि ये दास्तां शुरू हो, 
दास्तां शुरू हुई तो फिर अंत भी तो होगा, 
अंत हुआ तो दिल के टुकड़ों का अंबार होगा, 
टुकड़े समेटने में सारा जीवन गुज़र जाएगा, 
जिंदगी बीत गई तो फिर क्या खाक तू जी पाएगा? 
हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!

उलझन और इनकार

हम चाहते ही नहीं कि ये सिलसिला आगे बढ़े, 
सिलसिला बढ़ा तो मुलाकातों की प्यास जागेगी, 
प्यास जागी तो फिर रूह को तेरी तलाश होगी, 
तलाश हुई तो फिर ये दिल काबू में न रहेगा, 
जो काबू में न रहा तो ये दर-दर भटकता फिरेगा। 
हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!

हम चाहते ही नहीं कि तुम्हारी सादगी हमें लुभाए, 
सादगी ने लुभाया तो फिर तारीफों का दौर चलेगा, 
दौर चला तो फिर लफ़्ज़ों में तेरा ही अक्स ढलेगा, 
अक्स ढला तो फिर हम ख़ुद को भूल जाएंगे, 
खुद को भूलकर हम आखिर किधर जाएंगे? 
हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!

हम चाहते ही नहीं कि खामोशी में तेरी आवाज़ गूँजे, 
आवाज़ गूँजी तो फिर तनहाई का शोर बढ़ जाएगा, 
शोर बढ़ा तो फिर सन्नाटा भी हमें डराएगा, 
सन्नाटा डराया तो फिर हम अपनों से कतराएंगे, 
कतराए तो फिर हम अपनी ही नज़रों से गिर जाएंगे। 
हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!

यादों का बोझ

हम चाहते ही नहीं कि तुमसे कोई बात हो, 
बात हुई तो फिर बातों का सिलसिला बढ़ेगा, 
सिलसिला बढ़ा तो मुलाकातों की हसरत होगी, 
हसरत हुई तो फिर जुदाई का डर सताएगा, 
जुदाई का डर सताया तो इंसान जीते-जी मर जाएगा। 
हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!


पराया रिश्ता

हम चाहते ही नहीं कि कोई पराया अपना हो जाए, 
अपना हुआ तो फिर उससे उम्मीदें बँध जाएंगी, 
उम्मीदें बँधी तो फिर फरमाइशों का सिलसिला चलेगा, 
सिलसिला चला तो फिर हक जताने की बात आएगी, 
हक जताया तो फिर पाबंदियां भी साथ लाएंगी। 
हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!

हम चाहते ही नहीं कि परायों से दिल के तार जुड़ें, 
तार जुड़े तो फिर खामोशी का मतलब समझ आएगा, 
मतलब समझ आया तो फिर हम उसकी फिक्र में जिएंगे, 
फिक्र हुई तो फिर अपनी खुशियाँ दांव पर लगेंगी, 
खुशियाँ दांव पर लगीं तो फिर मन उदास हो जाएगा। 
हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!

हम चाहते ही नहीं कि कोई पराया हमारी आदत बने, 
आदत बनी तो फिर उसके बगैर जीना मुश्किल होगा, 
मुश्किल हुआ तो फिर हर सांस पर उसका नाम होगा, 
नाम हुआ तो फिर ये दुनिया इसे 'पागलपन' कहेगी, 
ज़माने ने पागल कहा तो फिर ये रिश्ता टूट जाएगा, 
रिश्ता टूटा तो फिर पराया तो पराया, 
अपना भी कोई न रहेगा। हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!

मिट्टी का घर

हम चाहते ही नहीं कि मिट्टी का कोई घर बन जाए, 
घर बना तो फिर उसे सहेजने की फ़िक्र होगी, 
फ़िक्र हुई तो फिर बारिशों से डर लगेगा, 
डर लगा तो फिर हर बूंद कलेजा चीर जाएगी, 
बूँदें गिरीं तो फिर दीवारें दरकने लगेंगी, 
दीवारें दरकीं तो फिर छत गिरने का खौफ होगा, 
खौफ हुआ तो फिर रातों की नींद उड़ जाएगी। 
हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!

हम चाहते ही नहीं कि मिट्टी की खुशबू मन को भाए, 
खुशबू भाई तो फिर जड़ों से जुड़ने का मोह जागेगा, 
मोह जागा तो फिर पक्के मकानों से नफरत होगी, 
नफरत हुई तो फिर दुनिया हमें पिछड़ा कहेगी, 
दुनिया ने टोका तो फिर स्वाभिमान को चोट लगेगी, 
चोट लगी तो फिर ये कच्चा घर बोझ बन जाएगा। 
हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!

हम चाहते ही नहीं कि इस घर में यादों के दीये जलें, 
दीये जले तो फिर रौशनी से साये बनेंगे, 
साये बने तो फिर तन्हाई और डराएगी, 
तन्हाई डराई तो फिर हम किसी का साथ ढूंढेंगे, 
साथ ढूंढा और न मिला तो फिर ये घर खंडहर हो जाएगा, 
खंडहर हुआ तो फिर इसमें यादों के सिवा कुछ न बचेगा, 
यादें बचीं तो फिर इंसान जीते-जी दफ़न हो जाएगा। 
हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!


सब चले जाते हैं

हम चाहते ही नहीं कि कोई दिल के करीब आए, 
करीब आया तो फिर साथ रहने की कसम होगी, 
कसम हुई तो फिर रूह को उसकी आदत होगी, 
आदत हुई तो फिर बिछड़ने का खौफ जागेगा, 
खौफ जागा तो फिर हर लम्हा शंका में बीतेगा, 
शंका हुई तो फिर रिश्ते में कड़वाहट आएगी, 
कड़वाहट आई तो फिर वो छोड़कर चला जाएगा, 
जब सब चले ही जाते हैं, 
तो कोई आए ही क्यों? 
हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!

हम चाहते ही नहीं कि किसी से उम्मीद-ए-वफा हो, 
उम्मीद हुई तो फिर इंतज़ार का दीया जलेगा, 
दीया जला तो फिर काली रातों से बैर होगा, 
बैर हुआ तो फिर पलकों पर नमी ठहर जाएगी, 
नमी ठहरी तो फिर चेहरा यादों का घर बन जाएगा, 
जब घर उजड़ना ही है, 
तो फिर ये घर बसे ही क्यों? 
हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!

हम चाहते ही नहीं कि महफिल में रौनक आए, 
रौनक आई तो फिर चिरागों का साथ होगा, 
साथ हुआ तो फिर बुझने का वक्त भी आएगा, 
वक्त आया तो फिर अंधेरा और गहरा लगेगा, 
अंधेरा हुआ तो फिर साया भी साथ छोड़ जाएगा, 
जब अंत में तन्हा ही रहना है, 
तो कोई मिले ही क्यों? 
हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!

_वैभव कुमार सेजवार_
#SejwarInkOfficial

मुसाफिर की डायरी


​धूल से सनी एक जिल्द, और कुछ मुड़े हुए पन्ने,
इस डायरी में दफन हैं, मेरे कल के अनगिनत सपने।
पहली तारीख को लिखा था, घर छोड़ते वक्त का वो डर,
जब आंसुओं ने भिगो दिया था, मेरा ये नया सफर।

​डायरी कहती है कि रास्ते कभी खत्म नहीं होते,
बस मुसाफिर बदल जाते हैं, और मंजर पुराने होते।
किसी पन्ने पर सूखे हुए, उस पहाड़ी फूल की गंध है,
जो बताया करता था कि आज भी, मेरी रूह कितनी स्वतंत्र है।

​एक जगह लिखा है मैंने, उस बूढ़े बरगद का किस्सा,
जिसकी छांव बना था कभी, मेरी थकान का हिस्सा।
डायरी के बीच में एक नक्शा है, जो हाथ से बनाया है,
मगर दिल के रास्तों को, इसमें कौन देख पाया है?

​कलम की स्याही कहीं फीकी, तो कहीं गाढ़ी हो गई,
जैसे मेरी जिंदगी की दास्तान, थोड़ी टेढ़ी-मेढ़ी हो गई।
वो रात जब बारिश में, एक अजनबी ने पनाह दी थी,
उस एहसान की स्याही, आज भी डायरी में ताजी सी थी।

​डायरी में दर्ज है वो पल, जब मैं हारकर रोया था,
जब मैंने अपनी कीमती चीज, किसी मोड़ पर खोया था।
मगर अगले ही पन्ने पर, फिर से उठने का संकल्प है,
मुसाफिर के पास चलने के सिवा, और क्या विकल्प है?

​लिखा है कि दुनिया कितनी बड़ी, और हम कितने छोटे हैं,
हमारे अहंकार के सिक्के, रास्तों पर कितने खोटे हैं।
हर स्टेशन की टिकट, इस डायरी के सीने में दबी है,
जैसे मेरी हर याद, इस कागज़ की दुनिया में बसी है।

​अंत में बस इतना लिखा है, कि सफर कभी थमता नहीं,
जो रुक गया वो मुसाफिर, फिर डायरी में जमता नहीं।
ये डायरी नहीं, मेरे संघर्षों का एक जीता-जागता गवाह है,
वैभव की कलम से निकला, ये मेरा ही एक गुनाह है।

​लेखक: वैभव कुमार सेजवार
#SejwarInkOfficial

Sunday, March 22

सफरनामा-ए-जिंदगी


​एक खुली किताब है, ये मेरा सफरनामा-ए-जिंदगी,

जहाँ हर कदम पर है संघर्ष, और हर मोड़ पर बंदगी।

वैभव की इस दास्ताँ में, कोई पन्ना कोरा नहीं,

ज़िंदगी ने जो सिखाया, वो किसी और ने बोला नहीं।

​शुरुआत हुई थी बचपन की, उन छोटी गलियों से,

जहाँ सपने महकते थे, फूलों की कच्ची कलियों से।

फिर जवानी के सफर में, तूफानों से नाता जुड़ गया,

जहाँ से चाहा था सीधा जाना, रास्ता वहीं से मुड़ गया।

​सफरनामे में दर्ज हैं, वो रातें जो जागकर काटीं,

वो खुशियाँ जो कम थीं, पर हमने दिल खोलकर बांटीं।

कभी लगा कि सब खत्म है, अंधेरा बहुत घना है,

पर वैभव ने जाना कि हर अंधेरा, सवेरे का ही तना है।

​लिखा है इसमें उन लोगों का नाम, जो छोड़कर चले गए,

और उनका भी शुक्रिया, जो मुश्किलों में साथ पले-बढ़े।

ज़िंदगी के इस सफरनामे में, जीत से ज़्यादा हार के किस्से हैं,

क्योंकि वही हार तो, मेरी तरक्की के सबसे बड़े हिस्से हैं।

​कभी रेगिस्तान की तपिश, तो कभी पहाड़ों की ठंडक मिली,

ज़िंदगी की इस पाठशाला में, मुझे हर तरह की दस्तक मिली।

वैभव ने सीखा कि मुसाफिर का, कोई पक्का पता नहीं होता,

जहाँ सुकून मिल जाए, वहीं उसका खुदा होता।

​ये सफरनामा अभी जारी है, अभी कई पन्ने बाकी हैं,

अभी कई रास्तों की, हसीन रंगीनियां और झांकियां बाकी हैं।

स्याही मेरी हिम्मत है, और कागज़ मेरा ये हौसला है,

तय करना है अभी मुझे, बहुत बड़ा ये फासला है।

​सफरनामा-ए-जिंदगी, एक मुसाफिर की रूह की गवाही है,

जहाँ शब्दों के रूप में, बहती हुई मेरी ही सच्चाई है।

वैभव की ये यात्रा, बस चलती ही रहेगी यूँ ही,

मंज़िल मिले न मिले, सफर की खूबसूरती रहेगी यूँ ही।

​लेखक: वैभव कुमार सेजवार

रास्तों की इबारत


​पत्थरों पर खुदी हुई, उन रास्तों की इबारत पढ़ी है,
जिंदगी की किताब शायद, इन पगडंडियों पर ही खड़ी है।
वैभव ने जब भी देखा, मील के उस पत्थर को,
लगा कि कोई पुकार रहा है, मेरे भीतर के सफर को।

