Sunday, March 22

भीगती यादें (Drenched Memories)


स्टैंड की वो टपकती छत, 
और बारिश का वो शोर,
हाथ में उसके छतरी थी, 
पर ध्यान था किसी और छोर।
भीगी हुई पलकों में जैसे, 
कोई पुराना अफ़साना था,
वो नूरानी चेहरा मानो, 
यादों का कोई ठिकाना था।
​शहर की भीड़ में वो लड़की, 
बे-आवाज़ खड़ी रही,
जैसे वक़्त की किसी पुरानी किताब को, 
वो फिर से पढ़ी रही।
बस की तलाश थी उसे, 
या ख़ुद के खोए हुए कल की?
हर गिरती बूँद में जैसे, 
एक दास्ताँ थी हलचल की।
​उसकी फॉर्मल ड्रेस पर, 
पानी के कुछ दाग गहरे थे,
जैसे उसकी ख़ामोशी पर, 
हज़ारों पहरे थे।
मैंने चाहा कि कुछ कहूँ, 
पर उसने मुझे पहचाना नहीं,
बस आई, वो चली गई, 
पर मुमकिन उसे भुलाना नहीं।
​वह खड़ी रही वहीं मुद्दतों तक, 
बारिशों के दरमियाँ,
भीगती रही उसकी रूह, 
और जलता रहा मेरा आसमाँ।
वो चली गई मगर छोड़ गई, 
एक अधूरा सा सवाल,
क्या बारिशें सिर्फ़ पानी हैं, 
या किसी बिछड़े का मलाल?

_वैभव कुमार सेजवार_
#SejwarInkOfficial

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