Saturday, July 11

कुछ लोग बिछड़कर भी अपने रह जाते हैं...

कुछ लोग बिछड़कर भी अपने रह जाते हैं...

हर प्रेम...

मंज़िल तक पहुँचे...

यह ज़रूरी नहीं होता...

कुछ प्रेम...

रास्तों में बिछड़कर भी...

उम्र भर साथ चलते हैं...

...

तुम्हारा नाम...

अब मेरी ज़ुबान पर कम...

मेरी ख़ामोशियों में ज़्यादा रहता है...

...

मैंने...

तुम्हें भूलने की कोशिश नहीं की...

क्योंकि...

जो दिल में उतर जाए...

उसे याद नहीं किया जाता...

वह तो...

हर पल महसूस होता है...

...

कभी-कभी...

रिश्ते ख़त्म हो जाते हैं...

लेकिन...

उनकी दुआएँ...

आख़िरी साँस तक ज़िंदा रहती हैं...

...

तुम...

मेरी ज़िंदगी की...

वह अधूरी ग़ज़ल हो...

जिसका हर शेर...

आज भी दिल में गूँजता है...

...

मैंने...

मोहब्बत में...

कभी जीतना नहीं चाहा...

मैं तो बस...

तुम्हें मुस्कुराते देखना चाहता था...

...

अगर...

तुम किसी और की दुनिया हो...

तो भी...

मेरी दुआओँ में...

तुम्हारा आसमान...

हमेशा साफ़ रहेगा...

...

समय...

बहुत कुछ बदल देता है...

चेहरे...

रिश्ते...

शहर...

लेकिन...

कुछ एहसास...

समय से भी बड़े होते हैं...

...

तुम्हें खोकर...

मैंने यह सीखा...

कि...

हर अपना...

हमेशा साथ नहीं रहता...

लेकिन...

हर सच्चा प्रेम...

हमेशा दिल में रहता है...

...

अगर...

कभी बारिश में भीगना...

तो...

एक पल आँखें बंद कर लेना...

शायद...

मेरी कोई अधूरी दुआ...

बारिश की बूँद बनकर...

तुम तक पहुँच जाए...

...

और...

अगर किसी दिन...

हम फिर मिलें...

तो...

अजनबियों की तरह नहीं...

उन दो रूहों की तरह मिलेंगे...

जिन्होंने...

एक-दूसरे को कभी छोड़ा नहीं...

बस...

किस्मत ने...

उनके रास्ते अलग कर दिए...

...

क्योंकि...

सच्चा प्रेम...

मिलने से नहीं...

निभाने से अमर होता है...

— Written & Composed by Vaibhav Kumar Sejwar

तुम सिर्फ़ एक एहसास नहीं हो...

तुम सिर्फ़ एक एहसास नहीं हो...

तुम...

सिर्फ़ मेरी कहानी का किरदार नहीं हो...

तुम...

उस कहानी का अर्थ हो...

जिसे मैं हर रोज़...

अपने दिल में जीता हूँ...

...

लोग पूछते हैं...

"इतना क्यों याद करते हो उसे...?"

मैं बस मुस्कुरा देता हूँ...

क्योंकि...

कुछ रिश्ते...

सवालों से नहीं...

एहसासों से समझे जाते हैं...

...

तुम्हें देखकर...

मुझे कभी मोहब्बत नहीं हुई...

मुझे...

घर जैसा सुकून मिला...

...

अगर...

किस्मत हमें एक न कर सकी...

तो इसका मतलब यह नहीं...

कि हमारा प्रेम अधूरा था...

अधूरी तो...

बस हमारी मुलाक़ातें थीं...

...

तुम...

मेरी उस दुआ की तरह हो...

जिसे...

ईश्वर ने शायद...

सुन तो लिया...

मगर...

पूरा नहीं किया...

...

मैंने...

तुम्हें कभी अपनी ज़िद नहीं बनाया...

क्योंकि...

प्रेम...

ज़िद से नहीं...

समर्पण से जीता जाता है...

...

एक दिन...

यह शरीर मिट जाएगा...

वक्त भी बदल जाएगा...

लेकिन...

तुम्हारे लिए निकली हुई...

मेरी सच्ची दुआएँ...

कभी नहीं मिटेंगी...

...

अगर...

कभी किसी मोड़ पर...

तुम्हें मेरी याद आए...

तो...

अपने दिल पर हाथ रखकर देखना...

हो सकता है...

उसी पल...

मेरी दुआ...

तुम्हारी धड़कनों से गुज़र रही हो...

...

कुछ लोग...

तस्वीरों से निकल जाते हैं...

लेकिन...

यादों से कभी नहीं...

तुम भी...

मेरी यादों की वही...

सबसे खूबसूरत तस्वीर हो...

...

मैंने...

तुमसे सिर्फ़ प्रेम नहीं किया...

मैंने...

तुम्हें सम्मान दिया...

तुम पर विश्वास किया...

और...

हर दुआ में...

तुम्हारा नाम छिपाकर रखा...

...

अगर...

मेरे हिस्से में...

तुम्हारा साथ नहीं लिखा...

तो भी...

मेरे हिस्से में...

तुम्हें चाहना...

ज़रूर लिखा गया था...

...

और...

जब कभी...

मेरी कहानी लिखी जाएगी...

तो लोग यह नहीं पूछेंगे...

"वह तुम्हें मिली या नहीं...?"

वे यह कहेंगे...

"किसी ने...

इतनी ख़ामोशी से भी...

इतना गहरा प्रेम किया था..."

— Written & Composed by Vaibhav Kumar Sejwar

प्रेम

प्रेम...

सिर्फ़ धड़कनों का रिश्ता नहीं...

यह दो आत्माओं के बीच...

ईश्वर की सबसे ख़ामोश भाषा है...

...

किसी ने पूछा...

"इतना प्रेम क्यों करते हो उससे...?"

मैंने मुस्कुराकर कहा...

"क्योंकि वजह से किया गया प्रेम...

वजह बदलते ही बदल जाता है..."

...

मैंने...

तुम्हें पाने से पहले भी चाहा था...

और...

अगर कभी खो भी दिया...

तो चाहना नहीं छोड़ूँगा...

...

प्रेम...

हर दिन मिलने का नाम नहीं...

हर दिन...

एक ही इंसान के लिए...

दुआ करने का नाम है...

...

तुम्हें शायद...

कभी एहसास भी न हो...

कि...

मेरी हर ख़ुशी की शुरुआत...

तुम्हारी मुस्कान से होती है...

...

कुछ लोग...

ज़िंदगी में इसलिए नहीं आते...

कि हमेशा साथ रहें...

कुछ लोग इसलिए आते हैं...

ताकि हमें...

सच्चे प्रेम का अर्थ सिखा जाएँ...

...

मैंने...

कभी तुम्हें अपनी ज़िंदगी नहीं कहा...

क्योंकि...

ज़िंदगी तो एक दिन ख़त्म हो जाती है...

तुम...

मेरी रूह की वह कहानी हो...

जो कभी ख़त्म नहीं होगी...

...

अगर...

प्रेम में कोई परीक्षा होती है...

तो उसका सबसे कठिन प्रश्न...

"इंतज़ार" होता है...

और...

सबसे सुंदर उत्तर...

"विश्वास..."

...

तुम्हारी आवाज़...

आज भी...

मेरे दिल की सबसे प्यारी धुन है...

जिसे...

समय भी पुराना नहीं कर पाया...

...

एक बात याद रखना...

जिस रिश्ते में...

सम्मान मर जाता है...

वहाँ प्रेम...

ज़्यादा दिन ज़िंदा नहीं रहता...

...

मैं...

आज भी...

हर रात...

तारों से यही कहता हूँ...

अगर वह मुस्कुरा रही हो...

तो मेरी तरफ़ से...

एक दुआ और पहुँचा देना...

...

तुम...

मेरी उस कविता की तरह हो...

जिसे...

मैंने कभी पूरा नहीं लिखा...

फिर भी...

वह मेरी सबसे सुंदर रचना बन गई...

...

अगर...

कभी हमारी कहानी...

लोगों को अधूरी लगे...

तो उन्हें कह देना...

हर प्रेम कहानी का...

मंज़िल तक पहुँचना ज़रूरी नहीं होता...

कुछ कहानियाँ...

दिल तक पहुँचकर ही...

अमर हो जाती हैं...

...

और...

जिस दिन...

मेरी आख़िरी साँस चलेगी...

उस दिन भी...

मेरे होंठों पर...

कोई शिकायत नहीं होगी...

सिर्फ़ एक दुआ होगी...

"जहाँ भी रहो... खुश रहो..."

क्योंकि...

सच्चा प्रेम...

कभी किसी को पाने की ज़िद नहीं करता...

वह...

उसकी खुशियों में...

अपनी पूरी दुनिया ढूँढ़ लेता है...

— Written & Composed by Vaibhav Kumar Sejwar

उसके जाने के बाद...



उसके जाने के बाद
मैंने जीना तो नहीं छोड़ा...

बस जीने की वजह खो दी।

लोग कहते हैं,
"वक्त सब ठीक कर देता है..."

पर कोई उनसे पूछे...

अगर वक्त ही इलाज होता,
तो रात के दो बजे
तकिए आज भी भीगे क्यों होते?

मैंने उसे कभी रोकना नहीं चाहा...

क्योंकि मोहब्बत कैद नहीं होती।

बस एक उम्मीद थी...

कि जाते-जाते
वो एक बार पलटकर देख लेगा,

और कहेगा—

"चलो... वापस चलते हैं।"

लेकिन...

कुछ लोग पलटकर नहीं देखते।

उन्हें सिर्फ़ जाना आता है।

और पीछे रह जाता है...

एक कमरा,

कुछ पुरानी तस्वीरें,

कुछ अधूरे ख़त,

और एक इंसान...

जो हर मुस्कान के पीछे
अपना टूटा हुआ दिल छिपाता रहता है।

अब तो उसकी याद भी
मेरी आदत बन चुकी है।

सुबह उसकी कमी से शुरू होती है,

और रात...

उसी के नाम पर खत्म।

सब पूछते हैं—

"तुम इतने ख़ामोश क्यों हो गए?"

मैं मुस्कुरा देता हूँ...

क्योंकि किसे बताऊँ,

कुछ दर्द ऐसे होते हैं

जो आवाज़ नहीं करते...

बस इंसान को अंदर ही अंदर ख़त्म करते रहते हैं।

कभी-कभी आईने के सामने खड़ा होकर

मैं खुद से पूछता हूँ—

"क्या सच में मेरी कोई गलती थी?"

फिर याद आता है...

मोहब्बत में हमेशा गलती किसी की नहीं होती,

कभी-कभी किस्मत ही

दो सच्चे दिलों को

एक कहानी नहीं बनने देती।

आज भी

अगर कहीं उसका नाम सुन लूँ,

तो दिल एक पल के लिए

वैसे ही धड़क उठता है...

जैसे उसे खोया ही न हो।

पर अगले ही पल

हक़ीक़त धीरे से कान में कहती है—

"जिसे तुम अपना घर समझ बैठे थे...
वो तो बस सफ़र का एक मुसाफ़िर था।"

और जानते हो...

सबसे ज़्यादा दर्द

रो लेने में नहीं होता...

दर्द तब होता है,

जब आँसू भी थक जाते हैं,

लेकिन इंतज़ार नहीं थकता।

जब दुआएँ ख़ामोश हो जाती हैं,

लेकिन दिल

अब भी उसी एक नाम को पुकारता रहता है।

अगर कभी

मेरी कब्र पर आना...