​इबारत लिखी थी धूल में, कि रुकना ही मौत है,
चलते रहना ही ज़िंदगी की, सबसे बड़ी साख है।
पुराने खँडहरों ने बताया, कि वरुणा की मार क्या है,
मिट्टी में मिल जाना ही, आखिर इस संसार का सार क्या है।

​कहीं लिखा था कि यहाँ, एक राही बहुत प्यासा था,
मगर उसकी हिम्मत ही, उसकी आखिरी आशा था।
मैंने पढ़ा कि हर मोड़ पर, एक नया इम्तिहान होगा,
जो लड़ गया तूफानों से, वही बड़ा इंसान होगा।

​रास्तों की ये इबारत, स्याही से नहीं, पसीने से लिखी है,
वैभव की ये पहचान, इन्हीं टेढ़े-मेढ़े रास्तों से दिखी है।
किसी मोड़ पर लिखा था—"धैर्य ही सबसे बड़ी ताक़त है",
जल्दबाज़ी में भटक जाना, मुसाफिर की शामत है।

​पढ़ा मैंने कि मंज़िल, सिर्फ एक मुकाम का नाम है,
मगर रास्ता ही वह जगह है, जहाँ असली काम है।
इबारत में दर्ज थे, उन पैरों के निशान जो थक गए,
और उनके भी किस्से, जो नामुमकिन को भी पा गए।

​ये रास्ते नहीं, ये तो सदियों पुराने उस्ताद हैं,
इन्हीं की इबादत से, मुसाफिर आज आज़ाद हैं।
वैभव की कलम आज, इन रास्तों का शुक्रिया करती है,
इन्हीं की लिखी इबारत, मेरे शब्दों में जान भरती है।

​इबारत कहती है कि, मंज़िल तो सबको मिल जाएगी,
मगर रास्तों की ये याद, उम्र भर साथ आएगी।
लिख लो अपने दिल पर, इन रास्तों का हर एक हर्फ़,
यही तो है वो दौलत, जो नहीं होती कभी भी सर्फ़।

_वैभव कुमार सेजवार_
#SejwarInkOfficial

पग-पग सीख


​पहला कदम जब उठाया, 
तो ज़मीन ने दी ये सीख,
कि सहारा मांगना छोड़, 
मंज़िल नहीं मिलती बन भीख।

हवाओं के झोंकों ने कहा, 
कि रुख मोड़ना सीखो तुम,
मुश्किलों के तूफ़ानों में, 
थोड़ा और जुड़ना सीखो तुम।

​पग-पग पर मिले पत्थर, 
जिन्होंने संभलना सिखाया,
ठोकर खाकर गिरने वालों को, 
फिर से चलना सिखाया।

चींटियों की कतार ने, 
अनुशासन का पाठ पढ़ाया,
मेहनत की उस बूंद ने, 
सफलता का मार्ग दिखाया।

​बहते हुए झरनों ने, 
मधुर संगीत सुनाया हमें,
रुकावटों को लांघकर, 
आगे बढ़ना बताया हमें।

सूखे हुए पत्तों ने कहा, 
कि अंत भी एक शुरुआत है,
पुराना झड़ेगा तभी तो, 
नई कोपल की बात है।

​एक नन्हे से बीज ने, 
धैर्य का महत्व समझाया,
मिट्टी में दबकर भी उसने, 
खुद को पेड़ बनाया।

धूप ने तपाकर मेरी, 
सहनशक्ति को परखा है,
चांदनी ने शीतलता देकर, 
मेरा मन भी हर्षा है।

​पग-पग पर मिले लोग, 
जो कुछ न कुछ दे गए,
कोई कड़वा कड़वा सच, 
तो कोई मीठे धोखे दे गए।

सीखा कि हर मुस्कान के पीछे, 
एक कहानी होती है,
और हर खामोशी के नीचे, 
एक गहरी रूहानी होती है।

​सीखा कि बड़ा होने के लिए, 
छोटा बनना पड़ता है,
अंधेरे को मिटाने के लिए, 
खुद को जलना पड़ता है।

पैर के छालों ने कहा, 
कि तुम्हारी मेहनत सच्ची है,
मंजिल अब दूर नहीं, 
बस इरादों की डोर कच्ची है।

​हर कदम एक इम्तिहान, 
हर मोड़ एक नई किताब है,
जिंदगी के इस सफर का, 
कोई नहीं हिसाब है।

वैभव की ये 'पग-पग सीख', 
बस एक छोटा सा अर्पण है,
रास्तों के अनुभव का, 
ये एक साफ़ सा दर्पण है।

​लेखक: वैभव कुमार सेजवार
#SejwarInkOfficial

अनुभव का कारवां


​वक़्त की धूल उड़ती है और यादें साथ चलती हैं,
वैभव के इस कारवां में, नई उम्मीदें पलती हैं।
निकल पड़ा था अकेला, हाथ में बस एक ख़्वाब था,
मगर तजुर्बों का ये लश्कर, कितना ला-जवाब था।

​कारवां में शामिल हुए, वो लोग जो राह में मिले,
कुछ ने दिए ज़ख्म गहरे, कुछ ने खिलाए फूल-गिले।
धूप में जलते हुए पाँवों ने, बर्दाश्त करना सीख लिया,
भीड़ में रहकर भी रूह ने, एकांत जीना सीख लिया।

​इस कारवां का हर पड़ाव, एक नया सबक दे गया,
कोई मुस्कुराकर मिला, तो कोई आँसू दे गया।
वैभव ने देखा कि रास्तों का कोई अंत नहीं होता,
जो अनुभव से न सीखे, उसका कोई वसंत नहीं होता।

​कारवां बढ़ता रहा और बोझ कंधों का बढ़ता गया,
जैसे-जैसे मंज़िल आई, अहंकार दिल से छँटता गया।
सच्चाई का ये कारवां, झूठ की बस्ती से गुज़रा है,
तभी तो आज मेरा चेहरा, इस कदर निखरा है।

​सीखा कि साथ चलने वाले, हमेशा साथ नहीं देते,
कुछ बस मंज़िल आने तक, अपना हाथ नहीं देते।
मगर जो दिल से जुड़ गए, वो रूह का हिस्सा बन गए,
वही तो इस कारवां के, सबसे हसीन किस्सा बन गए।

​अनुभव की इस पोटली में, कड़वे-मीठे बोल रखे हैं,
मैंने अपनी ज़िंदगी के, सारे राज़ खोल रखे हैं।
वैभव का ये कारवां, अब रुकने वाला नहीं है,
मुश्किलों के आगे ये सिर, अब झुकने वाला नहीं है।

​लिखता हूँ ये दास्ताँ, आने वाले मुसाफिरों के लिए,
कि कारवां ही मंज़िल है, दिल के मुसाफिरों के लिए।
जितना चला हूँ मैं, उतना ही मैंने खुद को पाया है,
अनुभव का ये कारवां, खुदा का ही एक साया है।

_वैभव कुमार सेजवार_
#SejwarInkOfficial

राहों के रंग


​राहों के भी अपने रंग हैं, 
अपनी एक अलग जुबान है,
कहीं मखमली घास है, 
तो कहीं पथरीला श्मशान है।

सुबह की पहली किरण जब, 
कच्ची सड़क पर पड़ती है,
तब सुनहरी धूल की चादर, 
जैसे रूह से लिपटती है।

​हरे भरे खेतों के बीच से, 
जब पगडंडी गुजरती है,
जिंदगी की सारी थकान, 
जैसे मिट्टी में उतरती है।

नीला आसमान ऊपर, 
और नीचे भूरी सी ये राह,
मुसाफिर को मिल जाती है, 
कुदरत की एक पनाह।

​शाम का नारंगी रंग, 
जब क्षितिज पर बिखरता है,
रास्तों का हर मोड़ तब, 
एक नई दुल्हन सा संवरता है।

काली पिच वाली सड़कें, 
जो रात में चमकती हैं,
जैसे अंधेरे में जुगनू की, 
आंखें अचानक दमकती हैं।

​लाल मिट्टी का वो रास्ता, 
जो गाँव की ओर जाता है,
बचपन की उन यादों से, 
गहरा नाता जोड़ जाता है।

बर्फीले रास्तों की सफेदी, 
जो खामोशी सिखाती है,
इंसान के भीतर की हलचल को, 
चुपचाप दबाती है।

​कहीं रास्तों पर उदासी का, 
गहरा स्लेटी रंग छाया है,
जहाँ किसी मुसाफिर ने, 
अपना सब कुछ गंवाया है।

मगर कहीं खुशियों का पीला, 
सरसों जैसा खिलता है, 
जहाँ हर थके हुए राही को, 
नया हौसला मिलता है।

​राहों के इन रंगों में, 
मेरी जिंदगी की तस्वीर है,
हर मोड़ पर बदली हुई, 
मेरी अपनी ही तकदीर है।

रंगों का ये मेला, 
आँखों को सुकून देता है,
मुसाफिर को हर पल, 
एक नया जुनून देता है।

​ये रंग बताते हैं कि, 
जिंदगी एक सादा कैनवास नहीं,
इसमें हर रंग का होना, 
कोई इत्तेफाक या प्यास नहीं।

मैं भी एक रंग हूँ, 
जो इन राहों में घुल गया हूँ,
वैभव बनकर मैं आज, 
खुद की तलाश में खुल गया हूँ।

​लेखक: वैभव कुमार सेजवार
SejwarInkOfficial

रास्तों की सीख


​ये रास्ते बेज़ुबान नहीं, इनमें हजारों कहानियाँ दफन हैं,
कहीं संघर्ष का पसीना है, तो कहीं यादों का कफन है।
मैंने रास्तों से पूछा कि तुम इतने टेढ़े-मेढ़े क्यों हो?
रास्ता बोला—सीधे चलने वालों के अरमान थोड़े कच्चे होते हैं।

​सीख पहली ये मिली कि हर चमकता पत्थर मंज़िल नहीं,
हर हाथ मिलाने वाला इंसान, सफर में शामिल नहीं।
घने जंगलों ने सिखाया कि ख़ामोशी में भी एक शोर है,
अपनी अंतरात्मा को सुनना ही, असली ज्ञान की ओर है।

​नदियों के किनारे चलते हुए ये बात समझ में आई,
कि बहते रहना ही जीवन है, रुकना तो बस तन्हाई है।
ऊँचे पहाड़ों ने कहा कि सिर हमेशा ऊँचा रखना,
मगर पैरों को हमेशा ज़मीन की मिट्टी से जोड़े रखना।

​कुछ रास्ते इतने वीरान थे कि खुद से बातें करनी पड़ी,
अपनी ही परछाईं के साथ, घंटों तक लंबी बहसें चली।
वहाँ सीखा कि सबसे मुश्किल काम है खुद को पहचानना,
भीड़ में तो आसान है, किसी और के पीछे हो लेना।

​सीखा कि जो रास्ता आसान दिखे, वो अक्सर भटकता है,
जो कठिन और पथरीला हो, वही मंज़िल तक ले जाता है।
हर पत्थर जो पैरों में लगा, उसने एक नई राह दिखाई,
ठोकर खाकर ही मैंने, मंज़िलों की सही कीमत पाई।

​रास्तों ने ये भी सिखाया कि कभी पीछे मुड़कर न देखना,
जो बीत गया वो धूल है, उसे बस यादों में ही रखना।
मुसाफिर वही है जो रास्तों को अपना घर मान ले,
नुकसान में भी नफ़ा और काँटों में भी गुलाब जान ले।

​राहों की ये सीख मेरे जीवन का आधार बनेगी,
हर मुश्किल घड़ी में, ये बनकर मेरी पतवार चलेगी।
कलम उठाता हूँ और इन रास्तों को सलाम करता हूँ,
अपनी हर सीख को मैं, ज़िंदगी के नाम करता हूँ।

