कभी खुशबू की लहरों पर कोई पैगाम लिखता है, कभी खाली से पन्नों पर तुम्हारा नाम लिखता है। ये दिल का कारवां यादों की बस्ती से गुजरता जब, कभी ये सुबह लिखता है, कभी ये शाम लिखता है।
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यहाँ कोई पुरानी धुंध आँखों में समाई है, कहीं पर धूप बिखरी है, कहीं गहरी जुदाई है। मुसाफिर भावनाओं के सिसकते हैं अंधेरों में, मगर लब मुस्कुराते हैं कि महफिल ये सजाई है।
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कोई आहट डराती है, कोई उम्मीद ज़िंदा है, परिंदा मन का चाहत की मुंडेरों पर शर्मिंदा है। सफ़र ये उम्र भर का है, इसे थमना नहीं आता, कि हर इंसान भीतर से कोई हारा हुआ बंदा है।
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हज़ारों दर्द के मंज़र इसी रस्ते में आते हैं, कई चेहरे मुकम्मल हो के भी आधे नज़र आते हैं। जो अपना था, वो सपनो की किसी देहरी पे छूटा है, नये रिश्ते पुरानी धड़कनों को आज़माते हैं।
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कभी ये कारवां मासूम बचपन को टटोलेगा, कभी जज़्बात की गिरहों को धीरे से ये खोलेगा। मगर सच तो यही है, इस सफ़र की भीड़ में 'साहब', खामोशी बोल देगी जब कोई कुछ भी न बोलेगा।
_वैभव कुमार सेजवार_
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