Monday, February 16

पुरानी डायरी का एक कोना (कविता)


      अलमारी की सबसे निचली दराज़ में दबी हुई,
 धूल और वक्त की परतों में कहीं सजी हुई।
 एक पुरानी डायरी का वो मोड़ा हुआ कोना,
 जहाँ छुपा रखा है मैंने, अपना हर पाना-खोने।
 ये मेरे बीते हुए कल का आइना है।

           सूखे हुए उस फूल की महक अब भी बाकी है,
 किसी के नाम की अधूरी सी वो साखी है।
 वो पन्ने जो आंसुओं की बूंदों से थोड़े फूल गए,
 वो वादे जिन्हें दुनिया वाले शायद भूल गए।
 उसी कोने में सब महफ़ूज़ है।

         लिखा था जहाँ कभी "तुम सिर्फ मेरी हो",
 अब वहाँ सिर्फ़ स्याही की काली अंधेरी है।
 बेवजह की कविताएँ और वो बचकाने से ख्वाब
 डायरी का वो कोना देता है मेरे हर मौन का जवाब। 
वो सन्नाटा आज भी गूँजता है।

           कभी-कभी डर लगता है उन पन्नों को पलटने में, कहीं फिर से न खो जाऊं यादों के सिमटने में।
 मगर वो कोना ही तो है जो मुझे मुझसे मिलाता है, 
मैं असल में क्या था, ये चुपके से बताता है।
 वो मेरा सबसे निजी कोना है।

           अब नए पन्ने भरने की फुर्सत नहीं मिलती,
 इस भागती दुनिया में वो रंगत नहीं मिलती। 
पर जब भी दिल भर आता है और अकेला होता हूँ, 
मैं उसी पुरानी डायरी के कोने में जाकर सोता हूँ। 
वो कोना मेरी रूह का घर है।


लेखक: वैभव कुमार सेजवार

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