हर बजती हुई घंटी पर दिल उछल सा जाता है,
एक अनजाना सा डर रूह को सहला जाता है।
फोन की स्क्रीन को बार-बार जलाकर बुझाता हूँ,
जैसे इस अंधेरे में,
मैं कोई रोशनी ढूँढता हूँ।
ये बेताबी का एक अलग ही आलम है।
कभी रिंगटोन बदलता हूँ,
कभी वॉल्यूम बढ़ाता हूँ,
बिना किसी काम के,
बस नोटिफिकेशन चेक कर आता हूँ।
वो जो एक वाइब्रेशन होता है मेज़ की लकड़ी पर,
जैसे कोई दस्तक दे रहा हो,
मेरे सब्र की दहलीज पर।
पर वो कॉल तुम्हारा नहीं होता।
सोचता हूँ खुद कर लूँ,
पर उंगलियाँ काँप जाती हैं,
पुरानी बातें,
पुराने झगड़े,
दीवार बन जाते हैं।
शायद तुम भी फोन हाथ में लिए बैठी होगी,
शायद तुम भी मेरी तरह,
अपनी ही ज़िद से हारी होगी।
दो तरफा खामोशी का ये खेल अजीब है।
रात के दो बजे हैं और फोन अब भी खामोश है,
ये इंतज़ार अब धीरे-धीरे बन रहा एक दोष है।
बैटरी सौ फीसदी है,
पर उम्मीदें घटती जा रही हैं,
नींद की परछाइयाँ अब मुझे डराने आ रही हैं।
पर आँखें सिर्फ एक कॉल पर टिकी हैं।
वो एक कॉल जो शायद सब कुछ ठीक कर दे,
जो इस खालीपन को फिर से अपनी आवाज़ से भर दे।
कल फिर सुबह होगी,
फिर वही दिन गुज़रेगा,
पर ये फोन,
ये इंतज़ार... जाने कब खत्म होगा?
तुम्हारी आवाज़ सुनने की हसरत अधूरी है।
_वैभव कुमार सेजवार_
#SejwarInkOfficial
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