कोई चेहरा मिला हमसे मगर अपना न लगा,
जैसे आईना तो था पर उसमें साया न लगा।
भीड़ में लोग बहुत थे, मगर तन्हा थे सभी,
हर किसी का था यहाँ चेहरा मगर चेहरा नहीं।
कोई मुस्कान मिली भी तो कहानी निकली,
हर खुशी के पीछे कोई पुरानी निकली।
कोई हमसे भी मिला, हाथ मिलाकर चला,
पर वो रिश्ता भी किसी मोड़ पे आकर चला।
कुछ नज़रें थीं जो चुपचाप सवाल करती रहीं,
कुछ निगाहें थीं जो बस दूर निकलती रहीं।
कोई अपना सा लगा फिर वो पराया निकला,
जैसे रेतों में कोई झिलमिल साया निकला।
कोई लम्हा था जो दिल में ही ठहर जाता था,
कोई पल था जो हवा बन के गुज़र जाता था।
हमने हर चेहरा यहाँ ध्यान से पढ़ने की चाही,
पर हर इक आँख में बस एक धुंध सी पाई।
कोई अपने भी यहाँ वक्त पे बदल जाते हैं,
जैसे मौसम की तरह लोग भी ढल जाते हैं।
कभी लगता है कोई पास बहुत है दिल के,
फिर अचानक वही दूर निकल जाता है।
कुछ अजनबी से लोग भी अजीब लगते हैं,
जो बिना बात ही दिल में उतर जाते हैं।
कभी राहों में अचानक जो मिल जाते हैं,
वो ही अक्सर हमें सबसे ज़्यादा भाते हैं।
कभी अपनों की भी महफ़िल में अकेले होते,
कभी अजनबी भी अपने से लगे होते हैं।
ये अजीब सा जहाँ है, ये अजीब से रिश्ते,
कोई अपना भी यहाँ दूर खड़ा मिलता है।
कभी आवाज़ कोई दिल को छू जाती है,
कभी खामोशी ही सब कुछ बता जाती है।
कभी मिलता है कोई बस दो कदम चलने को,
फिर वही शख़्स कहीं दूर निकल जाता है।
कभी लगता है कि दुनिया ही बदल जाएगी,
किसी अजनबी की मुस्कान अगर मिल जाए।
कभी छोटी सी मुलाकात भी याद बन जाती,
कभी पूरी सी कहानी भी अधूरी रहती।
ये अजनबी भी अजीबों का सफ़र होता है,
कभी आँसू तो कभी हल्का असर होता है।
कोई मिलता है तो लगता है कहानी होगी,
फिर वही शख़्स कहीं याद पुरानी होगी।
यही दुनिया का चलन है, यही किस्सा भी है,
कोई अपना भी यहाँ एक दिन अजनबी है।
*लेखक* _वैभव कुमार सेजवार_
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