तो फूल मत लाना।

बस इतना कहना—

"कोई था...
जिसने आख़िरी साँस तक
सच्ची मोहब्बत निभाई थी।"

शायद...

उस दिन मेरी रूह पहली बार

सुकून से मुस्कुरा दे।

Written & Composed by Vaibhav Kumar Sejwar

Wednesday, July 8

बारिश और तुम


पहली बारिश की पहली बूंद जब ज़मीं को छू जाती है,
वैसे ही तेरी याद मेरे दिल में ख़ामोशी से उतर जाती है।

भीगी हवाओं में तेरे नाम की ख़ुशबू घुल जाती है,
हर गिरती बूंद मुझे तेरी मुस्कान याद दिलाती है।

चलो आज फिर उसी बारिश में खो जाएँ,
बिना कुछ कहे एक-दूजे की धड़कनों को सुन जाएँ।

तेरे हाथों की गर्माहट और मौसम की ठंडी फुहार,
बस इतना ही काफ़ी है, बन जाए हर लम्हा त्यौहार।

बादलों की ओट में चाँद भी मुस्कुराने लगता है,
जब तू मेरी बाँहों में सिमटकर शर्माने लगता है।

बारिश थम भी जाए तो क्या फ़र्क़ पड़ता है,
तेरे साथ बिताया हर पल उम्र भर बरसता है।

अगर मोहब्बत का कोई सबसे हसीन मौसम है,
तो वो बारिश नहीं... तेरे साथ भीगना है। ❤️🌧️


Written & Composed by Vaibhav Kumar Sejwar

कुछ लम्हे याद के

अप्रैल का महीना था।
 बादाम की डालियां फूलों से लद गई थीं और हवा में बर्फ़ीली ख़ुनकी के बावजूद बहार की लताफ़त आ गई थी।
 बुलंद-ओ-बाला तंगों के नीचे मख़मलीं दूब पर कहीं कहीं बर्फ़ के टुकड़े सपीद फूलों की तरह खिले हुए नज़र आ रहे थे। 
अगले माह तक ये सपीद फूल इसी दूब में जज़्ब हो जाऐंगे और दूब का रंग गहरा सब्ज़ हो जाएगा और बादाम की शाख़ों पर हरे हरे बादाम पुखराज के नगीनों की तरह झिलमिलाएंगे और नीलगूं पहाड़ों के चेहरों से कोहरा दूर होता जाएगा और इस झील के पुल के पार पगडंडी की ख़ाक मुलाइम भेड़ों की जानी-पहचानी बा आ आ आ से झनझना उठेगी और फिर इन बुलंद-ओ-बाला तंगों के नीचे चरवाहे भेड़ों के जिस्मों से सर्दियों की पली हुई मोटी मोटी गफ़ ऊन गरमियों में कुतरते जाऐंगे और गीत गाते जाऐंगे।

लेकिन अभी अप्रैल का महीना था। 
अभी तंगों पर पत्तियाँ ना फूटी थीं। 
अभी पहाड़ों पर बर्फ़ का कोहरा था। 
अभी पगडंडी का सीना भेड़ों की आवाज़ से गूँजा ना था। 
अभी सम्मल की झील पर कंवल के चराग़ रौशन ना हुए थे। 
झील का गहरा सब्ज़ पानी अपने सीने के अंदर उन लाखों रूपों को छुपाए बैठा था जो बहार की आमद पर यकायक उस की सतह पर एक मासूम और बेलौस हंसी की तरह खिल जाऐंगे। 
पुल के किनारे किनारे बादाम के पेड़ों की शाख़ों पर शगूफ़े चमकने लगे थे। अप्रैल में ज़मिस्तान की आख़िरी शब में जब बादाम के फूल जागते हैं और बहार के नक़ीब बन कर झील के पानी में अपनी किश्तियां तैराते हैं। फूलों के नन्हे नन्हे शिकारे सतह-ए-आब पर रक़्साँ-ओ-लर्ज़ां बहार की आमद के मुंतज़िर हैं।

पुल के जंगले का सहारा लेकर में एक अरसे से उस का इंतेज़ार कर रहा था। सै पहर ख़त्म हो गई। 
शाम आ गई, झील वलर को जाने वाले हाऊस बोट, पुल की संगलाख़ी मेहराबों के बीच में से गुज़र गए और अब वो उफ़ुक़ की लकीर पर काग़ज़ की नाव की तरह कमज़ोर और बेबस नज़र आ रहे थे। 
शाम का क़िरमज़ी रंग आसमान के इस किनारे से उस किनारे तक फैलता गया और क़िरमज़ी से सुरमई और सुरमई से सियाह होता गया। हत्ता कि बादाम के पेड़ों की क़तार की ओट में पगडंडी भी सो गई और फिर रात के सन्नाटे में पहला तारा किसी मुसाफ़िर के गीत की तरह चमक उठा। हवा की ख़ुनकी तेज़-तर होती गई और नथने उस के बर्फ़ीले लम्स से सुन्न हो गए।

और फिर चांद निकल आया।

और फिर वो आ गई।

तेज़ तेज़ क़दमों से चलती हुई, बल्कि पगडंडी के ढलान पर दौड़ती हुई, वो बिलकुल मेरे क़रीब आ के रुक गई। 
उसने आहिस्ता से कहा।

हाय!

उस की सांस तेज़ी से चल रही थी, फिर रुक जाती, फिर तेज़ी से चलने लगती। 
उसने मेरे शाने को अपनी उंगलीयों से छुवा और फिर अपना सर वहां रख दिया और उस के गहरे सियाह बालों का परेशान घना जंगल दूर तक मेरी रूह के अंदर फैलता चला गया और मैंने उस से कहा “सै पहर से तुम्हारा इंतिज़ार कर रहा हूँ।”

उसने हंसकर कहा। 
“अब रात हो गई है, बड़ी अच्छी रात है।”

उसने अपना कमज़ोर नन्हा छोटा सा हाथ मेरे दूसरे शाने पर रख दिया और जैसे बादाम के फूलों से भरी शाख़ झुक कर मेरे कंधे पर सो गई।

देर तक वो ख़ामोश रही। 
देर तक मैं ख़ामोश रहा। 
फिर वो आप ही आप हंसी, बोली “अब्बा मेरे पगडंडी के मोड़ तक मेरे साथ आए थे, क्यों कि मैंने कहा, मुझे डर लगता है। 
आज मुझे अपनी सहेली रज्जो के घर सोना है, सोना नहीं जागना है। क्योंकि बादाम के पहले शगूफ़ों की ख़ुशी में हम सब सहेलियाँ रात-भर जागेंगी और गीत गाएँगी और मैं तो सै पहर से तैयारी कर रही थी, इधर आने की। 
लेकिन धान साफ़ करना था और कपड़ों का ये जोड़ा जो कल धोया था आज सूखा ना था। 
उसे आग पर सुखाया और अम्मां जंगल से लकड़ियाँ चुनने गई थीं वो अभी आई ना थीं और जब तक वो ना आतीं मैं मक्की के भुट्टे और ख़ुश्क ख़ूबानीयाँ और जरवालो तुम्हारे लिए कैसे ला सकती हूँ। 
देखो ये सब कुछ लाई हूँ तुम्हारे लिए। 
हाय तुम सच-मुच ख़फ़ा खड़े हो। 
मेरी तरफ़ देखो में आ गई हूँ। 
आज पूरे चांद की रात है। 
आओ किनारे लगी हुई कश्ती खोलें और झील की सैर करें।”

उसने मेरी आँखों में देखा और मैंने उस की मुहब्बत और हैरत में गुम पुतलीयों को देखा, जिनमें उस वक़्त चांद चमक रहा था और ये चांद मुझसे कह रहा था, जाओ कश्ती खोल के झील के पानी पर सैर करो। आज बादाम के पीले शगूफ़ों का मुसर्रत भरा त्यौहार है। 
आज उसने तुम्हारे लिए अपनी सहेलीयों अपने अब्बा, अपनी नन्ही बहन और अपने बड़े भाई सबको फ़रेब में रखा है, क्योंकि आज पूरे चांद की रात है और बादाम के सपीद ख़ुश्क शगूफ़े बर्फ़ के गालों की तरह चारों तरफ़ फैले हुए हैं और कश्मीर के गीत उस की छातीयों में बच्चे के दूध की तरह उमड़ आए हैं। 
उस की गर्दन में तुमने मोतीयों की ये सत-लड़ी देखी। 
ये सुर्ख़ सत-लड़ी उस के गले में डाल दी और उस से कहा, “तो आज रात-भर जागेगी। 
आज कश्मीर की बहार की पहली रात है। 
आज तेरे गले में कश्मीर के गीत यूं खिलेंगे, जैसे चाँदनी-रात में ज़ाफ़रान के फूल खिलते हैं। 
ये सुर्ख़ सत-लड़ी पहन ले।”

चांद ने ये सब कुछ उस की हैरान पुतलीयों से झांक के देखा फिर यकायक कहीं किसी पेड़ पर एक बुलबुल नग़मासरा हो उठी और कश्तियों में चिराग़ झिलमिलाने लगे और तंगों से परे बस्ती में गीतों की मद्धम सदा बुलंद हुई। 
गीत और बच्चों के क़हक़हे और मर्दों की भारी आवाज़ें और नन्हे बच्चों के रोने की मीठी सदाएँ और छतों से ज़िन्दगी का आहिस्ता-आहिस्ता सुलगता हुआ धुआँ और शाम के खाने की महक, मछली और भात और कड़म के साग का नरम नमकीन और लतीफ़ ज़ायक़ा और पूरे चांद की रात का बहार आफ़रीं जोबन। 
मेरा ग़ुस्सा धुल गया। 
मैंने उस का हाथ अपने हाथ में ले लिया और उस से कहा, “आओ चलें झील पर।”

पुल गुज़र गया। पगडंडी गुज़र गई, बादाम के दरख़्तों की क़तार ख़त्म हो गई। तल्ला गुज़र गया। 
अब हम झील के किनारे किनारे चल रहे थे। 
झाड़ियों में मेंढ़क बोल रहे थे। 
मेंढ़क और झींगुर और बीनड़े, उनकी बेहंगम सदाओं का शोर भी एक नग़मा बन गया था। 
एक ख़्वाब-नाक सिम्फ़नी और सोई हुई झील के बीच में चांद की कश्ती खड़ी थी। 
साकिन चुप-चाप, मुहब्बत के इंतेज़ार में, हज़ारों साल से इसी तरह खड़ी थी। 
मेरी और उस की मुहब्बत की मुन्तज़िर, तुम्हारी और तुम्हारे महबूब की मुस्कुराहट की मुन्तज़िर, इन्सान के इन्सान को चाहने की आरज़ू की मुन्तज़िर। ये पूरे चांद की हसीन पाकीज़ा रात किसी कुँवारी के बे छूए जिस्म की तरह मुहब्बत के मुक़द्दस लम्स की मुन्तज़िर है।