​लेखक: वैभव कुमार सेजवार
SejwarInkOfficial

सर्च बार का सन्नाटा (Silence of the Search Bar)



एक नीली सी रोशनी और उंगलियों का ठहराव, 
सर्च बार में तुम्हारा नाम, 
और दिल में एक खिंचाव। 
बरसों हो गए बात किए, 
पर आज भी ये आदत नहीं गई, 
तुम्हारी प्रोफाइल देखना, 
जैसे किसी पुराने जख्म की छुअन हो गई। 
एक डिजिटल दुनिया का ये छोटा सा कोना।

तुम्हारी नई प्रोफाइल पिक्चर, 
और वो बदली हुई मुस्कान, 
अब हम तुम्हारे दोस्त नहीं रहे, 
बस एक धुंधली सी पहचान। 
तुमने चेक-इन किया है किसी नए शहर के कैफे में, 
और हम यहाँ अटक गए हैं, 
उसी पुरानी यादों के घेरे में। 
सब कुछ बदल गया, 
बस हम नहीं बदले।

म्यूचुअल फ्रेंड्स की लिस्ट में हमारा नाम अब साथ नहीं आता, 
तुम्हारी टाइमलाइन का कोई भी किस्सा, 
अब मुझे नहीं भाता। 
तुमने नई यादें साझा की हैं, 
नए चेहरों के साथ, और मैं आज भी ढूँढ रहा हूँ, 
उन पुरानी तस्वीरों में अपनी बात। 
एक फासला है जो अब कभी नहीं मिटेगा।

 'ऐड फ्रेंड' के बटन पर हाथ जाकर रुक जाता है, 
पुराना स्वाभिमान, 
पुरानी चोट की याद दिलाता है। 
हम अब सिर्फ एक 'फॉलोअर' बनकर रह गए हैं, 
जो तुम्हारी खुशियों को बस दूर से सह गए हैं। 
ये खामोश निगरानी भी एक सजा है।

5. अचानक स्क्रीन बंद करता हूँ, 
तो अपना ही अक्स दिखता है, 
ये पागल दिल आज भी, 
तुम्हारे ही पते पर बिकता है। 
तुम ऑनलाइन हो, 
पर मेरे लिए हमेशा के लिए 'लॉग आउट' हो, 
मेरी इस अधूरी कहानी का, 
तुम सबसे बड़ा 'डाउट' हो। 
बस एक क्लिक का फासला, 
और मीलों की दूरी।

_वैभव कुमार सेजवार_
@SejwarInkOfficial

आर्काइव की आहटें (The Echoes of Archive)



पुराना व्हाट्सएप चैट

उंगलियों का एक गलत स्पर्श, 
और पुराना नाम ऊपर आ गया, 
सन्नाटे में जैसे कोई, 
भूला हुआ गीत गुनगुना गया। 
सालों पहले का वो आख़िरी मैसेज, 
आज भी वहीं खड़ा है, 
जैसे वक्त इस नीली स्क्रीन पर, 
कहीं आकर जम गया है। 
ये यादों का डिजिटल पुलिंदा है।

 वो लंबी रातें जब टाइपिंग का निशान, 
दिल की धड़कन बढ़ाता था, 
हर एक इमोजी का अपना, 
एक अलग ही मतलब होता था। 
आज वो बातें पढ़कर, 
खुद पर ही हंसी आती है, 
कैसे छोटी-छोटी खुशियाँ, 
पूरी दुनिया बन जाती हैं। 
वो दौर अब बस आर्काइव में है।

ऊपर स्क्रॉल करते हुए, 
हँसी और झगड़े सब साथ आते हैं, 
वो वादे जो कभी टूटे नहीं, 
आज चुपचाप मुँह चिढ़ाते हैं। 
तस्वीरें जो कभी 'स्टेटस' थीं, 
अब गैलरी में भी नहीं, 
पर इस चैट की हिस्ट्री में, 
वो आज भी कहीं न कहीं हैं। 
एक अधूरा सफ़र, 
यहाँ आज भी जारी है।

मन करता है एक 'Hi' लिख दूँ, 
पर हाथ रुक जाते हैं, 
अब हम सिर्फ़ एक-दूसरे की,
 'About' लाइन पढ़ पाते हैं। 
तुम ऑनलाइन हो, 
पर ये हरा निशान अब मेरे लिए नहीं, 
हम अजनबी बन गए हैं, 
पर ये चैट गवाह है कि हम कभी अजनबी नहीं थे। 
मैसेज डिलीट करना, 
यादें मिटाना नहीं होता।

अचानक बाहर आता हूँ, 
और चैट को फिर से नीचे धकेल देता हूँ, 
अपनी ज़िंदगी के इस हिस्से को, 
फिर से सहेज देता हूँ। 
शायद किसी दिन ये फोन बदलेगा, 
और ये चैट खो जाएगी, 
पर वो जो जिया था हमने, 
वो बात हमेशा रह जाएगी। 
पुराना व्हाट्सएप चैट, 
एक बंद कमरे की तरह है।

_वैभव कुमार सेजवार_
#SejwarInkOfficial

A Digital Heartbeat (डिजिटल धड़कन)



स्क्रॉल करते-करते अंगूठा रुक सा गया, 
एक 'स्टोरी' दिखी और दिल झुक सा गया। 
रिप्लाई करूँ या बस एक 'हार्ट' दे दूँ, सोचता हूँ कि इस खामोशी को क्या नाम दे दूँ। 
ये डीएम (DM) की दुनिया भी अजीब है।

भेजा हुआ वो मैसेज और वो 'Seen' का इंतज़ार, 
जैसे किसी पुराने शहर में अपनों का इंतज़ार। 
तुमने रिप्लाई में बस एक इमोजी भेजा है, 
पर मेरे लिए तो जैसे खुशियों का खज़ाना भेजा है। 
बातों का सिलसिला अब रील (Reels) से शुरू होता है।
 कभी मज़ाक, 
 कभी गहरी बातें और वो लंबी रातें, 
 टाइपिंग के उस निशान में छिपी कितनी ही बातें।
 (Mute) पर रखी है दुनिया, 
 बस तुम्हारा नोटिफिकेशन चाहिए, 
 इस भागती ज़िंदगी में, 
 बस तुम्हारा थोड़ा सा अटेंशन चाहिए। 
 एक छोटा सा सर्कल, 
 और उसमें हमारी बात।
पुराने चैट्स को बार-बार पढ़ना और मुस्कुराना, 
जैसे किसी पुरानी गली में फिर से लौट जाना। 
हम अजनबी थे, 
फिर 'फॉलोअर्स' हुए और अब कुछ और हैं, 
इस डिजिटल शोर में, 
बस हमारी खामोशी का ही ज़ोर है। 
ये 'एक्टिव नाउ' (Active Now) का निशान दिल धड़काता है।

कभी-कभी डर लगता है कि कहीं तुम 'अनफॉलो' न कर दो, मेरी इन छोटी-छोटी खुशियों को कहीं मटियामेट न कर दो। पर जब तक ये चैट का धागा सलामत है, 
यकीन मानो, 
मेरे लिए हर दिन एक कयामत है। 
इंस्टाग्राम की गलियों में, 
बस तुम्हारा ही इंतज़ार 

_वैभव कुमार सेजवार_
#SejwarInkOfficial

भीगती यादें (Drenched Memories)


स्टैंड की वो टपकती छत, 
और बारिश का वो शोर,
हाथ में उसके छतरी थी, 
पर ध्यान था किसी और छोर।
भीगी हुई पलकों में जैसे, 
कोई पुराना अफ़साना था,
वो नूरानी चेहरा मानो, 
यादों का कोई ठिकाना था।
​शहर की भीड़ में वो लड़की, 
बे-आवाज़ खड़ी रही,
जैसे वक़्त की किसी पुरानी किताब को, 
वो फिर से पढ़ी रही।
बस की तलाश थी उसे, 
या ख़ुद के खोए हुए कल की?
हर गिरती बूँद में जैसे, 
एक दास्ताँ थी हलचल की।
​उसकी फॉर्मल ड्रेस पर, 
पानी के कुछ दाग गहरे थे,
जैसे उसकी ख़ामोशी पर, 
हज़ारों पहरे थे।
मैंने चाहा कि कुछ कहूँ, 
पर उसने मुझे पहचाना नहीं,
बस आई, वो चली गई, 
पर मुमकिन उसे भुलाना नहीं।
​वह खड़ी रही वहीं मुद्दतों तक, 
बारिशों के दरमियाँ,
भीगती रही उसकी रूह, 
और जलता रहा मेरा आसमाँ।
वो चली गई मगर छोड़ गई, 
एक अधूरा सा सवाल,
क्या बारिशें सिर्फ़ पानी हैं, 
या किसी बिछड़े का मलाल?

_वैभव कुमार सेजवार_
#SejwarInkOfficial

अनसुनी दस्तक (The Unheard Knock)



हर बजती हुई घंटी पर दिल उछल सा जाता है, 
एक अनजाना सा डर रूह को सहला जाता है। 
फोन की स्क्रीन को बार-बार जलाकर बुझाता हूँ, 
जैसे इस अंधेरे में, 
मैं कोई रोशनी ढूँढता हूँ। 
ये बेताबी का एक अलग ही आलम है।

कभी रिंगटोन बदलता हूँ, 
कभी वॉल्यूम बढ़ाता हूँ, 
बिना किसी काम के, 
बस नोटिफिकेशन चेक कर आता हूँ। 
वो जो एक वाइब्रेशन होता है मेज़ की लकड़ी पर, 
जैसे कोई दस्तक दे रहा हो, 
मेरे सब्र की दहलीज पर। 
पर वो कॉल तुम्हारा नहीं होता।

सोचता हूँ खुद कर लूँ, 
पर उंगलियाँ काँप जाती हैं, 
पुरानी बातें, 
पुराने झगड़े, 
दीवार बन जाते हैं।
 शायद तुम भी फोन हाथ में लिए बैठी होगी, 
 शायद तुम भी मेरी तरह, 
 अपनी ही ज़िद से हारी होगी। 
 दो तरफा खामोशी का ये खेल अजीब है।

रात के दो बजे हैं और फोन अब भी खामोश है, 
ये इंतज़ार अब धीरे-धीरे बन रहा एक दोष है। 
बैटरी सौ फीसदी है, 
पर उम्मीदें घटती जा रही हैं, 
नींद की परछाइयाँ अब मुझे डराने आ रही हैं।
 पर आँखें सिर्फ एक कॉल पर टिकी हैं।

वो एक कॉल जो शायद सब कुछ ठीक कर दे, 
जो इस खालीपन को फिर से अपनी आवाज़ से भर दे।
 कल फिर सुबह होगी, 
 फिर वही दिन गुज़रेगा, 
 पर ये फोन, 
 ये इंतज़ार... जाने कब खत्म होगा? 
 तुम्हारी आवाज़ सुनने की हसरत अधूरी है।


_वैभव कुमार सेजवार_
#SejwarInkOfficial

वो स्कूल वाली राहें

वो स्कूल वाली राहें
नया बस्ता, 
नई किताबें और वो पानी की बोतल, 
वो स्कूल जाने की ज़िद और आँखों में काजल। 
आधी छुट्टी में वो टिफिन मिल कर खाना, 
छोटी सी बात पर हँसना और खिलखिलाना।

कहाँ खो गई वो बचपन की मीठी बातें, 
अब तो बस काम की बातें और उलझी रातें। 
वो गुरु का डाँटना और फिर दुलारना, 
याद आता है आज भी खुद को सँवारना।

वो तितली के पीछे नंगे पाँव भागना, 
देर रात तक सितारों को देख कर जागना। 
काश! ज़िंदगी का पहिया फिर पीछे घूम जाए, 
वही बचपन, 
वही मासूमियत फिर से लौट आए।

_वैभव कुमार सेजवार_
#SejwarInkOfficial

यादों की चौखट


कभी आँखों में नमी है, 
कभी होठों पे प्यास है, 
कभी खुद से ही दूर हूँ, 
कभी तेरे ही पास हूँ, 
तुझे पाकर भी खोने का,जो डर दिल में समाया है, 
वही तो सच है दुनिया का, 
बाकी सब तो विलास है।

