पत्थरों पर खुदी हुई, उन रास्तों की इबारत पढ़ी है,
जिंदगी की किताब शायद, इन पगडंडियों पर ही खड़ी है।
वैभव ने जब भी देखा, मील के उस पत्थर को,
लगा कि कोई पुकार रहा है, मेरे भीतर के सफर को।
इबारत लिखी थी धूल में, कि रुकना ही मौत है,
चलते रहना ही ज़िंदगी की, सबसे बड़ी साख है।
पुराने खँडहरों ने बताया, कि वरुणा की मार क्या है,
मिट्टी में मिल जाना ही, आखिर इस संसार का सार क्या है।
कहीं लिखा था कि यहाँ, एक राही बहुत प्यासा था,
मगर उसकी हिम्मत ही, उसकी आखिरी आशा था।
मैंने पढ़ा कि हर मोड़ पर, एक नया इम्तिहान होगा,
जो लड़ गया तूफानों से, वही बड़ा इंसान होगा।
रास्तों की ये इबारत, स्याही से नहीं, पसीने से लिखी है,
वैभव की ये पहचान, इन्हीं टेढ़े-मेढ़े रास्तों से दिखी है।
किसी मोड़ पर लिखा था—"धैर्य ही सबसे बड़ी ताक़त है",
जल्दबाज़ी में भटक जाना, मुसाफिर की शामत है।
पढ़ा मैंने कि मंज़िल, सिर्फ एक मुकाम का नाम है,
मगर रास्ता ही वह जगह है, जहाँ असली काम है।
इबारत में दर्ज थे, उन पैरों के निशान जो थक गए,
और उनके भी किस्से, जो नामुमकिन को भी पा गए।
ये रास्ते नहीं, ये तो सदियों पुराने उस्ताद हैं,
इन्हीं की इबादत से, मुसाफिर आज आज़ाद हैं।
वैभव की कलम आज, इन रास्तों का शुक्रिया करती है,
इन्हीं की लिखी इबारत, मेरे शब्दों में जान भरती है।
इबारत कहती है कि, मंज़िल तो सबको मिल जाएगी,
मगर रास्तों की ये याद, उम्र भर साथ आएगी।
लिख लो अपने दिल पर, इन रास्तों का हर एक हर्फ़,
यही तो है वो दौलत, जो नहीं होती कभी भी सर्फ़।
_वैभव कुमार सेजवार_
#SejwarInkOfficial
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