रात खामोश खड़ी है, रास्ते जाग रहे हैं,
हम मुसाफ़िर की तरह बस कदम भाग रहे हैं।
चाँद ऊपर से हमें देख मुस्काता रहता है,
जैसे कोई पुराना दोस्त बुलाता रहता है।
हवा धीरे से आकर कुछ कहानी कह जाती,
कोई भूली हुई यादें फिर जगाकर जाती।
रात की गोद में अक्सर दिल बहक जाता है,
कोई पुराना सा सपना फिर चमक जाता है।
रास्ते लंबी कहानी की तरह लगते हैं,
हर मोड़ पे कुछ अफ़साने से छिपे रहते हैं।
कहीं सन्नाटा है ऐसा कि दिल डर जाता है,
कहीं जुगनू सा उजाला भी नज़र आता है।
कभी थक कर ये कदम रुक से भी जाते हैं मगर,
रात कहती है अभी सफ़र बाकी है इधर।
कभी लगता है कि जैसे कोई अपना है पास,
फिर अचानक ही हवा छोड़ के जाती है एहसास।
कभी पेड़ों की परछाईं हमें छू जाती है,
जैसे बचपन की कोई बात याद दिलाती है।
कभी सड़कों की लकीरें भी ग़ज़ल लगती हैं,
कभी खामोश इमारत भी महल लगती है।
कभी लगता है ये दुनिया ही ठहर सी गई,
बस ये रात और ये रास्ते ही रह गए अभी।
कभी दिल सोचता है किस तरफ जाना है,
कभी किस्मत कहती है बस यूँ ही चल जाना है।
कभी मंज़िल का खयालों में उजाला आता,
कभी तन्हाई का बादल भी घिरा रह जाता।
कभी हम खुद से ही बातें भी किया करते हैं,
कभी खामोशी से भी दोस्ती किया करते हैं।
कभी लगता है ये रात हमें समझती है,
हर धड़कन की कहानी जैसे पढ़ती है।
कभी ये रास्ते हमसे सवाल करते हैं,
कहाँ से आए हो और कहाँ चल पड़े हो।
मगर जवाब में बस मुस्कुरा देते हैं हम,
क्योंकि सफ़र ही अब अपनी पहचान बने।
ये रात, ये रास्ते और ये चलते कदम,
इनमें ही अब हमारी कहानी बसती है।
कभी सूरज की किरण आके बता जाती है,
कि हर अँधेरी घड़ी के बाद सुबह आती है।
मगर फिर भी ये रातें हमें प्यारी लगती,
इनमें खोकर ही तो दुनिया से दूरी लगती।
ये रात, ये रास्ते और ये सफ़र के हम,
कभी तन्हा भी सही पर कभी कम भी नहीं।
क्योंकि चलते हुए इंसान बदल जाते हैं,
और ये रास्ते ही हमें खुद से मिला जाते हैं।
लेखक:-वैभव कुमार सेजवार
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