Monday, March 23

मुसाफिर की डायरी


​धूल से सनी एक जिल्द, और कुछ मुड़े हुए पन्ने,
इस डायरी में दफन हैं, मेरे कल के अनगिनत सपने।
पहली तारीख को लिखा था, घर छोड़ते वक्त का वो डर,
जब आंसुओं ने भिगो दिया था, मेरा ये नया सफर।

​डायरी कहती है कि रास्ते कभी खत्म नहीं होते,
बस मुसाफिर बदल जाते हैं, और मंजर पुराने होते।
किसी पन्ने पर सूखे हुए, उस पहाड़ी फूल की गंध है,
जो बताया करता था कि आज भी, मेरी रूह कितनी स्वतंत्र है।

​एक जगह लिखा है मैंने, उस बूढ़े बरगद का किस्सा,
जिसकी छांव बना था कभी, मेरी थकान का हिस्सा।
डायरी के बीच में एक नक्शा है, जो हाथ से बनाया है,
मगर दिल के रास्तों को, इसमें कौन देख पाया है?

​कलम की स्याही कहीं फीकी, तो कहीं गाढ़ी हो गई,
जैसे मेरी जिंदगी की दास्तान, थोड़ी टेढ़ी-मेढ़ी हो गई।
वो रात जब बारिश में, एक अजनबी ने पनाह दी थी,
उस एहसान की स्याही, आज भी डायरी में ताजी सी थी।

​डायरी में दर्ज है वो पल, जब मैं हारकर रोया था,
जब मैंने अपनी कीमती चीज, किसी मोड़ पर खोया था।
मगर अगले ही पन्ने पर, फिर से उठने का संकल्प है,
मुसाफिर के पास चलने के सिवा, और क्या विकल्प है?

​लिखा है कि दुनिया कितनी बड़ी, और हम कितने छोटे हैं,
हमारे अहंकार के सिक्के, रास्तों पर कितने खोटे हैं।
हर स्टेशन की टिकट, इस डायरी के सीने में दबी है,
जैसे मेरी हर याद, इस कागज़ की दुनिया में बसी है।

​अंत में बस इतना लिखा है, कि सफर कभी थमता नहीं,
जो रुक गया वो मुसाफिर, फिर डायरी में जमता नहीं।
ये डायरी नहीं, मेरे संघर्षों का एक जीता-जागता गवाह है,
वैभव की कलम से निकला, ये मेरा ही एक गुनाह है।

​लेखक: वैभव कुमार सेजवार
#SejwarInkOfficial

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