हर प्रेम...
मंज़िल तक पहुँचे...
यह ज़रूरी नहीं होता...
कुछ प्रेम...
रास्तों में बिछड़कर भी...
उम्र भर साथ चलते हैं...
...
तुम्हारा नाम...
अब मेरी ज़ुबान पर कम...
मेरी ख़ामोशियों में ज़्यादा रहता है...
...
मैंने...
तुम्हें भूलने की कोशिश नहीं की...
क्योंकि...
जो दिल में उतर जाए...
उसे याद नहीं किया जाता...
वह तो...
हर पल महसूस होता है...
...
कभी-कभी...
रिश्ते ख़त्म हो जाते हैं...
लेकिन...
उनकी दुआएँ...
आख़िरी साँस तक ज़िंदा रहती हैं...
...
तुम...
मेरी ज़िंदगी की...
वह अधूरी ग़ज़ल हो...
जिसका हर शेर...
आज भी दिल में गूँजता है...
...
मैंने...
मोहब्बत में...
कभी जीतना नहीं चाहा...
मैं तो बस...
तुम्हें मुस्कुराते देखना चाहता था...
...
अगर...
तुम किसी और की दुनिया हो...
तो भी...
मेरी दुआओँ में...
तुम्हारा आसमान...
हमेशा साफ़ रहेगा...
...
समय...
बहुत कुछ बदल देता है...
चेहरे...
रिश्ते...
शहर...
लेकिन...
कुछ एहसास...
समय से भी बड़े होते हैं...
...
तुम्हें खोकर...
मैंने यह सीखा...
कि...
हर अपना...
हमेशा साथ नहीं रहता...
लेकिन...
हर सच्चा प्रेम...
हमेशा दिल में रहता है...
...
अगर...
कभी बारिश में भीगना...
तो...
एक पल आँखें बंद कर लेना...
शायद...
मेरी कोई अधूरी दुआ...
बारिश की बूँद बनकर...
तुम तक पहुँच जाए...
...
और...
अगर किसी दिन...
हम फिर मिलें...
तो...
अजनबियों की तरह नहीं...
उन दो रूहों की तरह मिलेंगे...
जिन्होंने...
एक-दूसरे को कभी छोड़ा नहीं...
बस...
किस्मत ने...
उनके रास्ते अलग कर दिए...
...
क्योंकि...
सच्चा प्रेम...
मिलने से नहीं...
निभाने से अमर होता है...
— Written & Composed by Vaibhav Kumar Sejwar
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