पहला कदम जब उठाया,
तो ज़मीन ने दी ये सीख,
कि सहारा मांगना छोड़,
मंज़िल नहीं मिलती बन भीख।
हवाओं के झोंकों ने कहा,
कि रुख मोड़ना सीखो तुम,
मुश्किलों के तूफ़ानों में,
थोड़ा और जुड़ना सीखो तुम।
पग-पग पर मिले पत्थर,
जिन्होंने संभलना सिखाया,
ठोकर खाकर गिरने वालों को,
फिर से चलना सिखाया।
चींटियों की कतार ने,
अनुशासन का पाठ पढ़ाया,
मेहनत की उस बूंद ने,
सफलता का मार्ग दिखाया।
बहते हुए झरनों ने,
मधुर संगीत सुनाया हमें,
रुकावटों को लांघकर,
आगे बढ़ना बताया हमें।
सूखे हुए पत्तों ने कहा,
कि अंत भी एक शुरुआत है,
पुराना झड़ेगा तभी तो,
नई कोपल की बात है।
एक नन्हे से बीज ने,
धैर्य का महत्व समझाया,
मिट्टी में दबकर भी उसने,
खुद को पेड़ बनाया।
धूप ने तपाकर मेरी,
सहनशक्ति को परखा है,
चांदनी ने शीतलता देकर,
मेरा मन भी हर्षा है।
पग-पग पर मिले लोग,
जो कुछ न कुछ दे गए,
कोई कड़वा कड़वा सच,
तो कोई मीठे धोखे दे गए।
सीखा कि हर मुस्कान के पीछे,
एक कहानी होती है,
और हर खामोशी के नीचे,
एक गहरी रूहानी होती है।
सीखा कि बड़ा होने के लिए,
छोटा बनना पड़ता है,
अंधेरे को मिटाने के लिए,
खुद को जलना पड़ता है।
पैर के छालों ने कहा,
कि तुम्हारी मेहनत सच्ची है,
मंजिल अब दूर नहीं,
बस इरादों की डोर कच्ची है।
हर कदम एक इम्तिहान,
हर मोड़ एक नई किताब है,
जिंदगी के इस सफर का,
कोई नहीं हिसाब है।
वैभव की ये 'पग-पग सीख',
बस एक छोटा सा अर्पण है,
रास्तों के अनुभव का,
ये एक साफ़ सा दर्पण है।
लेखक: वैभव कुमार सेजवार
#SejwarInkOfficial
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