कश्ती ख़ूबानी के एक पेड़ से बंधी थी। 
जो बिलकुल झील के किनारे उगा था। 
यहां पर ज़मीन बहुत नर्म थी और चांदनी पत्तों की ओट से छनती हुई आ रही थी और मेंढ़क हौले हौले गा रहे थे और झील का पानी बार-बार किनारे को चूमता जाता था और उस के चूमने की सदा बार-बार हमारे कानों में आ रही थी। 
मैंने दोनों हाथ, उस की कमर में डाल दिए और उसे ज़ोर ज़ोर से अपने सीने से लगा लिया। 
झील का पानी बार-बार किनारे को चूम रहा था। 
पहले मैंने उस की आँखें चूमीं और झील की सतह पर लाखों कंवल खिल गए। 
फिर मैंने उस के रुख़्सार चूमे और नरम हवाओं के लतीफ़ झोंके यकायक बुलंद होके सदहा गीत गाने लगे। 
फिर मैंने उस के होंट चूमे और लाखों मंदिरों, मस्जिदों और कलीसाओं में दुआओं का शोर बुलंद हुआ और ज़मीन के फूल और आसमान के तारे और हवाओं में उड़ने वाले बादल सब मिल के नाचने लगे। 
फिर मैंने उस की ठोढ़ी को चूमा और फिर उस की गर्दन के पेचो ख़म को, और कंवल खिलते खिलते सिमटते गए कलीयों की तरह और गीत बुलंद हो हो के मद्धम होते गए और नाच धीमा पड़ता पड़ता रुक गया। 
अब वही मेंढ़क की आवाज़ थी। 
वही झील के नरम नरम बोसे और कोई छाती से लगा सिसकियाँ ले रहा था।

मैंने आहिस्ता से कश्ती खोली। 
वो कश्ती में बैठ गई। 
मैंने चप्पू अपने हाथ में ले लिया और कश्ती को खे कर झील के मर्कज़ में ले गया। 
यहां कश्ती आप ही आप खड़ी हो गई। 
ना इधर बहती थी ना उधर। 
मैंने चप्पू उठा कर कश्ती में रख लिया। 
उसने पोटली खोली। 
उस में से जरवालो निकाल कर मुझे दिए। 
ख़ुद भी खाने लगी। 
जर वालो ख़ुशक थे और खट्टे मीठे।

“वो बोली। ये पिछली बार के हैं।”

मैं जरवालो खाता रहा और उस की तरफ़ देखता रहा।

वो आहिस्ता से बोली। 
“पिछली बहार में तुम ना थे।”

पिछली बहार में, मैं ना था। 
और जरवालो के पेड़ फूलों से भर गए थे और ज़रा सी शाख़ हिलाने पर फूल टूट कर सतह-ए-ज़मीन पर मोतीयों की तरह बिखर जाते थे। पिछली बहार में, मैं ना था और जर वालो के पेड़ फलों से लदे फंदे थे। सब्ज़ सब्ज़ जरवालो। 
सख़्त खट्टे जरवालो जो नमक मिर्च लगा के खाए जाते थे और ज़बान सी सी करती थी और नाक बहने लगती थी और फिर भी खट्टे जरवालो खाए जाते थे। 
पिछली बहार में, मैं ना था। 
और ये सब्ज़ सब्ज़ जरवालो, पक के पीले और सुनहरे और सुर्ख़ होते गए और डाल डाल में मुसर्रत के सुर्ख़ शगूफ़े झूम रहे थे और मुसर्रत भरी आँखें, चमकती हुई मासूम आँखें उन्हें झूमता हुआ देखकर रक़्स सा करने लगतीं। 
पिछली बहार में, मैं ना था और सुर्ख़ सुर्ख़ जरवालो ख़ूबसूरत हाथों ने इकट्ठे कर लिए। 
ख़ूबसूरत लबों ने उनका ताज़ा रस चूसा और उन्हें अपने घर की छत पर ले जाकर सूखने के लिए रख दिया कि जब ये जरवालो सूख जाऐंगे, जब एक बहार गुज़र जाएगी और दूसरी बहार आने को होगी तो मैं आऊँगा और उनकी लज़्ज़त से लुत्फ़ अंदोज़ हो सकूँगा।

जरवालो खा के हमने ख़ुश्क ख़ूबानीयाँ खाईं। 
ख़ूबानी पहले तो बहुत मीठी मालूम ना होती मगर जब दहन के लुआब में घुल जाती तो शहद-ओ-शकर का मज़ा देने लगतीं।

“नर्म नर्म बहुत मीठी हैं ये।
” मैंने कहा। 
उसने एक गुठली को दाँतों से तोड़ा और ख़ूबानी का बीज निकाल के मुझे दिया। “खाओ।”

बीज बादाम की तरह मीठा था।

“ऐसी ख़ूबानीयाँ मैंने कभी नहीं खाईं।”

उसने कहा। 
“ये हमारे आँगन का पेड़ है। 
हमारे हाँ ख़ूबानी का एक ही पेड़ है। 
मगर इतनी बड़ी और सुर्ख़ और मीठी ख़ूबानीयाँ होती हैं उस की कि मैं क्या कहूं। 
जब ख़ूबानीयाँ पक जाती हैं तो मेरी सारी सहेलियाँ इकट्ठी हो जाती हैं और ख़ूबानीयाँ खिलाने को कहती हैं। 
पिछली बिहार में...”

और मैंने सोचा, पिछली बिहार में, मैं ना था। 
मगर ख़ूबानी का पेड़ आँगन में इसी तरह खड़ा था। 
पिछली बिहार में वो नाज़ुक नाज़ुक पत्तों से भर गया था। 
फिर उनमें कच्ची ख़ूबानियों के सब्ज़ और नोकीले फल लगे थे। 
अभी इन ख़ूबानियों में गुठली पैदा ना हुई थी और ये कच्चे खट्टे फल दोपहर के खाने के साथ चटनी का काम देते थे। 
पिछली बहार में, मैं ना था और फिर इन ख़ूबानियों में गुठलियां पैदा हो गई थीं और ख़ूबानियों का रंग हल्का सुनहरा होने लगा था और गुठलियों के अंदर नरम नरम बीज अपने ज़ायक़े में सब्ज़ बादामों को भी मात करते थे। 
पिछली बहार में, मैं ना था। 
और ये सुर्ख़ सुर्ख़ ख़ूबानीयाँ जो अपनी रंगत में कश्मीरी दोशीज़ाओं की तरह सबीह थीं और ऐसी ही रसदार। 
सब्ज़ सब्ज़ पत्तों के झूमरों से झाँकती नज़र आती थीं। 
फिर अलहड़ लड़कियां आँगन में नाचने लगतीं और छोटा भाई दरख़्त के ऊपर चढ़ गया और ख़ूबानीयाँ तोड़ तोड़ कर अपनी बहन की सहेलीयों के लिए फेंकता गया। 
कितनी मीठी थीं, वो पिछली बहार की रस-भरी ख़ूबानीयाँ। 
जब मैं ना था...

ख़ूबानीयाँ खा के उसने मकई का भुट्ठा निकाला। 
ऐसी सोंधी सोंधी ख़ुशबू थी। 
सुनहरा सेंका हुआ भुट्टा और करकरे दाने साफ़-शफ़्फ़ाफ़ मोतीयों की सी जिला लिए हुए और ज़ाइक़े में बेहद शीरीं।

वो बोली, “ये मिस्री मकई के भुट्ठे हैं।”

“बेहद मीठे।” मैंने भुट्ठा खाते हुए कहा।

वो बोली। “पिछली फ़सल के रखे थे, घड़ों में छिपा के। 
अम्मां की आँख से ओझल।”

मैंने भुट्ठा एक जगह से खाया। 
दानों की चंद क़तारें रहने दें, फिर उसने उसी जगह से खाया और दानों की चंद क़तारें मेरे लिए रहने दें। जिन्हें मैं खाने लगा और इस तरह हम दोनों एक ही भुट्ठे से खाते गए और मैंने सोचा, ये मिस्री मकई के भुट्ठे कितने मीठे हैं। ये पिछली फ़सल के भुट्ठे। 
जब तू थी लेकिन मैं ना था। 
जब तेरे बाप ने हल चलाया था खेतों में। 
गोड़ी की थी, बीज बोए थे, बादलों ने पानी दिया था। 
ज़मीन ने सब्ज़ सब्ज़ रंग के छोटे छोटे पौदे उगाए थे। 
जिनमें तू ने निलाई की थी। 
फिर पौदे बड़े हो गए थे और उनके सरों पर सरीयाँ निकल आई थीं और हवा में झूमने लगी थीं और तू मकई के पौदों पर हरे हरे भुट्ठे देखने जाती थी। जब मैं ना था। 
लेकिन भुट्ठों के अंदर दाने पैदा हो रहे थे, दूध भरे दाने, जिनकी नाज़ुक जिल्द के ऊपर अगर ज़रा सा भी नाख़ुन लगा जाये तो दूध बाहर निकल आता है। 
ऐसे नर्म-ओ-नाज़ुक भुट्ठे इस धरती ने उगाए थे और मैं ना था। 
और फिर ये भुट्ठे जवान और तवाना हो गए और उनका रस पुख़्ता हो गया। पुख़्ता और सख़्त। 
अब नाख़ुन लगाने से कुछ ना होता था। 
अपने नाख़ुन ही के टूटने का एहतिमाल था। 
भुट्ठों की मूँछें जो पहले पीली थीं, अब सुनहरी और आख़िर में स्याही माइल होती गईं। 
मकई के भुट्ठों का रंग ज़मीन की तरह भूरा होता गया। 
मैं जब भी ना आया था और फिर खेतों में खलियान लगे और खलियानों में बैल चले और भुट्ठों से दाने अलग हो गए और तू ने अपनी सहेलीयों के साथ मुहब्बत के गीत गाये और थोड़े से भुट्ठे छुपा के और सेंक के अलग रख दिए। 
जब मैं ना था, धरती थी, तख़लीक़ थी, मुहब्बत के गीत थे। आग पर सेंके हुए भुट्ठे थे। लेकिन मैं ना था।

मैंने मुसर्रत से उस की तरफ़ देखा और कहा, “आज पूरे चांद की रात को जैसे हर बात पूरी हो गई है। 
कल तक पूरी ना थी, आज पूरी है।”

उसने भुट्ठा मेरे मुँह से लगा दिया। 
उस के होंटों का गर्म गर्म लम्स अभी तक इस भुट्ठे पर था। 
मैंने कहा “मैं तुम्हें चूम लूं?”

