उसके जाने के बाद
मैंने जीना तो नहीं छोड़ा...
बस जीने की वजह खो दी।
लोग कहते हैं,
"वक्त सब ठीक कर देता है..."
पर कोई उनसे पूछे...
अगर वक्त ही इलाज होता,
तो रात के दो बजे
तकिए आज भी भीगे क्यों होते?
मैंने उसे कभी रोकना नहीं चाहा...
क्योंकि मोहब्बत कैद नहीं होती।
बस एक उम्मीद थी...
कि जाते-जाते
वो एक बार पलटकर देख लेगा,
और कहेगा—
"चलो... वापस चलते हैं।"
लेकिन...
कुछ लोग पलटकर नहीं देखते।
उन्हें सिर्फ़ जाना आता है।
और पीछे रह जाता है...
एक कमरा,
कुछ पुरानी तस्वीरें,
कुछ अधूरे ख़त,
और एक इंसान...
जो हर मुस्कान के पीछे
अपना टूटा हुआ दिल छिपाता रहता है।
अब तो उसकी याद भी
मेरी आदत बन चुकी है।
सुबह उसकी कमी से शुरू होती है,
और रात...
उसी के नाम पर खत्म।
सब पूछते हैं—
"तुम इतने ख़ामोश क्यों हो गए?"
मैं मुस्कुरा देता हूँ...
क्योंकि किसे बताऊँ,
कुछ दर्द ऐसे होते हैं
जो आवाज़ नहीं करते...
बस इंसान को अंदर ही अंदर ख़त्म करते रहते हैं।
कभी-कभी आईने के सामने खड़ा होकर
मैं खुद से पूछता हूँ—
"क्या सच में मेरी कोई गलती थी?"
फिर याद आता है...
मोहब्बत में हमेशा गलती किसी की नहीं होती,
कभी-कभी किस्मत ही
दो सच्चे दिलों को
एक कहानी नहीं बनने देती।
आज भी
अगर कहीं उसका नाम सुन लूँ,
तो दिल एक पल के लिए
वैसे ही धड़क उठता है...
जैसे उसे खोया ही न हो।
पर अगले ही पल
हक़ीक़त धीरे से कान में कहती है—
"जिसे तुम अपना घर समझ बैठे थे...
वो तो बस सफ़र का एक मुसाफ़िर था।"
और जानते हो...
सबसे ज़्यादा दर्द
रो लेने में नहीं होता...
दर्द तब होता है,
जब आँसू भी थक जाते हैं,
लेकिन इंतज़ार नहीं थकता।
जब दुआएँ ख़ामोश हो जाती हैं,
लेकिन दिल
अब भी उसी एक नाम को पुकारता रहता है।
अगर कभी
मेरी कब्र पर आना...
तो फूल मत लाना।
बस इतना कहना—
"कोई था...
जिसने आख़िरी साँस तक
सच्ची मोहब्बत निभाई थी।"
शायद...
उस दिन मेरी रूह पहली बार
सुकून से मुस्कुरा दे।
Written & Composed by Vaibhav Kumar Sejwar
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