Sunday, March 22

जीवन का दर्पण


यहाँ चेहरे पे चेहरा है, 
यहाँ पहचान मुश्क़िल है, 
हकीकत और सपनों के, 
बीच की तान मुश्क़िल है। 
मिले जो राह में हँसकर, 
ज़रूरी तो नहीं अपना, 
किसी के मन के अंदर का, 
पढ़ना ज्ञान मुश्क़िल है॥

कि जैसे ओस की बूँदें, 
सुबह होने पे खो जाएँ, 
कि जैसे याद की लहरें, 
पलकों पे ही सो जाएँ। 
वही लम्हा हकीकत है, 
जिसे तुम जी सको खुल कर, 
न जाने कब ये साँसें भी, 
यादों में ही खो जाएँ॥

नफ़रत की इन दीवारों को, 
गिराना भी ज़रूरी है, 
मुहब्बत के नए गुलशन, 
सजाना भी ज़रूरी है। 
सिर्फ़ मन्दिर या मस्ज़िद में, 
खुदा मिलता नहीं साहिब, 
किसी प्यासे को पानी भी, 
पिलाना भी ज़रूरी है॥

सफ़र के मोड़ पर अक्सर, 
हमें खुद से ही लड़ना है, 
गिरे जो पाँव रस्ते में, 
तो फिर हिम्मत से बढ़ना है। 
ज़माना लाख रोकेगा, 
मगर ये याद तुम रखना, 
कि तुमको अपनी मेहनत से, 
फलक के पार चढ़ना है॥
 
पुराना कल तो बीत गया, 
उसे याद अब न तुम करना, 
नई खुशियों की आहट से, 
कभी पीछे न तुम हटना। 
ये जीवन एक मौका है, 
इसे जी भर के तुम जी लो, 
अँधेरी रात के आगे, 
कभी घुटने न तुम टेकना॥

_वैभव कुमार सेजवार_
#SejwarInkOfficial

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