वो बोली। “हश, कश्ती डूब जाएगी।”

“तो फिर क्या करें?” मैंने पूछा।

वो बोली, “डूब जाने दो।”

वो पूरे चांद की रात मुझे अब तक नहीं भूलती। 
मेरी उम्र सत्तर बरस के क़रीब है, लेकिन वो पूरे चांद की रात मेरे ज़हन में इस तरह चमक रही है जैसे अभी वो कल आई थी। 
ऐसी पाकीज़ा मुहब्बत मैंने आज तक नहीं की होगी। 
उसने भी नहीं की होगी। वो जादू वो कुछ और था। 
जिसने पूरे चांद की रात को हम दोनों को एक दूसरे से यूं मिला दिया कि वो फिर घर नहीं गई। 
उसी रात मेरे साथ भाग आई और हम पाँच छः दिन मुहब्बत में खोए हुए बच्चों की तरह इधर उधर जंगलों के किनारे नदी नालों पर अखरोटों के साये तले घूमते रहे, दुनिया-ओ-माफ़ीहा से बे-ख़बर। 
फिर मैंने इसी झील के किनारे एक छोटा सा घर ख़रीद लिया और उस में हम दोनों रहने लगे। 
कोई एक महीने के बाद में श्रीनगर गया और उस से ये कह के गया कि तीसरे दिन लौट आऊँगा। 
तीसरे दिन में लौट आया तो क्या देखता हूँ कि वो एक नौजवान से घुल मिल के बातें कर रही है। 
वो दोनों एक ही रकाबी में खाना खा रहे थे। 
एक दूसरे के मुँह में लुक़्मे डालते जाते हैं और हंसते जाते हैं। 
मैंने उन्हें देख लिया। 
लेकिन उन्होंने मुझे नहीं देखा। 
वो अपनी मुसर्रत में इस क़दर महव थे कि उन्होंने मुझे नहीं देखा। 
और मैंने सोचा कि ये पिछली बहार या उस से भी पिछली बहार का महबूब है, जब मैं ना था और फिर शायद और आगे भी कितनी ही ऐसी बहारें आयेंगी , कितनी ही पूरे चांद की रातें, जब मुहब्बत एक फ़ाहिशा औरत की तरह बेक़ाबू हो जाएगी और उर्यां हो के रक़्स करने लगेगी। आज तेरे घर में ख़िज़ां आ गई है। 
जैसे हर बहार के बाद आती है। 
अब तेरा यहां क्या काम। 
इस लिए में ये सोच कर उनसे मिले बग़ैर ही वापिस चला गया और फिर अपनी पहली बहार से कभी नहीं मिला।

और अब मैं अड़तालीस बरस के बाद लौट के आया हूँ। 
मेरे बेटे मेरे साथ हैं। 
मेरी बीवी मर चुकी है लेकिन मेरे बेटों की बीवीयां और उनके बच्चे मेरे साथ हैं और हम लोग सैर करते करते सम्मल झील के किनारे आ निकले हैं और अप्रैल का महीना है और सै पहर से शाम हो गई है और मैं देर तक पुल के किनारे खड़ा बादाम के पेड़ों की क़तारें देखता जाता हूँ और ख़ुनुक हवा में सफ़ैद शगूफ़ों के गुच्छे लहराते जाते हैं और पगडंडी की ख़ाक पर से किसी के जाने-पहचाने क़दमों की आवाज़ सुनाई नहीं देती। एक हसीन दोशीज़ा लड़की हाथों में एक छोटी सी पोटली दबाए पुल पर से भागती हुई गुज़र जाती है और मेरा दिल धक से रह जाता है। 
दूर पार तंगों से परे बस्ती में कोई बीवी अपने ख़ाविंद को आवाज़ दे रही है। वो उसे खाने पर बुला रही है। 
कहीं से एक दरवाज़ा बंद होने की सदा आती है और एक रोता हुआ बच्चा यकायक चुप हो जाता है। 
छतों से धुआँ निकल रहा है और परिंदे शोर मचाते हुए एक दम दरख़्तों की घनी शाख़ों में अपने पर फड़फड़ाते हैं और फिर एक दम चुप हो जाते हैं। ज़रूर कोई मांझी गा रहा है और उस की आवाज़ गूँजती गूँजती उफ़ुक़ के उस पार गुम होती जा रही है।

मैं पुल को पार कर के आगे बढ़ता हूँ। 
मेरे बेटे और उनकी बीवीयां और बच्चे मेरे पीछे आरहे हैं। 
वो अलग अलग टोलियों में बटे हुए हैं। 
यहां पर बादाम के पेड़ों की क़तार ख़त्म हो गई। 
तल्ला भी ख़त्म हो गया। 
झील का किनारा है। 
ये ख़ूबानी का दरख़्त है, लेकिन कितना बड़ा हो गया है। 
मगर कश्ती, ये कश्ती है। 
मगर क्या ये वही कश्ती है। 
सामने वो घर है। मेरी पहली बहार का घर। 
मेरी पूरे चांद की रात की मुहब्बत।

घर में रोशनी है। 
बच्चों की सदाएँ हैं। 
कोई भारी आवाज़ में गाने लगता है। 
कोई बुढ़िया उसे चीख़ कर चुप करा देती है। 
मैं सोचता हूँ, आधी सदी हो गई। 
मैंने इस घर को नहीं देखा। 
देख लेने में क्या हर्ज है। 
आख़िर मैंने उसे ख़रीदा था। 
देखा जाये तो मैं अभी तक उस का मालिक हूँ। 
देख लेने में हर्ज ही किया है। 
मैं घर के अंदर चला जाता हूँ।

बड़े अच्छे प्यारे बच्चे हैं। 
एक जवान औरत अपने ख़ाविंद के लिए रकाबी में खाना रख रही है। मुझे देखकर ठिटक जाती है। दो बच्चे लड़ रहे थे। मुझे देखकर हैरत से चुप हो जाते हैं। बुढ़िया जो अभी ग़ुस्सा में डाँट रही थी, थम के पास आ के खड़ी हो जाती है, कहती है, “कौन हो तुम?”

मैंने कहा, “ये घर मेरा है।”

वो बोली, “तुम्हारे बाप का है।”

मैंने कहा, “मेरे बाप का नहीं है, मेरा है। कोई अड़तालीस साल हुए, मैंने इसे ख़रीदा था। बस इस वक़्त तो यूं ही में इसे देखने के लिए चला आया। आप लोगों को निकालने के लिए नहीं आया हूँ। ये घर तो बस समझिए अब आप ही का है। मैं तो यूंही।”

में ये कह कर लौटने लगा। बुढ़िया की उंगलियां सख़्ती से थम पर जम गईं। उसने सांस ज़ोर से अंदर को खींची।

बोली, “तो तुम हो, अब इतने बरस के बाद कोई कैसे पहचाने।”

वो थम से लगी देर तक ख़ामोश खड़ी रही। मैं नीचे आँगन में चुप-चाप खड़ा उस की तरफ़ देखता रहा। फिर वो आप ही आप हंस दी।

बोली, “आओ मैं तुम्हें अपने घर के लोगों से मिलाऊं, देखो ये मेरा बड़ा बेटा है। ये इस से छोटा है, ये बड़े बेटे की बीवी है। ये मेरा बड़ा पोता है, सलाम करो बेटा। ये पोती, ये मेरा ख़ाविंद है। शश, उसे जगाना नहीं। परसों से उसे बुख़ार आ रहा है। सोने दो उसे।”

वो बोली, “तुम्हारी क्या ख़ातिर करूँ।”

मैंने दीवार पर खूँटी से टँगे हुए मकई के भुट्ठों को देखा। 
सेंके हुए भुट्ठे। 
सुनहरे मोतीयों के से शफ़्फ़ाफ़ दाने।

हम दोनों मुस्कुरा दिए।

वो बोली, “मेरे तो बहुत से दाँत झड़ चुके हैं, जो हैं भी वो काम नहीं करते।”

मैंने कहा, “यही हाल मेरा भी है, भुट्ठा ना खा सकूँगा।”

मुझे घर के अंदर घुसते देखकर मेरे घर के अफ़राद भी अंदर चले आए थे। अब ख़ूब गहमा गहमी थी। 
बच्चे एक दूसरे से बहुत जल्द मिल-जुल गए। 
हम दोनों आहिस्ता-आहिस्ता बाहर चले आए। 
आहिस्ता-आहिस्ता झील के किनारे चलते गए।

वो बोली, “मैंने छः बरस तुम्हारा इंतेज़ार किया। 
तुम उस रोज़ क्यों नहीं आए?”

मैंने कहा, “मैं आया था। 
मगर तुम्हें किसी दूसरे नौजवान के साथ देखकर वापस चला गया था।”

“क्या कहते हो?” वो बोली।

“हाँ तुम उस के साथ खाना खा रही थीं, एक ही रकाबी में और वो तुम्हारे मुँह में और तुम उस के मुँह में लुक़्मे डाल रही थीं।”

वो एक दम चुप हो गई। 
फिर ज़ोर ज़ोर से हँसने लगी। 
ज़ोर ज़ोर से हँसने लगी।

“क्या हुआ?” मैं ने हैरान हो कर पूछा।

वो बोली, “अरे वो तो मेरा सगा भाई था।”

वो फिर ज़ोर ज़ोर से हँसने लगी। 
“वो मुझसे मिलने के लिए आया था, उसी रोज़ तुम भी आने वाले थे। 
वो वापस जा रहा था। 
मैंने उसे रोक लिया कि तुमसे मिल के जाये। 
तुम फिर आए ही नहीं।”

वो एक दम संजीदा हो गई। 
“छः बरस मैंने तुम्हारा इंतिज़ार किया। 
तुम्हारे जाने के बाद मुझे ख़ुदा ने बेटा दिया, तुम्हारा बेटा। 
मगर एक साल बाद वो भी मर गया। 
चार साल और मैंने तुम्हारी राह देखी मगर तुम नहीं आए। 
फिर मैंने शादी कर ली।”

दो बच्चे बाहर निकल आए। 
खेलते खेलते एक बच्चा दूसरी बच्ची को मकई का भुट्टा खिला रहा था।

उसने कहा, “वो मेरा पोता है।”

मैंने कहा, “वो मेरी पोती है।”

वो दोनों भागते भागते झील के किनारे दूर तक चले गए। 
ज़िन्दगी के दो ख़ूबसूरत मुरक़्क़े। 
हम देर तक उन्हें देखते रहे। 
वो मेरे क़रीब आ गई। 
बोली, “आज तुम आए हुए हो तो मुझे अच्छा लग रहा है। 
मैंने अब अपनी ज़िंदगी बना ली है। 
इस की सारी ख़ुशीयां और ग़म देखे हैं। 
मेरा हरा-भरा घर है और आज तुम भी आए हो, मुझे ज़रा भी बुरा नहीं लग रहा है।”

मैंने कहा, “यही हाल मेरा है। 
सोचता था ज़िन्दगी भर तुम्हें नहीं मिलूँगा। 
इसी लिए इतने बरस इधर कभी नहीं आया। 
अब आया हूँ तो ज़रा रत्ती भर भी बुरा नहीं लग रहा।”

हम दोनों चुप हो गए। 
बच्चे खेलते खेलते हमारे पास आ गए। 
उसने मेरी पोती को उठा लिया, मैंने उस के पोते को उसने मेरी पोती को चूमा, मैंने उस के पोते को, और हम दोनों ख़ुशी से एक दूसरे को देखने लगे। 
इस की पुतलियों में चांद चमक रहा था और वो चांद हैरत और मुसर्रत से कह रहा था, “इन्सान मर जाते हैं, लेकिन ज़िंदगी नहीं मरती। 
बहार ख़त्म हो जाती है लेकिन फिर दूसरी बहार आ जाती है। 
छोटी छोटी मुहब्बतें भी ख़त्म हो जाती हैं लेकिन ज़िंदगी की बड़ी और अज़ीम सच्ची मुहब्बत हमेशा क़ायम रहती है।
 तुम दोनों पिछली बहार में ना थे। 
ये बहार तुमने देखी, इस से अगली बहार में तुम ना होगे। 
लेकिन ज़िंदगी फिर भी होगी और जवानी भी होगी और ख़ूबसूरती और रानाई और मासूमियत भी।”

बच्चे हमारी गोद से उतर पड़े क्योंकि वो अलग से खेलना चाहते थे। 
वो भागते हुए ख़ूबानी के दरख़्त के क़रीब चले गए। 
जहां कश्ती बंधी थी।

मैंने पूछा, “ये वही दरख़्त है?”