 तुझे पाना मुकद्दर था, 
तुझे खोना हकीकत है, 
ये कैसी कशमकश है दिल, 
ये कैसी आदमियत है, 
कि जिसकी याद में खुद को, 
भुला बैठा है ये पागल, 
उसी को भूल जाने की, 
अब दुनिया देती नसीहत है।

न तुम हो बेवफा जानम,
न हम हैं बेवफा देखो, 
मिले हैं दर्द के साये, 
मिली है हर दफ़ा देखो, 
जो उलझन मेरे दिल की है, 
वही तो तेरे दिल में है, 
मगर ये फासला फिर भी, 
बना है बे-वजह देखो।

कभी बादल सा रोता हूँ, 
कभी बिजली सा गिरता हूँ, 
मैं अपनी ही खताओं से, 
यहाँ हर रोज़ लड़ता हूँ, 
हकीकत जान कर भी मैं, 
तुझे ख़्वाबों में ढूँढूँ क्यों, 
मैं जलती आग के दरिया, 
में ख़ुद ही रोज़ उतरता हूँ।

कभी यादों के जंगल में, 
कोई साया सा दिखता है, 
ये कोरा मन पुरानी सी, 
कोई तहरीर लिखता है, 
मैं जिससे भागता हूँ रोज़, 
वो टकराता है रस्ते में, 
कि तेरा नाम अब मेरी, 
दुआओं में भी बिकता है।

 अधूरे ख्वाब की आँखें, 
बहुत ही नम सी होती हैं, 
वफ़ा की राह में रातें, 
बड़ी बे-दम सी होती हैं, 
जिन्हें मंज़िल समझ कर हम, 
उम्र भर दौड़ते रहते, 
वो गलियां मोड़ पर आकर, 
बहुत ही कम सी होती हैं।

 मोहब्बत एक दरिया है, 
मगर प्यासा ही रखती है, 
ये दिल को बस दिलासे और, 
दिलासा ही रखती है, 
किसी के वास्ते खुद को, 
मिटा देना सलीका है, 
मगर ये रूह को हरदम, 
तमाशा ही रखती है।

 पुराना ज़ख्म है कोई, 
जो अक्सर टीस देता है, 
ये बीता वक्त जाने क्यों, 
नयी ताकीद देता है, 
सफर में हमसफ़र छूटे, 
मगर यादें नहीं छूटतीं, 
कि हर इक मोड़ यादों की, 
हमें रसीद देता है।

कभी यादों की चौखट पर, 
कोई दस्तक सी होती है, 
ये तनहाई की रातें भी, 
बहुत रुसवा सी होती हैं, 
दुआएं माँगता हूँ मैं, 
कि तुझको भूल जाऊँ पर, 
मगर ये प्रार्थनाएँ भी, 
बहुत तन्हाँ सी होती हैं।

कि जैसे रेत मुट्ठी से, 
फिसलती ही चली जाए, 
कि जैसे रात सूरज से, 
बदलती ही चली जाए, 
ये जीवन का सफ़र ऐसा, 
तमाशा बन गया है अब, 
कि जैसे आग पानी में, 
उबलती ही चली जाए।

महोब्बत के झरोखों में, 
कभी झाँका नहीं जाता, 
कि दिल का दर्द लफ़्जों में, 
कभी टाँका नहीं जाता, 
जिन्हें हम जान कहते थे, 
वो अब अनजान बैठे हैं, 
कि अपनी प्यास को मय से, 
कभी आँका नहीं जाता।

नया सूरज निकलता है, 
नयी उम्मीद लाता है, 
मगर ये पिछला सन्नाटा, 
बहुत दिल को दुखाता है, 
मैं लिखना चाहता हूँ अब, 
खुशी के गीत दुनियां को, 
मगर ये कलम का कागज़, 
तेरा ही नाम पाता है।

वफा की सीढ़ियों पर अब, 
कदम रखने से डरते हैं, 
कि हम भी कांच के घर में, 
सनम रहने से डरते हैं, 
किसी की मुस्कुराहट में, 
छिपी जो बेरुखी देखी, 
तभी से हम मुहब्बत को, 
जनम कहने से डरते हैं।

कभी जो गीत लिखते थे, 
वो अब मातम सा लगते हैं, 
ये दुनिया के पुराने लोग, 
अब आदम सा लगते हैं, 
जिन्हें पलकों पे रखा था, 
वो ओझल हो गए ऐसे, 
कि खुद के जख्म भी हमको, 
अब मरहम सा लगते हैं।

न तुमको पा सके अब हम, 
न खुद को खो सके अब तक, 
न हँस कर जी सके अब हम, 
न जी भर रो सके अब तक, 
ये कैसी प्यास जागी है, 
सुलगते रेत के ऊपर, 
कि सपनों के किसी घर को, 
न हम बो सके अब तक।

पुराना आइना कल फिर, 
बड़ी बातें बना बैठा, पुरानी याद की महफिल, 
वो आँखों में सजा बैठा, 
मैं कहना चाहता था कल, 
कि तुम बिन जी नहीं सकते, 
मगर ये दिल का सन्नाटा, 
गवाही दे के जा बैठा।

कभी फुर्सत मिले तो तुम, 
पुराने खत जला देना, 
मगर जो रूह पर लिखे, 
वो किस्से तुम भुला देना, 
सफर में साथ चलने की, 
कसम जिसने भी खायी थी, 
उसी के हाथ में तुम भी, 
कोई पत्थर थमा देना।

अकेलेपन की चादर में, 
सुलगती धूप रहती है, 
ये दुनिया दूर से देखो, 
बड़ी चुप-चाप रहती है, 
जिसे हम मंज़िलें समझे, 
वो महज़ एक छलावा था, 
यहाँ हर शख़्स के दिल में, 
कोई दीवार रहती है।

नज़र का खेल है सारा, 
नज़र ही वार करती है, 
वही जो प्यार देती है, 
वही लाचार करती है, 
मैं हँस कर टाल देता हूँ, 
ज़माने के हर एक ताने, 
मगर ये बेबसी दिल की, 
बड़ा बीमार करती है।

पुराना सिलसिला कोई, 
नया सा दर्द देता है, 
ये यादों का परिंदा क्यों, 
हमें आवाज़ देता है, 
मैं मुड़कर देखूँ पीछे तो, 
खंडर ही अब दिखते हैं, 
मगर ये वक्त जाने क्यों, 
नयी परवाज़ देता है।

कि जैसे प्यास का रिश्ता, 
किसी झोंके से होता है, 
कि जैसे दर्द का रिश्ता, 
किसी धोखे से होता है, 
मैं जिसको ढूँढता फिरता, 
यहाँ हर एक महफ़िल में, 
वो मेरा सामना अक्सर, 
बस इक मौके से होता है।

अंधेरी रात के साये, 
डराते हैं तो डरने दो, 
पुरानी याद के नगमे, 
रुलाते हैं तो रोने दो, 
कि जिसने उम्र भर हमको, 
सिवा तन्हाई के कुछ न दिया, 
उसे अब ख्वाब की दुनिया, 
बसाते हैं तो बसने दो।

न तुम अपनी जगह कम हो, 
न हम अपनी जगह कम हैं, 
कि दोनों एक ही दरिया, 
के गहरे से दो संगम हैं, 
मगर ये फासला फिर भी, 
बना है रूह के अंदर, 
कि जैसे एक ही सुर के, 
अधूरे से दो सरगम हैं।

कलम उठती है जब दिल की, 
गवाही पेश करने को, 
तैयार हूँ मैं अपनी, 
हर तबाही पेश करने को, 
मगर ये वक्त का पहिया, 
रुका है आज भी वहीं, 
जहाँ आया था मैं खुद की, 
सियाही पेश करने को।

_वैभव कुमार सेजवार_
#SejwarInkOfficial

अनाड़ी दिल

तुमसे मिलना
तुमसे मिलना है,
पर डर लगता है,
कि कहीं तुम रूठ न जाओ,
और हमें मनाना भी नहीं आता।

तुमसे प्यार करना है,
पर डर लगता है,
कि कहीं तुम हमें नापसंद कर दो,
और हम बताना भी नहीं आता।

तुमसे बात करना है,
पर डर लगता है,
कि कहीं तुम हमारी बातों को ना समझो,
और हम समझना भी नहीं आता।

तुमसे जुड़ना है,
पर डर लगता है,
कि कहीं तुम हमें छोड़ दो,
और हम अपनाना भी नहीं आता।

_वैभव कुमार सेजवार_
#SejwarInkOfficial

जीवन का कारवां


यहाँ यादों की महफ़िल में, 
हर एक लम्हा पराया है, 
जिसे अपना कहा हमने, 
वही बस एक साया है। 
हवाओं के थपेड़ों से, 
जो दीपक बुझ नहीं पाया, 
उसी ने रात के सीने, 
में अपना घर बनाया है॥

कि जैसे झील के पानी, 
में हलचल शांत होती है, 
कि जैसे सीप के अंदर, 
छुपा इक मंत (मोती) होती है। 
दिखावे की चमक से तुम, 
कभी धोखा नहीं खाना, सच्चाई सदा मन के, 
किसी कोने में सोती है॥

ज़माने की शिकायतों से, 
किनारा कर लिया हमने, 
अकेलेपन की रातों से, 
गुज़ारा कर लिया हमने। 
जो कल तक अजनबी थे अब, 
वही हमराज़ लगते हैं, 
कि ख़ुद को आज ख़ुद का ही, 
सहारा कर लिया हमने॥

पुराने ज़ख्म को कुरेदो, 
तो फिर से दर्द होता है, 
मगर जो हँस के सह जाए, 
वही तो मर्द होता है। 
सफर में धूल उड़ती है, 
तो आँखों को मूँद लो तुम, 
कि मंज़िल पाने वालों का, 
जुदा ही गर्द होता है॥

यही है ज़िंदगी की रीत, 
कि पल-पल मुस्कुराना है, 
भले ही गम का दरिया हो, 
किनारे तक तो जाना है। 
मिटा दो नफरतें दिल से, 
मुहब्बत ही हकीकत है, 
इसी पैगाम को अब तो, 
ज़माने को सुनाना है॥

_वैभव कुमार सेजवार_
#SejwarInkOfficial

"यादों का मुसाफ़िर"

बस का रात वाला सफर 
रात थी गहरी, बस धीरे चल रही थी,
खिड़की से ठंडी हवा दिल छू रही थी।
पीछे छूटता शहर कुछ कहता सा लगा,
जैसे कोई अपना फिर रहता सा लगा।
सीट पर बैठा मैं चुप सा मुसाफ़िर,
साथ थे लोग मगर दिल था तन्हा फिर।
कभी शीशे पर माथा टिक जाता था,
कभी कोई पुराना चेहरा दिख जाता था।
Anand Vihar से चली थी ये राह,
साथ ले आई दिल की हर चाह।
सड़क की लाइटें भागती जाती थीं,
जैसे यादें मुझसे दूर जाती थीं।
कभी लगा तुम पास ही बैठे हो,
खामोशी से कुछ कहते हो,
फिर आँख खुली तो समझ आया —
सफर में लोग होते हैं, अपने नहीं होते।
Bareilly से पहले जब रात गहरी होगी,
नींद भी आँखों से ठहरी होगी,
तब शायद दिल ये समझ जाएगा —
कुछ लोग बस यादों में ही मिलते हैं।
"बरसिया" आएगा तो उतर जाऊँगा मैं,
भीड़ में फिर खो जाऊँगा मैं,
घर तो मिल जाएगा मेरा पर,
पर जो खोया है — वो कहाँ पाऊँगा मैं… 

_वैभव कुमार सेजवार_
#SejwarInkOfficial


खामोशी या कुछ और

उम्र भर की खामोशी
चंद लम्हों के लहज़े 
जिनको जो तोड़ना सो तोड़ गए।

उनको जाना था
बस इक बहाना था
छोड़ना तय था सो छोड़ गए।

कुतर गए पंख अरमानों के
लहज़े तल्ख़ बा-जुबानों के,
सीने पर आरी चलनी थी
आग यहीं तो जलनी थी;

चिंगारी एक अनाड़ी थी
दुःख की क्या व्यापारी थी?
गमनीन आंसुओं के बहते
और किनारे कुछ न कहते;

बहने को धारा तैयार
आंसू निकले हो बेकरार
कई कई किनारे मोड़ गए

उम्र भर की खामोशी
चंद लम्हों के लहज़े 
जिनको जो तोड़ना सो तोड़ गए।

जादू तो एक छलावा है
झूठा है बहलावा है!
इश्क भी एक जादू जानो
और छलावे सच न मानो;

होगी राह और मुकम्मल 
जिनपे चलें शायद कल
आज की रात तूफानी है
आंखों में सैलाब का पानी है।

लहज़े में इतनी तल्ख़ियत क्यों 
हम बुरे हो गए अचानक यूं?
ये किस्सा एक पुराना है
अब तो नया जमाना है!

