Sunday, March 22

मोहब्बत का चक्रव्यूह


हम चाहते ही नहीं कि ये दिल किसी के नाम हो जाए, 
नाम हुआ तो फिर ख्यालों में तेरी तस्वीर सजेगी, 
तस्वीर सजी तो फिर तुझे देखने की तड़प जागेगी, 
तड़प जागी तो फिर घर की दीवारें छोटी लगने लगेंगी, 
दीवारें छोटी हुईं तो फिर हम सड़कों पर आवारा घूमेंगे, 
आवारा घूमे तो फिर ज़माना हम पर उंगलियां उठाएगा, 
ज़माना उठाएगा तो फिर हम खुद से ही शर्माएंगे।
हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!

हम चाहते ही नहीं कि तेरी आँखों में डूब जाएं, 
आँखों में डूबे तो फिर गहराई का पता न चलेगा, 
गहराई न मिली तो फिर साँस लेना दूभर हो जाएगा, 
साँस न आई तो फिर ये जिस्म बेजान सा हो जाएगा, 
जिस्म बेजान हुआ तो फिर रूह छटपटाने लगेगी, 
रूह छटपटाई तो फिर चैन की मौत भी न आएगी। 
हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!

हम चाहते ही नहीं कि हम तुम एक दूजे के करीब आएं, 
करीब आए तो फिर दूर जाने का डर सताएगा, 
डर सताया तो फिर हम बंदिशें लगाने लगेंगे, 
बंदिशें लगीं तो फिर रिश्तों में घुटन होने लगेगी, 
घुटन हुई तो फिर हम एक-दूसरे से नफरत करेंगे, 
नफरत हुई तो फिर पुराने दिन याद आकर रुलाएंगे, 
रुलाया तो फिर ये आँखें कभी सूख न पाएंगी। 
हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!

हम चाहते ही नहीं कि तेरी आवाज़ हमारे कानों में घुले, 
आवाज़ घुली तो फिर हर आहट पर तेरा ही भ्रम होगा, 
भ्रम हुआ तो फिर हम दीवानों की तरह तुझे ढूंढेंगे, 
ढूंढा और न मिली तो फिर खुद को ही सज़ा देंगे, 
खुद को सज़ा दी तो फिर दुनिया हमें पागल कहेगी, 
पागल हुए तो फिर अपनों का दिल दुख जाएगा, 
अपनों का दिल दुखा तो हम जीते जी मर जाएंगे। 
हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!

हम चाहते ही नहीं कि तुम्हारी मुस्कुराहट पर हम मरें, 
मुस्कुराहट दिखी तो फिर सादगी का जादू चलेगा, 
जादू चला तो फिर होश-ओ-हवास खो जाएंगे, 
होश खोया तो फिर हम सही-गलत का फर्क भूलेंगे, 
फर्क भूल गए तो फिर कोई बड़ी खता हो जाएगी, 
खता हुई तो फिर ताउम्र पछताना पड़ेगा, 
पछतावा हुआ तो फिर हँसी कभी लौट के न आएगी। 
हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!

हम चाहते ही नहीं कि मोहब्बत का कोई वादा हो, 
वादा हुआ तो फिर कसमें खानी पड़ेंगी, 
कसमें खाईं तो फिर उन्हें निभाने का बोझ होगा, 
बोझ बढ़ा तो फिर ये मासूम रिश्ता झुक जाएगा, 
रिश्ता झुका तो फिर इसमें दरारें पड़ने लगेंगी, 
दरारें पड़ीं तो फिर यादें ही सहारा रह जाएंगी, 
यादें सहारा बनीं तो फिर हकीकत ज़हर लगेगी। 
हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!

हम चाहते ही नहीं कि इस आग में हम जलें, 
आग लगी तो फिर राख होना तो मुकद्दर है, 
राख हुए तो फिर हवाएं हमें उड़ा ले जाएंगी, 
हवाएं उड़ीं तो फिर हमारा कोई वजूद न रहेगा, 
वजूद न रहा तो फिर ये कहानी अधूरी रह जाएगी, 
कहानी अधूरी रही तो फिर पढ़ने वाले आहें भरेंगे, 
आहें भरी गईं तो फिर हमारा दर्द अमर हो जाएगा, 
हम चाहते ही नहीं कि हमारा दर्द नुमाइश बन जाए, 
इसीलिए हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!

_वैभव कुमार सेजवार_
#SejwarInkOfficial

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