उसने मुस्कुरा कर कहा, “नहीं ये दूसरा दरख़्त है।”



Written & Composed by Vaibhav Kumar Sejwar

प्रेम क्या है

प्रेम क्या है...

प्रेम क्या है...?

जो मैंने तुझसे किया है।

प्यार सिर्फ "I Love You",
या "मैं तुमसे प्रेम करता हूँ",
"मैं तुमसे प्रेम करती हूँ" कह देने का नाम नहीं है।

प्रेम है...

- एक-दूसरे की खुशी में अपनी खुशी ढूँढ़ लेना।
- दुख के समय एक-दूसरे का सहारा बन जाना।
- गुस्से में भी एक-दूसरे को समझने की कोशिश करना।
- परिस्थितियाँ कितनी भी बदल जाएँ, फिर भी एक-दूसरे का साथ न छोड़ना।

याद रखना...

सच्चा प्रेम कभी परिपूर्ण नहीं होता।

कोई भी रिश्ता सौ प्रतिशत निर्दोष नहीं होता।

आख़िर हम इंसान हैं...

जहाँ प्रेम होगा, वहाँ कभी-कभी झगड़े भी होंगे।

गलतफहमियाँ होंगी।

गुस्सा होगा।

निराशाएँ भी आएँगी।

लेकिन...

दिन के अंत में...

जिसकी याद आपके चेहरे पर मुस्कान ले आए...

जिससे आपका रिश्ता हर हाल में बना रहे...

वही प्रेम है।

चाहे साथ पूरी उम्र का न हो...

चाहे दोस्ती कुछ दिनों की ही क्यों न रही हो...

यदि...

कुछ यादें सिर्फ उसी से जुड़ी हों...

कुछ बातें सिर्फ उसी से कही जा सकें...

जीवनसाथी बनने का सौभाग्य न मिले...

फिर भी वह आपकी हर धड़कन में बस जाए...

तो समझ लेना...

वही सच्चा प्रेम है।

जीवन में न जाने कितने लोग मिलते हैं।

कुछ लोग कुछ पलों के मेहमान बनकर आते हैं।

कुछ लोग यादों में हमेशा के लिए बस जाते हैं।

लेकिन...

जो हर खुशी में...

हर संघर्ष में...

हर सपने में...

आपके साथ खड़ा दिखाई दे...

वही आपके प्रेम की सबसे सुंदर अनुभूति बन जाता है।

क्योंकि...

प्रेम किस्मत से मिलता है।

लेकिन उसे निभाने के लिए...

विश्वास चाहिए।

धैर्य चाहिए।

सम्मान चाहिए।

त्याग चाहिए।

और कभी-कभी पूरे परिवार का साथ भी चाहिए।

सच्चा प्रेम कभी समाप्त नहीं होता।

वह समय के साथ और गहरा होता जाता है।

हाँ...

मुझे तुझसे प्रेम है।

क्योंकि...

प्रेम का अर्थ सिर्फ किसी को पा लेना नहीं होता।

कभी-कभी...

किसी को जीवन भर अपने दिल में संजोकर रखना भी प्रेम होता है।

कुछ लोग हमारे साथ नहीं चलते...

लेकिन उनकी यादें उम्र भर साथ चलती हैं।

कुछ नाम होंठों तक नहीं आते...

फिर भी हर दुआ में शामिल रहते हैं।

कुछ रिश्ते किसी बंधन में नहीं बँधते...

फिर भी सबसे अपने लगते हैं।

तू मेरे जीवन की वह कहानी है...

जिसका हर पन्ना मैंने अपने दिल से पढ़ा है।

चाहे समय बदल जाए...

चाहे रास्ते बदल जाएँ...

चाहे हम बदल जाएँ...

लेकिन तेरी याद का एक कोना...

मेरे दिल में हमेशा वैसा ही रहेगा।

क्योंकि...

प्रेम का अर्थ केवल साथ रहना नहीं होता।

कभी किसी की यादों में उम्र भर बस जाना भी प्रेम होता है।

तू मिले या न मिले...

यह किस्मत की बात है।

लेकिन तुझे चाहना...

मेरे दिल की इबादत है।

तू मेरे विश्वास की आस्था है।

यदि जन्मों का कोई रिश्ता होता है...

तो शायद...

तू वही अधूरी प्रार्थना है...

जो दोस्ती बनकर मेरे जीवन में आई...

और जिसे मेरा दिल...

हर जन्म में...

फिर से माँगेगा।

— Written & Composed by Vaibhav Kumar Sejwar

Monday, July 6

प्रेम क्या है

प्रेम क्या है...

प्रेम क्या है...?

जो मैंने तुझसे किया है।

प्यार सिर्फ "I Love You",
या "मैं तुमसे प्रेम करता हूँ",
"मैं तुमसे प्रेम करती हूँ" कह देने का नाम नहीं है।

प्रेम है...

- एक-दूसरे की खुशी में अपनी खुशी ढूँढ़ लेना।
- दुख के समय एक-दूसरे का सहारा बन जाना।
- गुस्से में भी एक-दूसरे को समझने की कोशिश करना।
- परिस्थितियाँ कितनी भी बदल जाएँ, फिर भी एक-दूसरे का साथ न छोड़ना।

याद रखना...

सच्चा प्रेम कभी परिपूर्ण नहीं होता।

कोई भी रिश्ता सौ प्रतिशत निर्दोष नहीं होता।

आख़िर हम इंसान हैं...

जहाँ प्रेम होगा, वहाँ कभी-कभी झगड़े भी होंगे।

गलतफहमियाँ होंगी।

गुस्सा होगा।

निराशाएँ भी आएँगी।

लेकिन...

दिन के अंत में...

जिसकी याद आपके चेहरे पर मुस्कान ले आए...

जिससे आपका रिश्ता हर हाल में बना रहे...

वही प्रेम है।

चाहे साथ पूरी उम्र का न हो...

चाहे दोस्ती कुछ दिनों की ही क्यों न रही हो...

यदि...

कुछ यादें सिर्फ उसी से जुड़ी हों...

कुछ बातें सिर्फ उसी से कही जा सकें...

जीवनसाथी बनने का सौभाग्य न मिले...

फिर भी वह आपकी हर धड़कन में बस जाए...

तो समझ लेना...

वही सच्चा प्रेम है।

जीवन में न जाने कितने लोग मिलते हैं।

कुछ लोग कुछ पलों के मेहमान बनकर आते हैं।

कुछ लोग यादों में हमेशा के लिए बस जाते हैं।

लेकिन...

जो हर खुशी में...

हर संघर्ष में...

हर सपने में...

आपके साथ खड़ा दिखाई दे...

वही आपके प्रेम की सबसे सुंदर अनुभूति बन जाता है।

क्योंकि...

प्रेम किस्मत से मिलता है।

लेकिन उसे निभाने के लिए...

विश्वास चाहिए।

धैर्य चाहिए।

सम्मान चाहिए।

त्याग चाहिए।

और कभी-कभी पूरे परिवार का साथ भी चाहिए।

सच्चा प्रेम कभी समाप्त नहीं होता।

वह समय के साथ और गहरा होता जाता है।

हाँ...

मुझे तुझसे प्रेम है।

क्योंकि...

प्रेम का अर्थ सिर्फ किसी को पा लेना नहीं होता।

कभी-कभी...

किसी को जीवन भर अपने दिल में संजोकर रखना भी प्रेम होता है।

कुछ लोग हमारे साथ नहीं चलते...

लेकिन उनकी यादें उम्र भर साथ चलती हैं।

कुछ नाम होंठों तक नहीं आते...

फिर भी हर दुआ में शामिल रहते हैं।

कुछ रिश्ते किसी बंधन में नहीं बँधते...

फिर भी सबसे अपने लगते हैं।

तू मेरे जीवन की वह कहानी है...

जिसका हर पन्ना मैंने अपने दिल से पढ़ा है।

चाहे समय बदल जाए...

चाहे रास्ते बदल जाएँ...

चाहे हम बदल जाएँ...

लेकिन तेरी याद का एक कोना...

मेरे दिल में हमेशा वैसा ही रहेगा।

क्योंकि...

प्रेम का अर्थ केवल साथ रहना नहीं होता।

कभी किसी की यादों में उम्र भर बस जाना भी प्रेम होता है।

तू मिले या न मिले...

यह किस्मत की बात है।

लेकिन तुझे चाहना...

मेरे दिल की इबादत है।

तू मेरे विश्वास की आस्था है।

यदि जन्मों का कोई रिश्ता होता है...

तो शायद...

तू वही अधूरी प्रार्थना है...

जो दोस्ती बनकर मेरे जीवन में आई...

और जिसे मेरा दिल...

हर जन्म में...

फिर से माँगेगा।

— Written & Composed by Vaibhav Kumar Sejwar

Tuesday, June 23

बदलती रुत का धोखा



बदलती रुत का धोखा


बदलते मौसम का अब ऐतबार क्या करना,
कभी जो धूप है तीखी, कभी है ठंडी हवा।
सहर की साज़िशें कुछ और थीं मगर देखो,
शाम होते ही बदल गया सारा का सारा समाँ।
ये बादल आए तो थे प्यास को बुझाने को,
मगर तरसा के चले गए वो बेरुखी की तरह।
हवा के झोंकों में वो पहले जैसी बात कहाँ,
जो छू के गुज़रे तो लगती है एक चुभन सी यहाँ।
क़रीब आके जो बदले वो मौसम कैसा है,
जो रंग बदलता रहे पल-पल में इंसानों सा।
भरोसा उठ गया इस आसमाँ के वादों से,
जो धूप छाँव का खेल खेलता है बेपरवाह।
ये बेवफ़ा सी रुत दिल को बहुत दुखाती है,
हँसा के पहले फिर आँसू ये दे के जाती है,
मगर ये दिल भी इसी के ही जाल में उलझा
Written & Composed by Vaibhav Kumar Sejwar

दिल के खामोश पन्ने

प्रस्तावना
"यह पुस्तक उन अनकहे अल्फाजों का संग्रह है, जो अक्सर मेरी खामोशियों में दबे रहते थे। 'दिल के खामोश पन्ने' महज कुछ पन्ने नहीं हैं, बल्कि यह मेरे उन जज्बातों का सफर है जो मैंने उस मोड़ पर जिए, जहाँ से आगे बढ़ना मुमकिन न था। हर कविता मेरे उन जख्मों की गवाह है, जिन्हें मैंने शब्दों में पिरोकर हमेशा के लिए अमर कर दिया है।"

**अधूरी दास्ताँ**
तेरी यादों के भंवर से अब निकला नहीं जाता,
तेरा दिया हुआ ज़ख्म अब भी सिला नहीं जाता।
तूने जिस मोड़ पर हमें तन्हा छोड़ दिया था,
उस मोड़ से आगे अब कोई रास्ता मिला नहीं जाता।
**बेबसी**
तेरी चाहत का बोझ अब संभाला नहीं जाता,
बिन तेरे ये दिल कहीं और बहलाया नहीं जाता।
तूने जिस मोड़ पर बिछड़कर हमें राह दिखाई थी,
उस राह पर अब हमसफर के बिना चला नहीं जाता।
**वक्त की मार**
तेरी यादों की कैद से अब छूटा नहीं जाता,
सपनों का वो शीशा अब और टूटा नहीं जाता।
तूने जिस मोड़ पर हमें खामोश कर दिया था,
उस खामोशी से अब कोई रिश्ता जोड़ा नहीं जाता।
**उम्मीदें**
तेरी उम्मीद का धागा अब और बुना नहीं जाता,
तेरा नाम भी अब इस रूह से चुना नहीं जाता।
तूने जिस मोड़ पर हमें मुड़कर देख लिया था,
उस जगह के बाद अब आगे बढ़ा नहीं जाता।