ये नई धार कहती है बहो 
ग़म की बाहें थाम चलते रहो
जिंदगी एक नई बनानी है
अपनी कहानी सुनानी है!


इतनी बातों के मतलब में
मतलब बिन किसी मतलब के
मतलबी होने का नकाब ओढ़ गए।

_वैभव कुमार सेजवार_
#SejwarInkOfficial

भरोसे का धोखा


मैंने तो दिल के दरवाज़े, 
तेरे लिए ही खोले थे, 
हर एक आंसू, हर एक खुशी, 
बस तुझसे ही बोले थे। 
पर क्या पता था जिस हाथ को, 
मैंने थाम रखा है, 
उसी ने पीठ के पीछे, 
खंजर भी नाम रखा है।

कांच सा नाज़ुक था यकीन, 
तुमने पल में तोड़ दिया, 
भरी राह में तन्हा मुझे, 
बीच सफ़र में छोड़ दिया। 
अब शिकायतों का दौर नहीं, 
बस एक खामोश सन्नाटा है, 
ज़िंदगी ने वफ़ा के बदले, 
आज ज़ख्म गहरा बांटा है।

लोग कहते हैं संभल जाओ, 
ज़माना बड़ा बेगाना है, 
पर अपनों से मिले धोखे को, 
भला किसने जाना है? 
अब आंखों में वो चमक नहीं, 
बस एक गहरी नमी है, 
तुम तो पास हो शायद, 
पर अब उस 'भरोसे' की कमी है।

सीख लिया है अब मैंने भी, 
खुद की लौ में जलना, 
गैरों की बाहों के बदले, 
तन्हाई में संभलना। 
धोखा देकर तुमने शायद, 
खुद को बड़ा पाया होगा, 
पर खोया है वो इंसान, 
जो तुम पर जान लुटाया होगा।


_वैभव कुमार सेजवार_
#SejwarInkOfficial

लहरों से लड़ती कश्ती


मंज़िलें दूर हैं और रास्ता अनजान है, 
पर मेरे सीने में भी एक ज़िद का तूफ़ान है। 
लहरें डराएंगी, 
हवाएँ रुख बदलेंगी, 
मगर मेरी कश्ती का भी अपना ही स्वाभिमान है।

अंधेरा घना है तो क्या, 
चिराग़ जलाना सीख लिया, 
काँटों भरी राहों पर मुस्कुराकर चलना सीख लिया। गिरना बुरा नहीं, 
गिरकर न उठना खता है, 
मैंने हर ठोकर से गिरकर सँभलना सीख लिया।

वक्त की स्याही से अपनी तकदीर खुद लिखूँगा, 
मैं वो नहीं जो हालातों के आगे झुकूँगा। 
परों में उड़ान है और हौसलों में जान, 
जब तक साँस है, 
मैं बस मंज़िल की ओर दिखूँगा।

सूरज भी ढलता है, 
फिर से निकलने के लिए, 
रात भी होती है, 
सवेरे में बदलने के लिए। 
तू बस चल मुसाफ़िर, 
रुकना तेरा काम नहीं, 
पाँव बने हैं सिर्फ़ ऊँचाइयों पर चढ़ने के लिए।

_वैभव कुमार सेजवार_
#SejwarInkOfficial

मेहनत का संकल्प (कविता)




थकी आँखों में सपनों का, हसीं मंजर ज़रूरी है,

समंदर फतह करने को, मगर लंगर ज़रूरी है।

बिना मेहनत के हाथों में, कभी शोहरत नहीं आती,

हथेली पर अगर फल हो, तो फिर शजर ज़रूरी है।

​बुलंदी पर जो पहुँचे हैं, वो रातों को न सोये थे,

सफलता के बगीचे में, उन्होंने बीज बोये थे।

ज़माना ढूँढता है बस, चमकते चाँद को हरदम,

मगर वे जानते हैं सच, जो कीचड़ में भी खोये थे।

​पसीने की हर इक बूँद, कहानी खुद सुनाएगी,

तुम्हारी आज की ये चुप, कल शोर मचाएगी।

डरो मत तुम अंधेरों से, बस अपना काम करते चल,

सुबह की पहली जो किरण है, वो तुमको ही बुलाएगी।

​सितारे टूटते हैं तो, फलक रोया नहीं करता,

जो खोता है वही अक्सर, नया कुछ पाया करता।

मशक्कत की सड़कों पर, खड़ा है जो निडर होकर,

मुकद्दर भी उसी के सामने, सर को झुकाया करता।



लेखक:-वैभव कुमार सेजवार

अधूरा किनारा


वो साथ जो कल तक अपना था, 
अब एक पराई राह हुआ, 
जो ख्वाब बुने थे आँखों ने, 
वो पल भर में ही स्वाह हुआ। 
अब फोन की वो रिंगटोन, 
बस एक सन्नाटा लाती है, 
तेरी यादें अब खुशबू नहीं, 
आँखों में नमी जगाती हैं।

बातों के वो सिलसिले, 
अब खामोशी में बदल गए, 
हम एक ही राह पे चलते थे, 
पर रास्ते अब निकल गए। 
गलती किसकी, क्या कहें? 
अब तो बस ये दूरी है, 
शायद जुदा होना ही अब, 
हम दोनों की मजबूरी है।

वो कैफे की मेज़ खाली है, 
और हाथ में हाथ नहीं, 
सब कुछ है यहाँ पहले सा, 
बस अब तेरा साथ नहीं। 
दिल पूछता है बार-बार— क्या वो सब बस एक सपना था? 
जो सबसे करीब था मेरे, 
क्या कभी वो वाकई अपना था?

पर ज़िंदगी तो चलती है, 
और घाव भी भर ही जाएंगे, 
हम अपनी-अपनी राहों पर, 
फिर खुद को ढूंढ पाएंगे। 
तू खुश रहे अपनी दुनिया में, 
बस यही एक दुआ है, 
जो हुआ सो हुआ, 
शायद खुदा की यही रज़ा है।

_वैभव कुमार सेजवार_
#SejwarInkOfficial

पिता का साया


तपती धूप में जलता है जो, 
अपनी संतान की खातिर, 
वो पिता ही है जो झुकता नहीं, 
किसी तूफ़ान की खातिर। 
कभी सख्ती दिखाता है, 
तो कभी चुपके से रोता है, 
हमारी एक मुस्कुराहट में, 
वो अपनी थकान खोता है।

हाथ की उन लकीरों में, 
संघर्ष की एक कहानी है, 
उनकी डाँट में भी छुपी, 
ममता की ही निशानी है। 
खिलौनों से जो भर देता, 
हमारे बचपन की झोली, 
खुद फटे पुराने कपड़ों में, 
जिसने काटी हर दिवाली।

जब कभी मैं गिरता हूँ, 
वो हाथ बढ़ाकर उठाता है, 
"बेटा तू शेर है मेरा", 
कहकर हौसला बढ़ाता है। 
माँ अगर ममता का सागर, 
तो पिता उस सागर का किनारा है, 
इस मतलबी सी दुनिया में, 
वो ही सबसे बड़ा सहारा है।

माँगने से पहले ही जो, 
हर ज़िद को पूरी करता है, 
वो शख्स खुदा से कम नहीं, 
जो हमारी फ़िक्र में मरता है। 
उंगली पकड़कर चलना सिखाया, 
अब मंज़िल तक जाना है, 
पिता का नाम रोशन करना, 
बस अब यही एक ठिकाना है।

_वैभव कुमार सेजवार_
#SejwarInkOfficial

कुछ बातें कुछ सवाल


न ऊँचे महल माँगिये, 
न दुनिया की मिसाल बनिये, 
मिट्टी के पुतले हैं हम, 
बस इंसानियत की मिसाल बनिये...

न शिकवा ज़माने से कीजिये, 
न गिला तक़दीर से कीजिये, 
जो पास है उसमें खुश रहिये, 
बस शुक्र का दामन थाम लीजिये...

न दौड़ में शामिल रहिये, 
न किसी से होड़ रखिये, 
ज़िन्दगी एक खूबसूरत सफर है, 
बस सहजता से चल दीजिये...

न कल की फिक्र में डूबिये, 
न बीते कल को याद कीजिये, 
साँसें जो मिली हैं आज, 
बस खुलकर इन्हें जी लीजिये...

न चादर बड़ी कीजिये, 
न ख्वाहिशें दफन कीजिये, 
चार दिन की ज़िन्दगी है, 
बस चैन से बसर कीजिये...

न परेशान किसी को कीजिये, 
न हैरान किसी को कीजिये, 
कोई लाख गलत भी बोले, 
बस मुस्कुरा कर छोड़ दीजिये...

न रूठा किसी से कीजिये, 
न झूठा वादा किसी से कीजिये, 
कुछ फुरसत के पल निकालिये, 
कभी खुद से भी मिला कीजिये..

रिश्तों की मिठास

न ऊँची आवाज़ रखिये, 
न दिल में कोई राज़ रखिये, 
ज़िन्दगी छोटी सी है, 
बस प्यार का अंदाज़ रखिये...

न कमियाँ किसी की देखिये, 
न खूबियाँ अपनी गिनाइये, 
आईना हैं हम एक दूजे का, 
बस मुस्कुरा कर गले लगाइये...

न मतलब से हाथ मिलाइये, 
न स्वार्थ से रिश्ता निभाइये, 
मिले जो कोई राह में, 
बस अपनों सा साथ निभाइये...

न दुनिया की भीड़ में खोइये, 
न तन्हाई में रोइये, 
ज़िन्दगी एक दुआ है, 
बस हर पल इसमें खुश रहिये...
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सादगी की राह

न दूसरों से उम्मीद रखिये, 
न खुद को कम समझिये, 
दिल में सबके लिए प्यार, 
और लबों पर मुस्कान रखिये...

न ऊँची उड़ानों का गुमान कीजिये, 
न ज़मीं से नाता तोड़िये, 
वक्त तो बस मुसाफिर है, 
हर लम्हें को शिद्दत से जी लीजिये...

न कल की चिंता में आज खोइये, 
न बीते दुखों में दिल डुबोइये, 
खूबसूरत है ये कायनात, 
बस नज़रिया थोड़ा सा बदल लीजिये...

न शिकायतें हज़ारों रखिये, 
न नफ़रत के बीज बोइये, 
छोटी सी है ये ज़िन्दगी, 
बस प्यार बाँटते हुए चल दीजिये...
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मन के कुछ सवाल

न जाने क्यों हम दौड़ रहे हैं, 
किस मंज़िल की तलाश में?

क्या सुकून छिपा है तिजोरियों में, 
या खुले आसमान के पास में?

न जाने क्यों हम रूठ जाते हैं, 
अपनों की छोटी बातों पर?

क्या साथ रहेगा ये गुरूर हमारा, 
जब सितारे हँसेंगे रातों पर?

न जाने क्यों हम कल की फिक्र में, 
आज का चैन गँवाते हैं?

जो लम्हा अभी है मुट्ठी में, 
उसे क्यों यूँ ही जाने देते हैं?

