Sunday, March 22

अधूरा किनारा


वो साथ जो कल तक अपना था, 
अब एक पराई राह हुआ, 
जो ख्वाब बुने थे आँखों ने, 
वो पल भर में ही स्वाह हुआ। 
अब फोन की वो रिंगटोन, 
बस एक सन्नाटा लाती है, 
तेरी यादें अब खुशबू नहीं, 
आँखों में नमी जगाती हैं।

बातों के वो सिलसिले, 
अब खामोशी में बदल गए, 
हम एक ही राह पे चलते थे, 
पर रास्ते अब निकल गए। 
गलती किसकी, क्या कहें? 
अब तो बस ये दूरी है, 
शायद जुदा होना ही अब, 
हम दोनों की मजबूरी है।

वो कैफे की मेज़ खाली है, 
और हाथ में हाथ नहीं, 
सब कुछ है यहाँ पहले सा, 
बस अब तेरा साथ नहीं। 
दिल पूछता है बार-बार— क्या वो सब बस एक सपना था? 
जो सबसे करीब था मेरे, 
क्या कभी वो वाकई अपना था?

पर ज़िंदगी तो चलती है, 
और घाव भी भर ही जाएंगे, 
हम अपनी-अपनी राहों पर, 
फिर खुद को ढूंढ पाएंगे। 
तू खुश रहे अपनी दुनिया में, 
बस यही एक दुआ है, 
जो हुआ सो हुआ, 
शायद खुदा की यही रज़ा है।

_वैभव कुमार सेजवार_
#SejwarInkOfficial

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