कोई अमराई गाती है, कोई पगडंडी मुस्काती है,
जब भोर सुनहरी आती है, हर आँख खुशी से भर जाती है।
वह मटमैली सी राहों पर, जब सूरज तिलक लगाता है,
तब जाग रही मिट्टी की खुशबू, मन में मीठा रस घोलती है।
कोई दीवाना कहता है, ये शोर शहर का पागल है,
पर देखो गाँव की शांति में, कितना गहरा जादू पल है।
वह ओस की बूंदें घास पर, मोती सी चमक बिखराती हैं,
और दूर कहीं पनघट पर, पायल की धुनें इठलाती हैं।
वह चूल्हे का धुआं सा, आकाश में जो बल खाता है,
वह याद दिलाता है हमको, जो बचपन हम भूल आए हैं।
कोई पूछे अगर हमसे, क्या स्वर्ग कहीं पर देखा है?
तो हम बस गाँव की सुबह का, एक चित्र दिखा देते हैं।
लेखक:-वैभव कुमार सेजवार
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