न जाने क्यों हम दूसरों में, 
बस कमियाँ ही ढूंढ पाते हैं?

क्या कभी झाँका है रूह के अंदर, 
हम खुद को कितना जानते हैं?
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बदलाव का सफर

न हवाओं को कोसिये, 
न वक्त से यूँ उलझिये, 
बदलना ही दस्तूर है, 
बस वक्त के संग चलिये...

न मंज़िल की फिक्र में, 
रास्तों को भुलाइये, 
सफर ही असली मंज़िल है, 
बस कदम से कदम मिलाइये...

न दूसरों की चमक देख, 
अपनी रौशनी कम कीजिये, 
आप भी एक सूरज हैं, 
बस खुद पर यकीं कीजिये...

न बंद मुट्ठी में रेत को, 
रोकने की कोशिश कीजिये, 
जो छूट रहा है उसे जाने दें, 
बस नये लम्हों को जी लीजिये...
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भीतर का शोर

न बाहर शोर कीजिये, 
न खुद से जंग लड़िये,

जो अनकहा है भीतर, 
उसे खामोशी से पढ़िये...

न दूसरों की भीड़ में, 
अपनी पहचान खोइये,

खुद के साथ भी कभी, 
तन्हाई में होइये...

न जीत का अहंकार हो, 
न हार का मलाल हो,

ज़िन्दगी ऐसी जिये, 
कि न कोई सवाल हो...

न उम्र की लकीरों से, 
हौसलों को नापिये,

हर दिन एक नया जन्म है, 
बस मुस्कुरा कर जागिये...
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दसवाँ हिस्सा (सुकून का दान)

न सारा अपना समझिये, 
न मुट्ठी बंद रखिये,

खुशियों का दसवाँ हिस्सा, 
औरों के नाम लिखिये...

न ऊँचे ओहदे का मान हो, 
न दौलत का गुमान हो,

बाँट सको जो रोटी अपनी, 
तो तुम भी भगवान हो...

न दुआओं की गिनती कीजिये, 
न एहसान कभी गिनाइये,

दिये से जला कर दिया, 
बस अँधेरा दूर भगाइये...

न संचय की लगी हो होड़, 
न कल की कोई फिक्र हो,

ज़िन्दगी वही मुकम्मल है, 
जिसमें सबका ज़िक्र हो...
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जुबां की मिठास

न कड़वे बोल बोलिए, 
न दिल किसी का तोड़िए,

शहद जैसी जुबां रखिए, 
बस प्यार सबसे जोड़िए...

न ऊँची बात कीजिए, 
न नीचा किसी को दिखाइए,

छोटा हो या बड़ा कोई, 
बस अदब से सिर झुकाइए...

न बहस में वक्त खोइए, 
न खुद को सही साबित कीजिए,

जहाँ कद्र न हो अल्फाजों की, 
वहाँ खामोशी चुन लीजिए...

न नफरतों को पालिए, 
न दिल में कोई मैल रखिए,

दुनिया एक मुसाफिरखाना है, 
बस सबसे मेल रखिए...
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बड़प्पन की पहचान

न औकात किसी की नापिये, 
न रसूख अपना दिखाइये,

मिलना हो अगर किसी से, 
तो इंसानियत साथ लाइये...

न झुकने को कमजोरी समझिये, 
न अकड़ को शान कहिये,

जो दरिया बन कर बह सके, 
उसे ही इंसान कहिये...

न गलत का साथ दीजिये, 
न हक किसी का मारिये,

गर जीतना है दिल यहाँ, 
तो खुद को थोड़ा हारिये...

न दिखावे की इबादत हो, 
न दिखावे की कोई रीत हो,

ज़िन्दगी वही खूबसूरत है, 
जहाँ रूह में सिर्फ संगीत हो...
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ज़िन्दगी का फलसफा (एक लंबी कविता)

न महलों की चाहत रखिये, 
न तख्तों का गुमान कीजिये, 
मिट्टी के खिलौने हैं सब, 
बस इंसानियत का मान कीजिये...

न शिकवे ज़माने से रखिये, 
न किस्मत को कोसा कीजिये, 
जो मिल गया वही नेमत है, 
बस शुक्र में जिया कीजिये...

न कल की फिक्र में आज खोइये, 
न बीते वक्त पर रोइये, 
साँसों की पूंजी मिली है जो, 
उसे खुलकर आज जी लीजिये...

न ऊँची आवाज़ में बोलिए, 
न दिल किसी का तोड़िए, 
मिठास घोलिए बातों में, 
बस प्यार से सबको जोड़िए...

न रसूख की नुमाइश कीजिये, 
न औकात किसी की नापिये, 
रिश्तों में गर गर्माहट हो, 
तो हर लम्हे को सुकून से मापिये...

न नफरतों के बीज बोइये, 
न ईर्ष्या की आग में जलिये, 
दुआओं का काफिला साथ हो, 
बस ऐसी राह पर चलिये...

न दूसरों की चमक देखिये, 
न खुद को कम आँखिये, 
आप भी एक आफताब हैं, 
बस अपनी रौशनी को पहचानिये...

न मतलब के हाथ मिलाइये, 
न स्वार्थ के रिश्ते पालिये, 
निस्वार्थ भाव से जो मिले, 
उसे पलकों पर सजा लीजिये...

न भीड़ में अपनी पहचान खोइये, 
न तन्हाई से घबराइये, 
खुद के साथ भी वक़्त बिताकर, 
कभी खुद से भी मिल आइये...

न जीत का अहंकार हो, 
न हार का मलाल हो, 
ज़िन्दगी ऐसी बसर कीजिये, 
कि दिल में न कोई सवाल हो...

_वैभव कुमार सेजवार_
#SejwarInkOfficial

यादों का झूला


मिट्टी की वो सोंधी खुशबू, 
वो बारिश का पानी, 
याद आती है बहुत, 
वो बचपन की कहानी। 
न कल की फिकर थी, 
न आज का था गम, 
बस खिलौनों की दुनिया में, 
राजा थे हम।

काँधे पर बस्ते का बोझ, 
अब भारी सा लगता है, 
वो कागज की कश्ती का दौर, 
अब प्यारा सा लगता है। 
दौड़ते थे नंगे पाँव, 
तपती हुई उन गलियों में, 
सुकून ढूंढते थे हम, 
महकती हुई कलियों में।

अब तो बस मतलब के रिश्ते और दुनिया की बातें हैं, 
बिना लोरी के कटती, 
अब ये लंबी रातें हैं। 
काश! फिर से वही बेफिक्री का ज़माना आए, 
कोई फिर से मुझे, 
वो प्यारा सा बचपन लौटाए।

_वैभव कुमार सेजवार_
#SejwarInkOfficial

कागज़ की कश्ती


वो छत पे चढ़कर पतंग उड़ाना, 
वो सहेलियों के संग गुड़िया सजाना। 
नफ़रत का कहीं कोई नाम न था, 
बस रूठना और फिर मान जाना।

कहाँ गए वो बेफिक्री के दिन, 
जब शामें गुज़रती थीं खेल-कूद के बिन। 
अब तो बस घड़ियों का पहरा है, 
बचपन का वो अक्स बहुत गहरा है।

काश! फिर से वो कागज़ की कश्ती मिल जाए, 
वो सावन की पहली मस्ती मिल जाए। 
दौड़ कर पकडूँ फिर से वो तितली, 
जो अब यादों के बागों में है सिमटी।

_वैभव कुमार सेजवार_
#SejwarInkOfficial

मोहब्बत का चक्रव्यूह


हम चाहते ही नहीं कि ये दिल किसी के नाम हो जाए, 
नाम हुआ तो फिर ख्यालों में तेरी तस्वीर सजेगी, 
तस्वीर सजी तो फिर तुझे देखने की तड़प जागेगी, 
तड़प जागी तो फिर घर की दीवारें छोटी लगने लगेंगी, 
दीवारें छोटी हुईं तो फिर हम सड़कों पर आवारा घूमेंगे, 
आवारा घूमे तो फिर ज़माना हम पर उंगलियां उठाएगा, 
ज़माना उठाएगा तो फिर हम खुद से ही शर्माएंगे।
हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!

हम चाहते ही नहीं कि तेरी आँखों में डूब जाएं, 
आँखों में डूबे तो फिर गहराई का पता न चलेगा, 
गहराई न मिली तो फिर साँस लेना दूभर हो जाएगा, 
साँस न आई तो फिर ये जिस्म बेजान सा हो जाएगा, 
जिस्म बेजान हुआ तो फिर रूह छटपटाने लगेगी, 
रूह छटपटाई तो फिर चैन की मौत भी न आएगी। 
हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!

हम चाहते ही नहीं कि हम तुम एक दूजे के करीब आएं, 
करीब आए तो फिर दूर जाने का डर सताएगा, 
डर सताया तो फिर हम बंदिशें लगाने लगेंगे, 
बंदिशें लगीं तो फिर रिश्तों में घुटन होने लगेगी, 
घुटन हुई तो फिर हम एक-दूसरे से नफरत करेंगे, 
नफरत हुई तो फिर पुराने दिन याद आकर रुलाएंगे, 
रुलाया तो फिर ये आँखें कभी सूख न पाएंगी। 
हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!

हम चाहते ही नहीं कि तेरी आवाज़ हमारे कानों में घुले, 
आवाज़ घुली तो फिर हर आहट पर तेरा ही भ्रम होगा, 
भ्रम हुआ तो फिर हम दीवानों की तरह तुझे ढूंढेंगे, 
ढूंढा और न मिली तो फिर खुद को ही सज़ा देंगे, 
खुद को सज़ा दी तो फिर दुनिया हमें पागल कहेगी, 
पागल हुए तो फिर अपनों का दिल दुख जाएगा, 
अपनों का दिल दुखा तो हम जीते जी मर जाएंगे। 
हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!

हम चाहते ही नहीं कि तुम्हारी मुस्कुराहट पर हम मरें, 
मुस्कुराहट दिखी तो फिर सादगी का जादू चलेगा, 
जादू चला तो फिर होश-ओ-हवास खो जाएंगे, 
होश खोया तो फिर हम सही-गलत का फर्क भूलेंगे, 
फर्क भूल गए तो फिर कोई बड़ी खता हो जाएगी, 
खता हुई तो फिर ताउम्र पछताना पड़ेगा, 
पछतावा हुआ तो फिर हँसी कभी लौट के न आएगी। 
हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!

हम चाहते ही नहीं कि मोहब्बत का कोई वादा हो, 
वादा हुआ तो फिर कसमें खानी पड़ेंगी, 
कसमें खाईं तो फिर उन्हें निभाने का बोझ होगा, 
बोझ बढ़ा तो फिर ये मासूम रिश्ता झुक जाएगा, 
रिश्ता झुका तो फिर इसमें दरारें पड़ने लगेंगी, 
दरारें पड़ीं तो फिर यादें ही सहारा रह जाएंगी, 
यादें सहारा बनीं तो फिर हकीकत ज़हर लगेगी। 
हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!

हम चाहते ही नहीं कि इस आग में हम जलें, 
आग लगी तो फिर राख होना तो मुकद्दर है, 
राख हुए तो फिर हवाएं हमें उड़ा ले जाएंगी, 
हवाएं उड़ीं तो फिर हमारा कोई वजूद न रहेगा, 
वजूद न रहा तो फिर ये कहानी अधूरी रह जाएगी, 
कहानी अधूरी रही तो फिर पढ़ने वाले आहें भरेंगे, 
आहें भरी गईं तो फिर हमारा दर्द अमर हो जाएगा, 
हम चाहते ही नहीं कि हमारा दर्द नुमाइश बन जाए, 
इसीलिए हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!