यहाँ आपके लिए उसी गहरे जज़्बात और दर्द वाली कुछ और पंक्तियाँ हैं

**तन्हा मुसाफिर**
तेरी यादों का बोझ अब ढोया नहीं जाता,
तेरा नाम लेकर अब और रोया नहीं जाता।
तूने जिस मोड़ पर हमें अकेला छोड़ा था,
उस जगह के बाद अब आगे बढ़ा नहीं जाता।
**बिखरे एहसास**
तेरी यादों का साया अब भी साथ चलता है,
ये दिल हर पल तेरी कमी में ही जलता है।
तूने जिस मोड़ पर हाथ छुड़ाया था हमारा,
वहीँ से अब सफर का हर रास्ता बदलता है।
**बेचैनी**
तेरी बातों का सिलसिला अब थमा नहीं जाता,
दिल का ये हाल अब किसी को बताया नहीं जाता।
तूने जिस मोड़ पर हमें खामोश कर दिया था,
उस दर्द के बाद अब और मुस्कुराया नहीं जाता।
**अधूरी हसरत**
तेरी यादों की धूप में अब रहा नहीं जाता,
बिना तेरे ये दिल अब और सहा नहीं जाता।
तूने जिस मोड़ पर हमें दुनिया से दूर किया,
उस जगह के बाद अब किसी को चाहा नहीं जाता।

यहाँ आपकी पसंद के अनुसार उसी गहराई और दर्द भरी शैली में कुछ और पंक्तियाँ हैं:
**अधूरा सफर**
तेरी यादों का बोझ अब उठाया नहीं जाता,
ये टूटा हुआ दिल अब और मनाया नहीं जाता।
तूने छोड़ दिया था जिस मोड़ पर हमें तन्हा,
उस जगह के बाद अब आगे बढ़ा नहीं जाता।
**खामोश दर्द**
तेरी यादों की कसक अब और सही नहीं जाती,
तेरी राहों की तड़प अब हमसे कही नहीं जाती।
तूने जिस मोड़ पर हमें रुखसत कर दिया था,
उस जगह के बाद अब कोई मंज़िल मिली नहीं जाती।
**बेबसी का आलम**
तेरी यादों का पहरा अब हटाया नहीं जाता,
तेरा चेहरा अब किसी और में पाया नहीं जाता।
तूने छोड़ दिया था जिस मोड़ पर हमें अकेले,
उस मोड़ से आगे अब कोई रिश्ता निभाया नहीं जाता।
**एहसास की कैद**
तेरी यादों का सिलसिला अब मिटाया नहीं जाता,
हकीकत का वो सच अब और छुपाया नहीं जाता।
तूने जिस मोड़ पर हमें दुनिया से अलग किया,
उस जगह के बाद अब किसी को अपनाया नहीं जाता।

यहाँ बेवफाई और दोस्ती के दर्द पर आधारित उसी शैली में कुछ पंक्तियाँ हैं:
**बेवफाई का दर्द**
तेरी बेवफाई का ज़ख्म अब छुपाया नहीं जाता,
तेरा दिया हुआ धोखा अब और भुलाया नहीं जाता।
तूने जिस मोड़ पर हमें यकीन के साथ तोड़ा था,
उस जगह के बाद अब किसी पर ऐतबार किया नहीं जाता।
**दोस्ती में धोखा**
दोस्ती के वो वादे अब याद किए नहीं जाते,
तूने जो रिश्ते तोड़े वो फिर जिए नहीं जाते।
जिस मोड़ पर तूने दोस्ती का साथ छोड़ दिया था,
उस जगह के बाद अब किसी को दोस्त कहा नहीं जाता।
**अधूरी उम्मीद**
तेरी झूठी कसमें अब और गिनी नहीं जातीं,
दिल की ये बेबसी अब और छिपी नहीं जाती।
तूने जिस मोड़ पर हमें अपनों से जुदा किया था,
उस जगह के बाद अब किसी से उम्मीद की नहीं जाती।
**तन्हा रास्ता**
तेरे धोखे का मंजर अब भुलाया नहीं जाता,
खफा होकर भी तुझे अब मिटाया नहीं जाता।
तूने जिस मोड़ पर दोस्ती का नाम बदनाम किया,
उस जगह के बाद अब कहीं और मुड़ के देखा नहीं जाता।


यहाँ बेवफाई और दोस्ती के दर्द पर आधारित उसी शैली में कुछ और पंक्तियाँ हैं:
**विश्वास का टूट जाना**
तेरी मोहब्बत का फरेब अब छुपाया नहीं जाता,
तेरा चेहरा अब किसी और में भाया नहीं जाता।
तूने जिस मोड़ पर हमें भरोसे के साथ छोड़ा था,
उस जगह के बाद अब किसी को दिल में बिठाया नहीं जाता।
**दोस्त की जुदाई**
वो पुरानी महफिलें अब याद की नहीं जातीं,
तेरी दी हुई चोटें अब और सही नहीं जातीं।
तूने जिस मोड़ पर दोस्ती से हाथ खींच लिया था,
उस जगह के बाद अब कोई पुरानी बात छेड़ी नहीं जाती।
**धोखे की दास्ताँ**
तेरी चालों का असर अब मिटाया नहीं जाता,
दोस्ती के नाम पर जो ज़हर दिया, वो भुलाया नहीं जाता।
तूने जिस मोड़ पर हमें अपनों के बीच अकेला किया,
उस जगह के बाद अब और करीब आया नहीं जाता।
**खामोश शिकवा**
तेरी बेवफाई का किस्सा अब सुनाया नहीं जाता,
जो रूह पर लगा हो दाग, वो मिटाया नहीं जाता।
तूने जिस मोड़ पर हमें रंजिशों में छोड़ दिया,
उस जगह के बाद अब फिर से मुस्कुराया नहीं जाता।


यहाँ आपके लिए बेवफाई और दोस्ती के दर्द पर आधारित कुछ और पंक्तियाँ हैं:
**अधूरी दोस्ती**
वो साथ चलने के वादे अब याद किए नहीं जाते,
तेरी दी हुई खामोशियों के जवाब दिए नहीं जाते।
तूने जिस मोड़ पर दोस्ती का हाथ छोड़ दिया था,
उस जगह के बाद अब किसी को गले लगाये नहीं जाते।
**बेवफाई का ज़ख्म**
तेरी यादों का बोझ अब और सहा नहीं जाता,
तेरा फरेब-ए-इश्क अब किसी से कहा नहीं जाता।
तूने जिस मोड़ पर हमें तन्हा छोड़ दिया था,
उस जगह के बाद अब और किसी को चाहा नहीं जाता।
**टूटा भरोसा**
दोस्ती की वो मिसालें अब दी नहीं जातीं,
तेरी दगा की वो रातें अब सोई नहीं जातीं।
तूने जिस मोड़ पर हमें अपनों से पराया किया,
उस जगह के बाद अब किसी से उम्मीदें की नहीं जातीं।
**अकेलापन**
तेरी बेवफाई का ये दाग अब मिटाया नहीं जाता,
तेरा जिक्र भी महफ़िल में अब लाया नहीं जाता।
तूने जिस मोड़ पर हमें दुनिया से जुदा किया था,
उस जगह के बाद अब और कोई रास्ता चुना नहीं जाता।


यहाँ आपके लिए दर्द और गम में डूबी हुई कुछ और चुनिंदा पंक्तियाँ हैं:
**अधूरी हसरत**
तेरी यादों का कफ़न अब ओढ़ लिया है हमने,
जीते जी खुद को तन्हा छोड़ दिया है हमने।
तूने जिस मोड़ पर हमें मिट्टी में मिलाया था,
उस जगह के बाद अब उम्मीद का दामन तोड़ दिया है हमने।
**खामोश चीख**
अंदर ही अंदर घुटकर अब मरे जा रहे हैं हम,
तेरे दिए दर्द को सीने में भरे जा रहे हैं हम।
तूने जिस मोड़ पर हमें ख़ाक में मिलाया था,
उस जगह के बाद अब बस अपनी मौत से लड़े जा रहे हैं हम।
**दर्द की इंतहा**
आँखों के आँसू अब सूख कर ज़हर बन गए हैं,
तेरे सितम मेरे लिए कहर बन गए हैं।
तूने जिस मोड़ पर हमें पराया कर दिया था,
उस जगह के बाद अब हम पत्थर बन गए हैं।
**बेबसी**
रूह तक कांप उठती है जब वो पल याद आता है,
तूने छोड़ दिया था जो, वो दर्द बहुत रुलाता है।
जिस मोड़ पर हमने वफाओं का सौदा किया था,
उस जगह के बाद अब कोई अपना नजर नहीं आता है।
Written & Composed by Vaibhav Kumar Sejwar.



Sunday, May 10

सात फेरों का अटूट बंधन




माता-पिता का प्रेम उस नींव की तरह होता है जिस पर पूरा घर टिका होता है। माता-पिता पर एक कविता


सात फेरों का अटूट बंधन

माँ की आँखों की ममता, और पिता का वो साथ,
तपती धूप में जैसे हो, शीतल छाँव की बात।

बिना कहे ही एक-दूजे की, हर उलझन हर लेते हैं,
ये वो सच्चे साथी हैं, जो मौन साथ चलते हैं।

पिता की हर उस डाँट के पीछे, माँ का वो सहलाना,
और माँ की हर इक फिक्र पर, पिता का मुस्कुराना।

कभी तकरार, कभी है प्यार, पर कभी न आई दूरी,
इन दोनों के बिना तो घर की, हर खुशहाली अधूरी।

ये प्यार नहीं दिखावे का, ये तो रूह का संगम है,
एक-दूजे के साहस से, हर मुश्किल यहाँ कम है।

हाथों में हाथ रहे सदा, बस यही दुआ हम करते हैं,
माता-पिता के इस पावन प्रेम को, शत-शत नमन करते हैं।

Written & Composed by Vaibhav Kumar Sejwar.




