Sunday, March 22

रूह: एक अनकहा सफ़र


परिचय ये जिस्म तो महज़ एक मिट्टी का खिलौना है, असली दास्तां तो उस नूर की है जो इसके भीतर सोता है। जिसे न आग जला सके, न वक़्त मिटा सके, वही रूह है, जिसे दुनिया का कोई तराज़ू न तौल सके।

खोज की शुरुआत कभी सन्नाटों में बैठ कर खुद से बात करना, शोर में खोई हुई उस आवाज़ को महसूस करना। वो जो सीने के पिंजरे में धड़कन से जुदा है, वही कतरा है नूर का, वही बंदे में खुदा है।

ये रूह भटकती है गलियों में सुकून की तलाश में, कभी किताबों के पन्नों में, कभी सितारों के आकाश में। मगर इसे चैन न दौलत से मिले, न शोहरत के महल से, इसे तो रूबरू होना है बस अपने ही असल से।

जुदाई का दर्द रूह एक मुसाफिर है जो बिछड़ गई है अपने घर से, तड़पती है मिलने को फिर उसी अज़ीम समंदर से। ये जिस्म तो लिबास है, जो हर रोज़ पुराना होता है, पर रूह का जज़्बा तो हर पल नया और सुहाना होता है।

जब आँखें रोती हैं, तो रूह के घाव छलकते हैं, जब दिल मुस्कुराता है, तो रूह के दीये जलते हैं। मोहब्बत क्या है? बस दो रूहों का एक तार हो जाना, खुद को खोकर, किसी और के वजूद में सवार हो जाना।

वजूद की हकीकत न ये हिंदू है, न ये मुसलमान, न ये कोई ज़ात है, ये तो कायनात की सबसे पुरानी और गहरी बात है। न इसे मौत का खौफ है, न बुढ़ापे की कोई फिक्र, इसके हर ज़र्रे में बसा है बस उस मालिक का ज़िक्र।

"मिट्टी का पुतला हूँ मैं, ये सच है पर आधा,

मेरी रूह की उड़ान है, आसमाँ से भी ज़्यादा।"

अंतिम पड़ाव एक दिन ये पिंजरा टूटेगा, ये परिंदा उड़ जाएगा, मिट्टी मिट्टी में मिलेगी, नूर नूर में मिल जाएगा। तब समझ आएगा कि सफ़र कहाँ से शुरू हुआ था, जिसे हम 'मैं' कहते थे, वो तो बस एक रूह का साया था।

तो ऐ दोस्त, इस रूह को प्यार से पालना सीख ले, जिस्म की नुमाइश छोड़, अपनी हकीकत को देख ले। क्योंकि अंत में न ये जिस्म साथ होगा, न ये जहान, बस रूह की पाकीज़गी ही बनेगी तेरी असली पहचान।

_वैभव कुमार सेजवार_
#SejwarInkOfficial

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