_वैभव कुमार सेजवार_
#SejwarInkOfficial

मेरा घर (कविता)


यहाँ यादों का मेला है, 
यहाँ खुशियों का घेरा है, 
मिले सुकूँ जहाँ दिल को, 
यही प्यारा सा डेरा है। 
किसी के लिए इमारत है, 
किसी के वास्ते मिट्टी, 
मगर मेरे लिए सच में, 
ये जन्नत का बसेरा है॥

कहीं दीवारों पे हँसी, 
कहीं कोनों में बातें हैं, 
यहीं पर धूप खिलती है, 
यहीं सुहानी रातें हैं। 
थकन दुनिया की सारी मैं, 
यहीं आकर मिटाता हूँ, 
मेरे घर की हवाओं में, 
दुआओं की बरसातें हैं॥

बचपन की वो किलकारी, 
आँगन में आज भी गुम है, 
पिता की डाँट है इसमें, 
और माँ का प्यार हरदम है। 
ये घर केवल मकाँ नहिं, 
मेरी पहचान है दुनिया, 
मेरी हर एक धड़कन में, 
इसी घर का ही परचम है॥

_वैभव कुमार सेजवार_
#SejwarInkOfficial

संकल्प की शक्ति (कविता)


यहाँ सपनों की महफ़िल में, 
हक़ीक़त मुस्कुराती है, 
वही है कामयाब जो, 
सदा ख़ुद को जगाती है। 
हज़ारों मोड़ आएँगे, 
डराने को सफ़र में पर, 
जुनूँ जिसका सलामत हो, 
उसे मंज़िल बुलाती है॥

कि जैसे आसमाँ में भी, 
सितारे जगमगाते हैं, 
कि जैसे हार के डर से, 
भी योद्धा जीत लाते हैं। 
भले ही वक़्त की आंधी, 
उखाड़े जड़ दरख़्तों की, 
मगर जो बीज पक्के हों, 
वो अंकुर बन के आते हैं॥

दुआओं की जो पूँजी है, 
उसे तुम साथ रखना बस, 
वफ़ा की साफ़ नीयत को, 
हमेशा हाथ रखना बस। 
दिखावे की इस दुनिया में, 
सरल रहना ही मंज़िल है, 
ज़ुबाँ पर मीठी बातें और, 
दिल में साथ रखना बस॥

पुराना कल तो आईना, 
उसे देखोगे तो सीखो, 
नया जो कल है कोरा है, 
उसपे तुम भाग्य को लिखो। 
थकन पाँवों की कहती है, 
कि अब रुकना ही बेहतर है, 
मगर ये रूह कहती है, 
कि बढ़ कर अर्श (आसमान) पे दिखो॥

अँधेरी रात के साये, 
भी अब तो हार मानेंगे, 
तेरी हिम्मत की गाथा को, 
यहाँ सब लोग जानेंगे। 
यही आख़िरी सन्देश है, 
कि ख़ुद पर तुम यक़ीन रखना, 
कि पत्थर भी तुम्हें अब तो, 
पारस की तरह मानेंगे॥

_वैभव कुमार सेजवार_
#SejwarInkOfficial

उमंगों का कारवां



यहाँ शब्दों के जाल में, 
हर कोई फँस जाता है, 
कोई लिखता है दर्द को, 
कोई बस मुस्कुराता है। 

मगर जो दिल की गहराई, 
से अल्फ़ाज़ निकलते हैं, 
वही तो रूह के प्यासे, 
को अमृत पिलाता है॥

कि जैसे रात के बाद, 
सवेरा हो के रहता है, 
कि जैसे वक़्त का दरिया, 
निरंतर बहता रहता है। 

न हारो तुम कभी हिम्मत, 
अँधेरी इन लकीरों से, 
उजाला ढूँढने वालों, 
से सूरज भी ये कहता है॥

सलीका जिसने सीखा है, 
यहाँ बस प्यार बाँटने का, 
कि हक है उसको दुनिया में, 
खुशी के गीत छाँटने का। 

नफरतों के बाज़ारों में, 
गर तुम प्यार ले आओ, 
तो जज़्बा मिल ही जाएगा, 
दुखों को जड़ से काटने का॥

हवाओं की शरारत से, 
दीये बुझ भी तो सकते हैं, 
मगर जो लौ है सीने में, 
वो पर्वत भी हिलाते हैं। 

भले मंज़िल बहुत दूर, 
और थके हों पाँव भी अपने, 
मगर विश्वास के राही, 
नया रस्ता बनाते हैं॥

पुराना हर ज़ख़्म अब, 
एक नई ताक़त बनेगा, 
तेरा हर एक ये आँसू, 
एक नई राहत बनेगा। 

बस चलते ही जाना है, 
बिना पीछे मुड़े अब तो, 
यही संघर्ष ही कल को, 
तेरी किस्मत बनेगा॥

_वैभव कुमार सेजवार_
#SejwarInkOfficial

जीवन का दर्पण


यहाँ चेहरे पे चेहरा है, 
यहाँ पहचान मुश्क़िल है, 
हकीकत और सपनों के, 
बीच की तान मुश्क़िल है। 
मिले जो राह में हँसकर, 
ज़रूरी तो नहीं अपना, 
किसी के मन के अंदर का, 
पढ़ना ज्ञान मुश्क़िल है॥

कि जैसे ओस की बूँदें, 
सुबह होने पे खो जाएँ, 
कि जैसे याद की लहरें, 
पलकों पे ही सो जाएँ। 
वही लम्हा हकीकत है, 
जिसे तुम जी सको खुल कर, 
न जाने कब ये साँसें भी, 
यादों में ही खो जाएँ॥

नफ़रत की इन दीवारों को, 
गिराना भी ज़रूरी है, 
मुहब्बत के नए गुलशन, 
सजाना भी ज़रूरी है। 
सिर्फ़ मन्दिर या मस्ज़िद में, 
खुदा मिलता नहीं साहिब, 
किसी प्यासे को पानी भी, 
पिलाना भी ज़रूरी है॥

सफ़र के मोड़ पर अक्सर, 
हमें खुद से ही लड़ना है, 
गिरे जो पाँव रस्ते में, 
तो फिर हिम्मत से बढ़ना है। 
ज़माना लाख रोकेगा, 
मगर ये याद तुम रखना, 
कि तुमको अपनी मेहनत से, 
फलक के पार चढ़ना है॥
 
पुराना कल तो बीत गया, 
उसे याद अब न तुम करना, 
नई खुशियों की आहट से, 
कभी पीछे न तुम हटना। 
ये जीवन एक मौका है, 
इसे जी भर के तुम जी लो, 
अँधेरी रात के आगे, 
कभी घुटने न तुम टेकना॥

_वैभव कुमार सेजवार_
#SejwarInkOfficial

तुम्हारी रूह का सफ़रनामा


इश्क तो महज़ लफ़्ज़ नहीं, 
रूह की इबादत है,
तुम्हारे आने से शुरू, 
जो वो पुरानी सादत है।
ढूँढता था जिसे मैं भीड़ की उन गलियों में अक्सर,
तुम मिले तो लगा, 
जैसे मिली मुझे खुद की ही मलकियत है।

सुबह की पहली किरण, 
जब तुम्हारी आँखों में ठहरती है,
लगता है जैसे पूरी कायनात, 
वहीं आके संवरती है।
तुम बात करो तो जैसे फूलों की बारिश हो जाए,
तुम्हारी हर एक सादगी, 
मेरी रूह में उतरती है।

वक्त के इस बहाव में, 
हम कितने दूर निकल आए,
मगर यादें तुम्हारी हैं, 
जो हर राह में साथ निभाए।
तुम हँसते हो तो जैसे सारा जहाँ जगमगा उठता है,
तुम रोते हो तो सावन के बादल, 
आँखों में उतर आए।

ज़माना कहता है इश्क, 

महज़ एक हसीन छलावा है,
मगर मुझे तो ये, 
खुदा का सबसे बड़ा बुलावा है।
तुमसे शुरू होके, 
तुमपे ही खत्म होती है मेरी दुनिया,
तुम्हारे इश्क में डूबा, 
मेरा हर एक पल सुहाना है।

दूरी की इन दीवारों को, 
हमने कब का गिरा दिया,
तुम्हारी यादों के चिराग को, 
दिल में सदा जला दिया।
अब न कोई शिकायत है, 
न कोई तड़प है बाकी,
बस एक तेरा साथ पाकर, 
मैंने खुद को मुकम्मल पा लिया।

_वैभव कुमार सेजवार_
#SejwarInkOfficial

जीवन की लय (The Rhythm of Life)


साँसों की इस धुन में, 
अब तेरा ही नाम बजता है,
जीवन का हर एक पल, 
अब तुझमें ही सजता है।
जैसे लहरें किनारों से, 
एक पुराना नाता जोड़ती हैं,
वैसे ही मेरी हर धड़कन, 
तुझसे ही राहें मोड़ती है।

यह जीवन एक संगीत है, 
जिसका तू ही एकमात्र साज़ है,
मेरे सूने से आसमान में, 
तू ही सतरंगी आगाज़ है।
कभी धीमी सी सरगम, 
कभी धड़कनों की तेज रफ्तार,
हर लय में घुला है बस, 
तेरा ही बेपनाह प्यार।

उतार-चढ़ाव जो आते हैं, 
इस जीने के सफ़र में,
वो भी खूबसूरत लगते हैं, 
अब तेरे इस असर में।
तू साथ हो तो हर रास्ता, 
मंजिल सा लगता है,
तेरी मौजूदगी से ही, 
जीवन का हर सुर खिलता है।

न कोई शोर की जरूरत, 
न कोई भारी अल्फाज,
हम दोनों की खामोशी में भी, 
एक हसीं राज है।
यह जीवन की लय है, 
जो प्यार के सुरों में ढली है,
तेरे संग मिलकर ही, 
मेरी रूह की कलियाँ खिली हैं।

वक्त की इस भाग-दौड़ में, 
जब थकने लगती हैं राहें,
तेरी बाँहों के साये में, 
सिमट जाती हैं सब आहें।
जो खोया था कभी, 
वो सब तुझे पाकर मिल गया,
तेरी मुस्कान को देख, 
मेरा हर ज़ख्म ही धुल गया।

सर्द रातों की तन्हाई हो, 
या तपती धूप का साया,
तूने ही मुझे हकीकत में, 
जीना असल में सिखाया।
धड़कनों का ये सिलसिला, 
जो चलता है अब रात-दिन,
मुमकिन ही नहीं जीना, 
अब एक भी पल तेरे बिन।

कदम-कदम पर ये लय, 
और भी निखरने लगी है,
तुझसे मिलकर ही तो, 
किस्मत सँवरने लगी है।
यह जीवन की लय, 
अब प्यार का ही गीत बन गई है,
तेरी चाहत ही मेरे, 
वजूद की रीत बन गई है।

_वैभव कुमार सेजवार_
#SejwarInkOfficial

झूठी हंसी



चेहरे पर ये जो मुस्कान है, 
बस एक दिखावा है,
अंदर कहीं छुपा, 
एक गहरा सा पछतावा है।
सब पूछते हैं कैसे हो, 
मैं कहता हूँ सब ठीक है,
पर मेरी खामोश धड़कनों में, 
एक अजीब सा घाव है।

होठों पर हंसी सजाकर, 
मैं दुनिया को बहलाता हूँ,
अकेले में खुद को, 
आईने के सामने तड़पाता हूँ।
ये झूठी हंसी, 
मेरी रूह की ढाल बन गई है,
सच्चाई को छिपाने की, 
एक मज़बूत जाल बन गई है।

भीड़ में सब हंस रहे हैं, 
तो मुझे भी हंसना पड़ता है,
अपने दर्द को छुपाकर, 
एक मुखौटा पहनना पड़ता है।
कौन समझेगा मेरे अंदर का ये शोर और सन्नाटा,
जब दुनिया को सिर्फ, 
मेरी मुस्कान का ही पता है।

दिल के किसी कोने में, 
अब भी वो जख्म ताज़ा है,
जो मेरा था, 
वो अब सिर्फ एक अधूरा सा दरवाज़ा है।
ये झूठी हंसी, 
मेरी तन्हाई का सबसे बड़ा सच है,
दिखने में तो खुशमिज़ाज, 
पर अंदर से सब कच है।