Thursday, May 7

खामोश आँसू

आँखों भरी आँखों पलकों की कोरों में दोस्त रहते हैं,

बिना कहे ये दर्द की पूरी कहानी कहते हैं।

दुनिया की भीड़ में जो लबों से पूछते हैं,

तन्हाइयों में वही बार-बार नदी बन बहती हैं।

ना कोई शोर होता है, ना कोई शिकायत होती है,

बस यात्रा करते लम्हों की एक याद है।

गॉल पर उतरती वो नाम सी एक रूढ़ि,

अंदर ही अंदर किसी उम्मीद की बुनियाद होती है।

लोग समझते हैं कि हम संभल गए हैं अब,

हकीकत में तो जज़्बात अंदर ही अंदर दहाते हैं।

जो जुबां पर न आ सके कभी वो शब्द,

आँखों भरी आँखें उभरती रातों को सहती हैं।

ये वो समंदर हैं फ़्लैट कोई फ़्लैट नहीं,

इनके अलावा कोई और सहारा नहीं।

दिल के कोने में दिखाया गया है जो एक कास्क,

उसे आँखें मूँद कर ही बयाँ करते हैं, कोई और इशारा नहीं।

वैभव कुमार सेजवार द्वारा लिखित और संगीतबद्ध।

अधूरी मोहब्बत

अधूरी मोहब्बत का दर्द बड़ा गहरा होता है,
जैसे ठहरे हुए पानी पर कोई पहरा होता है।
कुछ लफ्ज़ जो होंठों तक आकर रुक गए,
वो जज्बात आज भी रूह में कहीं ठहरा होता है।
वो मुलाकातों का सिलसिला जो बीच में ही टूट गया,
हाथों से जैसे रेत का कोई जर्रा छूट गया।
नाराजगी नहीं है तुमसे, न कोई गिला है,
बस मलाल ये है कि मुकद्दर ही रूठ गया।
कभी शाम ढले जब यादों का दरिया बहता है,
एक खालीपन सा इस दिल के कमरे में रहता है।
पूरी हो जाती तो शायद कहानी खत्म हो जाती,
अधूरा है इश्क, तभी तो ये आज भी जिंदा रहता है।
किताब के पन्नों में दबी उस सूखी कली की तरह,
अधूरी मोहब्बत हर धड़कन में चुपके से बहती है।
मुकम्मल न सही, पर ये रूह का किस्सा है,
जो अधूरी होकर भी सबसे मुकम्मल रहती है।
Written & Composed by Vaibhav Kumar Sejwar

टूटे हुए ख्वाब

टूटे हुए ख्वाब आँखों में चुभते बहुत हैं,
अधूरे सपनो के मंजर डराते बहुत हैं।
वो जो सजाया था हसरतों का एक महल,
आज उसके खंडहर हमें रुलाते बहुत हैं।
हर ईंट पर लिखा था नाम ख़ुशी का,
अब वो सूखे पत्ते बन कर उड़ते बहुत हैं।
नींद आती नहीं अब इन सूनी रातों में,
बीते हुए लम्हे खामोशी में गूँजते बहुत हैं।
जो वादे किए थे खुद से और ज़माने से,
वो टूटे हुए काँच की तरह चुपके से चुभते बहुत हैं।
मिटा तो दी है हमने यादों की वो लकीरें,
पर जख्म पुराने आज भी सीने में दुखते बहुत हैं।
खोजता हूँ मैं खुद को उन यादों के मलबे में,
जहाँ टूटे हुए ख्वाब अब भी धड़कते बहुत हैं।
Written & Composed by Vaibhav Kumar Sejwar

मशीनों के बीच ज़िन्दगी

मशीनों के बीच ज़िन्दगी कुछ यूँ उलझ गई है,
कि धड़कनों की आवाज़ भी अब शोर में दब गई है।
सुबह उठते ही तारों का जंजाल सामने होता है,
इंसान तो जाग जाता है, पर अहसास सोता है।
पहिए घूमते हैं वक्त के, और हम साथ चलते हैं,
लोहे के इस शहर में, अरमान रोज़ ढलते हैं।
हाथों में अब मिट्टी की वो सोंधी महक नहीं आती,
डिजिटल स्क्रीन की ये चमक, रूह को नहीं भाती।
बटन दबाते ही खुशियाँ मिलने का वहम पाल लिया,
रिश्तों को भी हमने अब इनबॉक्स में डाल लिया।
थक चुके हैं पुर्जे, थिरकना भूल गए हैं पाँव,
कहाँ खो गई वो ठंडी हवा, और पीपल की छाँव?
लोहे के जिस्म में शायद दिल पत्थर का हो गया,
सपनों का वो कोमल परिंदा, कहीं दफ्तर में सो गया।
चलो इस यांत्रिक ज़माने से ज़रा बाहर निकलें,
मशीन नहीं, फिर से ज़रा इंसान बनकर निखरें।
Written & Composed by Vaibhav Kumar Sejwar

वक़्त लगता है

वक़्त लगता है हर घाव को भरने में,
वक़्त लगता है ख़ुद से ही मिलने में।
जो बिखर गए हैं यादों के तिनके यहाँ,
उन्हें समेट कर फिर घरौंदा बनाने में,
वक़्त लगता है।
वो जो ख़ामोशी ओढ़ ली है तुमने आज,
उस दर्द को लफ़्ज़ों में ढालने में,
वक़्त लगता है।
कभी धूप कड़ी है, कभी छाँव का बसेरा,
दिल की इस वीरान ज़मीन को गुलिस्ताँ बनाने में,
वक़्त लगता है।
पुरानी मुलाक़ातों के पन्ने पलट कर,
एक नई कहानी की शुरुआत करने में,
वक़्त लगता है।
गिरकर संभलना, संभल कर फिर चलना,
टूटे हुए ख़्वाबों की किरचें हटाने में,
वक़्त लगता है।
पर यकीन रख, सवेरा ज़रूर आएगा,
बस उस अंधेरी रात को ढलने में,
वक़्त लगता है।
Written & Composed by Vaibhav Kumar Sejwar

Monday, May 4

एहसास-ए-मुकम्मल

 एहसास-ए-मुकम्मल

तू पास हो तो हर ख्वाहिश पूरी लगती है,
तेरे बिना ये ज़िंदगी अधूरी लगती है।
धड़कनों में घुली है एक अजीब सी बेचैनी,
तू जो नहीं, तो हर साँस भी ज़रूरी लगती है।
इन खामोश रास्तों पर तेरा साथ चाहिए,
अँधेरी रातों में तेरा हाथ चाहिए।
बिखरे हुए हैं ख़्वाब ज़मीन पर कांच की तरह,
सहेज ले जो मुझको, वो जज्बात चाहिए।
वक़्त की लहरों में बहता जा रहा हूँ मैं,
तन्हाई के साये में सिमटता जा रहा हूँ मैं।
तू एक बार लौट कर फिर से पुकार ले,
खुद को ढूँढने की कोशिश में मिटता जा रहा हूँ मैं।
तेरी मुस्कुराहट में ही मेरा सवेरा है,
वरना इन आँखों में तो बस यादों का बसेरा है।
फासले जितने भी हों हमारे दरमियान,
ये दिल आज भी सिर्फ और सिर्फ तेरा है।
Written & Composed by Vaibhav Kumar Sejwar

Saturday, May 2

“टूटा हुआ दिल – Part 10”

“टूटा हुआ दिल – Part 10”

अब कहानी मुकम्मल सी लगती है,
ना कोई कमी, ना कोई सवाल,
जो टूटकर बिखरा था कभी…
आज वही बन गया है कमाल।

मैंने दर्द को दोस्त बना लिया,
और यादों से समझौता कर लिया,
जो मेरा नहीं था कभी भी…
उसे दिल से आज़ाद कर दिया।

अब ना किसी का इंतज़ार है,
ना किसी से कोई उम्मीद,
मैं खुद ही अपनी मंज़िल हूँ…
और खुद ही अपनी तस्दीक।

जो सीखा है इस इश्क़ से,
वो उम्र भर काम आएगा,
अब कोई आए या जाए जिंदगी में…
ये दिल खुद को कभी नहीं भुलाएगा।

ये अंत नहीं, एक शुरुआत है,
जहाँ मैं पूरा हूँ—अधूरा नहीं,
जो खोया था वो मिल गया मुझमें…
अब मुझे किसी और की ज़रूरत नहीं।

Written & Composed by Vaibhav Kumar Sejwar

“टूटा हुआ दिल – Part 9”

“टूटा हुआ दिल – Part 9”

अब मैं रुकता नहीं बीते लम्हों पर,
वक़्त के साथ चलना सीख लिया है,
जो कल था वो कहानी बन गया…
मैंने आज में जीना सीख लिया है।

अब ना कोई शिकायत बाकी है,
ना किसी से कोई सवाल,
जो मिला उसने सिखा दिया…
जो छूटा, वो भी रहा कमाल।

तेरे जाने का अफ़सोस नहीं अब,
शुक्रिया है उस मोड़ के लिए,
क्योंकि उसी दर्द ने गढ़ा मुझे,
इस नए और मज़बूत रूप के लिए।

अब दिल में सुकून रहता है,
और खामोशी भी गीत लगती है,
जो तन्हाई कभी डराती थी…
अब वही मेरी जीत लगती है।

मैंने खुद को पा लिया आखिर,
ये सफर आसान तो नहीं था,
पर जो इंसान आज बना हूँ मैं…
वो पहले कभी कहीं था नहीं।

Written & Composed by Vaibhav Kumar Sejwar

“टूटा हुआ दिल – Part 8”

“टूटा हुआ दिल – Part 8”

अब दिल को समझा लिया है मैंने,
हर चाहत को सुला दिया है,
जो ख्वाब तेरे नाम से जुड़े थे,
उन्हें वक़्त ने भुला दिया है।

मैंने सीखा है छोड़ना भी,
हर बात को थामे रहना नहीं,
जो मेरा था ही नहीं कभी…
उसे अपना मानकर जीना सही नहीं।

अब सफर अकेला सही,
पर सच्चा और साफ़ है,
कोई दिखावा नहीं अब रिश्तों में,
बस खुद से ही मेरा लगाव है।

मैंने अपनी कीमत पहचान ली है,
अब किसी के लिए नहीं झुकता,
जो खुद को खो दे इश्क़ में…
वो फिर कहीं का नहीं रहता।

तू भी अपनी दुनिया में खुश रह,
मैं भी अपने रास्ते पर चल पड़ा हूँ,
जो कहानी अधूरी रह गई थी…
उसे अब मैं खुद पूरा कर रहा हूँ।

Written & Composed by Vaibhav Kumar Sejwar

“टूटा हुआ दिल – Part 7”

“टूटा हुआ दिल – Part 7”

अब खामोशी भी दोस्त बन गई है,
और तन्हाई सज़ा नहीं लगती,
जो खालीपन कभी चुभता था,
अब वही मेरी पनाह सी लगती।

मैंने उम्मीदें रखना छोड़ दिया,
अब बस मेहनत से रिश्ता है,
दिल अब किसी पर नहीं टिकता…
अब खुद पर ही भरोसा सच्चा है।

तेरी यादें अब आती तो हैं,
पर दिल को तोड़ नहीं पाती,
क्योंकि जो खुद से जुड़ गया हो,
उसे कोई जुदाई हिला नहीं पाती।

अब जो मुस्कुराहट है मेरे चेहरे पर,
वो किसी के आने से नहीं,
बल्कि खुद को पाने से आई है…
और यही मेरी सबसे बड़ी जीत सही।

अगर कभी मिल भी जाए तू राहों में,
तो बस एक अजनबी सा सलाम होगा,
क्योंकि जो कभी मेरी दुनिया थी…
अब बस एक बीता हुआ नाम होगा।

Written & Composed by Vaibhav Kumar Sejwar

“टूटा हुआ दिल – Part 6”

“टूटा हुआ दिल – Part 6”

अब मैं भागता नहीं यादों से,
उन्हें चुपचाप गुजरने देता हूँ,
जो कभी मेरी कमजोरी थीं,
आज उन्हीं से मैं खुद को गढ़ता हूँ।

तेरा नाम अब भी आता है कभी-कभी,
पर दिल अब वैसा नहीं धड़कता,
जो पहले हर धड़कन में तू थी…
अब वहाँ मेरा खुद का वजूद बसता।

मैंने माफ़ भी कर दिया तुझे,
और खुद को भी आज़ाद किया,
जो रिश्ता हमें बांध रहा था,
उससे आगे बढ़ने का इरादा किया।

