वक़्त की धूल उड़ती है और यादें साथ चलती हैं,
वैभव के इस कारवां में, नई उम्मीदें पलती हैं।
निकल पड़ा था अकेला, हाथ में बस एक ख़्वाब था,
मगर तजुर्बों का ये लश्कर, कितना ला-जवाब था।
कारवां में शामिल हुए, वो लोग जो राह में मिले,
कुछ ने दिए ज़ख्म गहरे, कुछ ने खिलाए फूल-गिले।
धूप में जलते हुए पाँवों ने, बर्दाश्त करना सीख लिया,
भीड़ में रहकर भी रूह ने, एकांत जीना सीख लिया।
इस कारवां का हर पड़ाव, एक नया सबक दे गया,
कोई मुस्कुराकर मिला, तो कोई आँसू दे गया।
वैभव ने देखा कि रास्तों का कोई अंत नहीं होता,
जो अनुभव से न सीखे, उसका कोई वसंत नहीं होता।
कारवां बढ़ता रहा और बोझ कंधों का बढ़ता गया,
जैसे-जैसे मंज़िल आई, अहंकार दिल से छँटता गया।
सच्चाई का ये कारवां, झूठ की बस्ती से गुज़रा है,
तभी तो आज मेरा चेहरा, इस कदर निखरा है।
सीखा कि साथ चलने वाले, हमेशा साथ नहीं देते,
कुछ बस मंज़िल आने तक, अपना हाथ नहीं देते।
मगर जो दिल से जुड़ गए, वो रूह का हिस्सा बन गए,
वही तो इस कारवां के, सबसे हसीन किस्सा बन गए।
अनुभव की इस पोटली में, कड़वे-मीठे बोल रखे हैं,
मैंने अपनी ज़िंदगी के, सारे राज़ खोल रखे हैं।
वैभव का ये कारवां, अब रुकने वाला नहीं है,
मुश्किलों के आगे ये सिर, अब झुकने वाला नहीं है।
लिखता हूँ ये दास्ताँ, आने वाले मुसाफिरों के लिए,
कि कारवां ही मंज़िल है, दिल के मुसाफिरों के लिए।
जितना चला हूँ मैं, उतना ही मैंने खुद को पाया है,
अनुभव का ये कारवां, खुदा का ही एक साया है।
_वैभव कुमार सेजवार_
#SejwarInkOfficial
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