_वैभव कुमार सेजवार_
#SejwarInkOfficial

बदलाव इंसान का



वक्त के थपेड़ों ने, 
रंग ढंग बदल दिए,
देखते ही देखते, 
अपनों ने भी अपनों को बदल दिए।
कभी जो साथ चलते थे, 
एक साया बनकर हरदम,
आज वही अजनबी बनकर, 
राहें बदल दिए।

इंसान की फितरत भी, 
मौसम सी बदलती है,
तारीफों की गर्मी में, 
नफरत भी पिघलती है।
ज़रूरत खत्म होते ही, 
सब अहसास बदल जाते हैं,
जो कल तक थे मरहम, 
आज वही ज़ख्म बदल जाते हैं।

न जाने कैसा ये खेल है, 
जो हर बार बदलता है,
एक चेहरा मुखौटा ओढ़े, 
बार-बार बदलता है।
दिखने में वही इंसान, 
पर सोच में कोसों दूर,
देखकर ये बदलाव, 
दिल खुद से ही बदलता है।

पर शायद यही जीवन है, 
यही कुदरत का कानून,
जो रुक गया वो ठहर गया, 
जो बदला वो ही जुनून।
बदलाव से डरना कैसा, 
ये तो वक़्त की ज़रूरत है,
पर जो अंदर से न बदले, 
वही सच्ची इंसानियत है।

_वैभव कुमार सेजवार_
#SejwarInkOfficial

लफ्ज़ों की धड़कन (Heartbeat of Words) - कविता

लफ्ज़ों की धड़कन: एक मुकम्मल दास्तां

भाग 1: जन्म और मासूमियत
शुरुआत वहाँ से होती है जहाँ कुछ नहीं था, 
सिर्फ एक सन्नाटा था जो सीने में रहता था। 
फिर रूह ने धड़कन से एक मशवरा किया, 
और पहली बार एक 'शब्द' ने जन्म लिया।

भाग 2: उदासी का गहरा समंदर
पर वक्त की गर्द ने जब लफ्ज़ों को घेरा, 
उजालों के बीच हुआ 'उदासी' का बसेरा। 
वो लफ्ज़ जो कभी खिलखिलाकर हँसते थे, 
अब अंधेरे कमरों के कोनों में बसते हैं। 
जब लफ्ज़ 'अकेलापन' लिखना सीखते हैं, 
तो समझो वो अपनी ही रूह को चीरते हैं।

भाग 3: यादों की गलियाँ और विरह
वो लफ्ज़ सबसे भारी होते हैं जो 'याद' कहलाते हैं, 
आधी रात को सिरहाने आकर शोर मचाते हैं। 
किसी पुराने खत की वो आखिरी अधूरी लाइन, 
जैसे किसी पुराने ज़ख्म पर छिड़का हुआ नमक।

भाग 4: संघर्ष और इंकलाब
उदासियों से निकलकर जब लफ्ज़ अंगार बनते हैं, 
तभी वो सोई हुई बस्तियों के पहरेदार बनते हैं। 
जब कलम उठती है मज़लूमों के हक के लिए, 
तब 'लफ्ज़ों की धड़कन' एक तूफ़ान बन जाती है।

भाग 5: शब्दों की अमरता
अंत में बस इतना समझ लो ए लिखने वाले, 
लफ्ज़ ही हैं जो अँधेरे में जलाते हैं उजाले। 
तुम रहो न रहो, 
ये कागज़ गवाही देंगे, 
तुम्हारी धड़कनों को ये शब्द ही पनाह देंगे।

_वैभव कुमार सेजवार_
#SejwarInkOfficial

मौन के अक्षर



जबान से जो नहीं निकला, 
वो रूह में ठहर गया, 
एक अनकहा एहसास, 
कागज़ के पन्नों पर निखर गया। 
शब्दों की दुनिया में शोर बहुत , 
पर मौन की गलियों में मेरा घर बहुत था।


सुनो! क्या तुम्हें सुनाई देती है ये खामोशी? 
इसमें छिपी है दुनिया की सबसे बड़ी सरगोशी। 
पत्तों का गिरना, 
ओस का ठहरना, 
रातों का ढलना, 
ये खामोशी ही तो है, 
जो सिखाती है हमें संभलना।


कभी-कभी रिश्तों में, 
मौन सबसे बड़ा शोर होता है, 
जब शब्द कम पड़ जाएं, 
तो दिल का दर्द जोर होता है। 
दो लोगों का साथ बैठना, 
बिना किसी बात के, 
खामोशी में घुलना, 
जैसे लहरों का हो रात के।


भीड़ के बीच भी, 
एक तन्हाई का डेरा है, 
शहर की भागदौड़ में, 
ये मौन का ही घेरा है। 
लोग बोलते तो हैं, 
पर दिल से दिल तक नहीं पहुँचते, 
खामोश रहकर ही, 
हम अपनी रूह की गहराइयों तक पहुँचते।


रात की चादर में लिपटी ये खामोशी की महफिल, 
जैसे खुद से खुद का ही हो कोई मुकम्मल हासिल। 
तारे गवाही देते हैं, 
इस चुप के संगीत की, 
ये रात ही तो है, 
रक्षक हमारी प्रेम-प्रीत की।


जब मैं चुप होता हूँ, 
तो अपने करीब होता हूँ, 
भीड़भाड़ के शोर में, 
मैं न जाने कहाँ खोता हूँ। 
खामोशी में ही मिलता है, 
वजूद का असल पता, 
ये चुप ही है, 
जो काटती है मेरे हर गम की खता।


शब्द खत्म हो जाएंगे, 
किताब बंद हो जाएगी, 
पर ये खामोशी, 
सदियों तक याद दिलाई जाएगी। 
क्योंकि जिसे शब्दों ने नहीं कहा, 
उसे चुप ने कह दिया, 
जो था अधूरा जीवन, 
उसे खामोशी ने पूरा कर दिया।


खामोशी में कभी-कभी यादें तैरती हैं, 
जैसे किसी ठहरी हुई झील में, 
लहरें खुद से लड़ती हैं। 
पुरानी यादों का बोझ जब शब्दों से संभाला न जाए, 
तो खामोशी ही है, 
जो मरहम बनकर आ जाए।


पहाड़ों की चोटियों पर, 
जहाँ हवा भी रुक जाती है, 
वहाँ खामोशी, 
अपनी एक नई धुन सुनाती है। 
प्रकृति शोर नहीं करती, 
वो बस 'होती' है, 
और इसी होने के एहसास में, 
रूह सोती है।


जब दुनिया शोर मचाती है, 
तो मैं खामोश हो जाता हूँ। 
ये मौन हार नहीं, 
ये मेरा 'संकल्प' है। 
अक्सर जो शेर खामोश रहते हैं, 
वही शिकार करते हैं।


आखिरकार, सब कुछ खामोशी में ही विलीन होना है। जन्म से पहले भी मौन था, 
मृत्यु के बाद भी मौन होगा। 
खामोशी में ही पूर्णता है, 
खामोशी में ही अनंत है।

_वैभव कुमार सेजवार_
#SejwarInkOfficial

स्याही के नग्मे: एक महा-यात्रा


अध्याय 1: शून्य से सृजन तक
सफेद कागज़ की वो खाली ज़मीन, 
जैसे तपता हुआ कोई रेगिस्तान हसीन। 
जहाँ न कोई पदचाप थी, 
न कोई शोर था, 
बस एक खामोश इंतज़ार का दौर था। 
स्याही ने नग्मे बुनने शुरू किए, 
अँधेरे पन्नों पर उम्मीद के दीये जला दिए।

अध्याय 2: प्रेम की मखमली स्याही
जब स्याही का रंग गुलाबी होने लगा, 
तो हर लफ्ज़ किसी की याद में खोने लगा। 
कलम जब चलती है महबूब के ज़िक्र पर, 
तो थिरकने लगती है कागज़ की कमर।

अध्याय 3: उदासी का गहरा नीला रंग
नीली स्याही जब आंसुओं में घुलती है, 
तो दर्द की एक नई किताब खुलती है। 
लिखा जाता है 'अकेलापन' और 'जुदाई', 
जैसे किसी ने रूह पर नश्तर चलाई।

अध्याय 4: वक्त की धूल
वो नग्मे, जो कभी बचपन ने गुनगुनाए थे, 
वो ख़्वाब, जो जवानी ने आँखों में सजाए थे। 
स्याही भले ही फीकी पड़ गई हो अब, 
पर उनमें कैद है हमारा पूरा का पूरा रब।

अध्याय 5: संघर्ष, पसीना और काली स्याही
काली स्याही जब सच्चाई का आइना दिखाती है, 
तो सोई हुई नसों में भी बिजली दौड़ जाती है। 
ये नग्मे अब बदलाव का नारा बनेंगे।

अध्याय 6: प्रकृति का संगीत
हरा रंग जब स्याही में उतर आता है, 
तो कागज़ खुद-ब-खुद एक जंगल बन जाता है। 
स्याही के ये नग्मे प्रकृति की इबादत हैं।

अध्याय 7: अंतिम स्याही
अंत में, जब स्याही का आखिरी कतरा बचेगा, 
तब वह 'ख़ामोशी' का सबसे सुंदर नग्मा रचेगा।

अध्याय 8: यादों की धुंध
वो शब्द अब धुंधले होकर भी चमकते हैं, 
बीते हुए लम्हों की तरह, 
वो मन में खनकते हैं।

अध्याय 9: बगावत और ज़मीर
वो पन्ना जो खामोश था, 
अब चीखने लगा है, 
दबे हुए जज्बातों को अपना रंग देने लगा है। 
यह स्याही नहीं, 
यह उस आम आदमी का लहू है।

अध्याय 10: अस्तित्व की तलाश
'स्याही के नग्मे' सिर्फ शब्द नहीं, 
हमारी वसीयत हैं, 
जो आने वाली नस्लों को सुनाएंगे कि हमने कैसी महफिलें सजाई थीं।

अध्याय 11: विदाई और निरंतरता
जब हम मर जाएंगे, 
ये नग्मे गूंजते रहेंगे, 
स्याही के ये निशान, 
दीवारों पर झूमते रहेंगे।

अध्याय 12: शेरों के शोर में दबी खामोशी
ये शहर, 
ये सड़कें, 
ये भीड़ का इक समंदर, 
हर कोई दौड़ रहा है, 
अपने-अपने 'अंदर'। 
यहाँ शोर इतना है कि धड़कन सुनाई नहीं देती।

अध्याय 13: स्याही का मौन उत्तर
रात के तीन बजे, 
जब शहर की धड़कन थम जाती है, 
तब मेरी स्याही, 
खामोशी का संगीत गुनगुनाती है।

अध्याय 14: रूहों की वीरानी और कंक्रीट का जंगल
इस कंक्रीट के जंगल में, 
खामोशी का घर कहाँ है? 
जहाँ शोर ही इबादत है, 
वहाँ सन्नाटा ही कहाँ है?

अध्याय 15: लफ्ज़ जो कभी लबों तक नहीं आए
शहर के इस शोर में, 
कुछ 'अहसास' दम तोड़ देते हैं। 
ये 'स्याही के नग्मे' उन अनकहे लफ्ज़ों की मजार हैं।

अध्याय 16: खामोशी की गहराई
शहर की खामोशी कोई सन्नाटा नहीं, 
एक चीख है। 
हम सब यहाँ एक साथ हैं, 
और फिर भी कितने दूर।

अध्याय 17: आखिरी पन्ना - स्याही की गवाही
लिखते रहो... क्योंकि जब लफ्ज़ शोर में दम तोड़ देते हैं, तब यही 'स्याही के नग्मे' हमें हमारे असली वजूद से जोड़ देते हैं।

_वैभव कुमार सेजवार_
#SejwarInkOfficial

कुछ लोग बिछड़कर भी अपने रह जाते हैं...

कुछ लोग बिछड़कर भी अपने रह जाते हैं... हर प्रेम... मंज़िल तक पहुँचे... यह ज़रूरी नहीं होता... कुछ प्रेम... रास्तों में बिछड़कर भी... उम्र भर...