अब जो आईना देखता हूँ मैं,
तो एक नया इंसान नज़र आता है,
जो टूटकर बिखरा नहीं…
बल्कि हर टुकड़े से और निखर जाता है।

ये कहानी खत्म नहीं हुई अभी,
बस एक नया मोड़ आया है,
जहाँ दर्द नहीं, सुकून है…
और मैंने खुद को फिर से पाया है।

Written & Composed by Vaibhav Kumar Sejwar

“टूटा हुआ दिल – Part 5”

“टूटा हुआ दिल – Part 5”

अब सुकून मिलने लगा है मुझे,
तेरे बिना जीने की आदत हो गई,
जो खालीपन तू छोड़ गया था,
वो भी अब मेरी राहत हो गई।

मैंने सीखा है खुद को समझना,
हर दर्द को शब्दों में ढालना,
अब आंसू नहीं बहते बेवजह,
मैंने सीख लिया है संभलना।

तेरी यादें अब बोझ नहीं,
बस एक बीती कहानी हैं,
जिसमें मैं था पूरा तेरा…
और तू बस मेरी नादानी है।

अब जो रास्ता चुना है मैंने,
वो सिर्फ मेरा है, मेरा ही रहेगा,
कोई आए या जाए जिंदगी में,
अब ये दिल खुद से ही सच्चा रहेगा।

इश्क़ ने तोड़कर जो बनाया मुझे,
वो पहचान अब खास बन गई,
मैं गिरा जरूर था तेरे जाने के बाद…
पर अब मेरी उड़ान आसमान बन गई।

Written & Composed by Vaibhav Kumar Sejwar

टूटा हुआ दिल – Part 4”

“टूटा हुआ दिल – Part 4”

अब मैं वैसा नहीं रहा,
जैसा तेरे साथ हुआ करता था,
दिल अब भी धड़कता है मगर,
किसी के लिए यूँ नहीं झुकता था।

मैंने खुद को फिर से बनाया है,
टूटे टुकड़ों को जोड़कर,
अब मुस्कुराता हूँ मैं भी…
पर दर्द छुपाकर, होठों को मोड़कर।

तूने जो छोड़ा था अधूरा मुझे,
मैंने उसे मुकम्मल कर लिया,
अब किसी के सहारे की ज़रूरत नहीं,
मैंने खुद से ही रिश्ता कर लिया।

अब अगर तू लौट भी आए,
तो शायद मैं रुक ना पाऊँ,
क्योंकि जिस रास्ते पर मैं बढ़ चुका हूँ,
वहाँ तेरा नाम भी नहीं लाऊँ।

ये इश्क़ अब कमजोरी नहीं,
मेरी सबसे बड़ी सीख बन गया है,
और जो मैं आज बना हूँ…
वो तेरे जाने के बाद ही बन पाया है।

Written & Composed by Vaibhav Kumar Sejwar

टूटा हुआ दिल – Part 3”

“टूटा हुआ दिल – Part 3”

अब दर्द नहीं, आग बाकी है,
जो दिल में धीरे-धीरे जलती है,
जिसे कभी खुद से ज्यादा चाहा था,
अब वही याद चुभती है, बदलती है।

तूने छोड़ा था मुझे कमजोर समझकर,
पर तू ये भूल गया एक बात,
टूटे हुए लोग ही सबसे खतरनाक होते हैं,
जब वो बना लेते हैं अपनी औकात।

अब ना तेरी यादों का असर है मुझ पर,
ना तेरे नाम से दिल धड़कता है,
मैंने खुद को इतना मजबूत बना लिया,
कि अब हर दर्द मुझसे डरता है।

तू खुश रह… यही दुआ है मेरी,
पर अब फर्क नहीं पड़ता तेरी खुशी से,
क्योंकि मैंने सीख लिया है जीना,
अपने दम पर, अपनी ही रोशनी से।

जो खोया था, वो सबक बन गया,
जो टूटा था, वो हौसला बन गया,
अब जो मैं बना हूँ, वो पहले कभी नहीं था—
तेरा जाना ही मेरी ताकत बन गया।

Written & Composed by Vaibhav Kumar Sejwar

“टूटा हुआ दिल – Part 2”

“टूटा हुआ दिल – Part 2”

अब शिकायत भी नहीं करता मैं उससे,
क्योंकि हक़ ही खत्म हो चुका है,
जिसे अपना समझकर सब कुछ दिया,
वो रिश्ता ही कहीं खो चुका है।

उसकी यादें अब भी साथ चलती हैं,
जैसे साया धूप में पीछा करता है,
मैं भूलना भी चाहूँ तो कैसे भूलूँ,
दिल हर पल उसका नाम दोहराता है।

वो हँसता होगा अब किसी और के साथ,
ये सोचकर भी मुस्कुरा देता हूँ मैं,
क्योंकि प्यार सच्चा था मेरा,
इसलिए आज भी उसे बद्दुआ नहीं देता हूँ मैं।

टूटकर भी खड़ा हूँ आज मैं,
थोड़ा बिखरा, पर जिंदा हूँ,
उसने छोड़ा तो क्या हुआ…
मैं अब खुद के लिए ही काफी हूँ।

शायद एक दिन ये दर्द भी कम होगा,
और दिल फिर से मुस्कुराएगा,
पर जो सिखा गया वो इश्क़ मुझे,
वो सबक उम्र भर साथ जाएगा।

Written & Composed by Vaibhav Kumar Sejwar  

“टूटा हुआ दिल”

“टूटा हुआ दिल”

वो जो कभी मेरा था,
आज किसी और की कहानी बन गया,
मैंने जिसे खुद से ज्यादा चाहा,
वो मुझे अधूरा छोड़कर चला गया।

रातों में अब भी उसका नाम आता है,
नींद नहीं, बस दर्द सुलाता है,
हर खामोशी में उसकी आवाज़ सुनाई देती है,
पर सच ये है—वो कभी लौटकर नहीं आता है।

मैंने खुद को उसमें इतना खो दिया,
कि अब आईने में भी मैं नहीं दिखता,
दिल तो आज भी उसका इंतज़ार करता है,
पर दिमाग अब सच समझ चुका है—वो मेरा नहीं रहा।

कभी सोचा था साथ उम्र भर चलेगा,
पर वो सफर बीच रास्ते ही खत्म हो गया,
मैं आज भी वहीं खड़ा हूँ…
और वो किसी और के साथ आगे बढ़ गया।

अब दर्द से ही दोस्ती कर ली है मैंने,
आँसूओं से ही बातें होती हैं,
क्योंकि जिसे अपना समझा था सबसे ज्यादा,
उसी ने सबसे गहरी चोट दी है।


Written & Composed by Vaibhav Kumar Sejwar @Sejwarinkofficial 

Monday, April 13

The Labyrinth of Love: Finding Myself in the Lost Pieces मोहब्बत: एक ख़ूबसूरत चक्रव्यूह

हम चाहते ही नहीं
कि किसी की मुस्कान
हमारी सुबह बन जाए,
क्योंकि अगर ऐसा हुआ
तो उसकी एक उदासी
हमारी रातों की नींद चुरा ले जाएगी।

हम चाहते ही नहीं
कि किसी की आवाज़
हमारी धड़कनों में बस जाए,
क्योंकि अगर वो खामोश हुई
तो हमारा दिल भी
सन्नाटे में बदल जाएगा।

हम चाहते ही नहीं
कि किसी का नाम
हमारी दुआओं में उतर आए,
क्योंकि अगर वो नाम छूट गया
तो हर प्रार्थना
अधूरी रह जाएगी।

फिर भी न जाने क्यों,
दिल बार-बार
उसी रास्ते पर चल पड़ता है—
जहाँ मोहब्बत
अपने सबसे खूबसूरत
और सबसे खतरनाक रूप में होती है।

मोहब्बत का ये चक्रव्यूह
अजीब ही खेल खेलता है—
पहले ये हमें सपने देता है,
फिर उन्हीं सपनों को
हमारी आँखों में आँसू बना देता है।

पहले ये किसी को
हमारी दुनिया बना देता है,
फिर उसी दुनिया को
हमसे छीन लेता है।

और तब…
हम खुद से पूछते हैं—
क्या मोहब्बत सच में
इतनी जरूरी थी?

लोग कहते हैं
मोहब्बत सबसे खूबसूरत एहसास है,
पर शायद वो भूल जाते हैं
कि उसी एहसास में
सबसे गहरा दर्द भी छुपा होता है।

क्योंकि जब मोहब्बत मिलती है,
तो इंसान खुद को भूल जाता है,
और जब मोहब्बत बिछड़ती है,
तो वही इंसान
खुद को ढूँढता रह जाता है।

रातें लंबी हो जाती हैं,
खामोशी भारी लगने लगती है,
और हर छोटी सी चीज़
उसकी याद दिलाने लगती है।

एक पुराना गीत,
एक अधूरी बात,
एक खाली रास्ता—
सब कुछ
उसी की कहानी सुनाता है।

मोहब्बत का ये चक्रव्यूह
सिर्फ़ दर्द नहीं देता,
ये हमें बदलता भी है—
हमें गहरा बनाता है,
हमें सिखाता है
कि दिल कितना कुछ सह सकता है।

फिर एक दिन
इंसान समझता है—
कि असली मोहब्बत
किसी को पाना नहीं,
बल्कि उसके बिना भी
उसे चाहना है।

कभी-कभी मोहब्बत
मिलकर पूरी नहीं होती,
कभी वो दूर रहकर
और भी सच्ची हो जाती है।

क्योंकि सच्ची मोहब्बत
वक़्त से नहीं हारती,
दूरी से नहीं टूटती—
वो बस
दिल के किसी कोने में
खामोश होकर बस जाती है।

और तब…
इंसान ये भी समझता है
कि मोहब्बत का चक्रव्यूह
असल में कैद नहीं है,
यह एक सफर है—
जहाँ हर मोड़ पर
दिल टूटता भी है,
और थोड़ा और मजबूत भी होता है।

शायद इसी लिए
हर बार टूटने के बाद भी
दिल फिर से मोहब्बत करता है,
क्योंकि मोहब्बत में हारकर भी
इंसान
कुछ नया जीत जाता है।

और आखिर में…
जब सब कुछ खत्म सा लगता है,
दिल धीरे से कहता है—

“मोहब्बत से डरना नहीं चाहिए,
क्योंकि यही वो चक्रव्यूह है
जहाँ खोकर भी
इंसान खुद को पा लेता है।” ✨

_वैभव कुमार सेजवार_

#sejwarinkofficial



Sunday, April 12

मुसाफिर और रास्ते


वह सुबह की पहली धूप सी उम्मीदें,
और शाम की थकी हुई परछाइयाँ।
जिंदगी के इस लंबे सफर में,
सब कुछ है—खामोशियाँ और रुसवाइयाँ।
**मंज़िल तो बस एक निशान है,**
**जो दूर कहीं ठहरा नजर आता है।**
**पर असली जिंदगी तो वह धूल है,**
**जो पैरों से उठकर माथे तक आता है।**
कभी पथरीली राहें मिलेंगी,
जो पैरों में छाले छोड़ जाएँगी।
कभी मखमली हरियाली होगी,
जो जख्मों पर मरहम लगाएँगी।
पर रुकना मत तुम किसी मोड़ पर,
क्योंकि जो रुक गया, वह पीछे छूट गया।
इस सफर में वही निखरा है,
जो हर ठोकर खाकर फिर से टूटकर जुड़ गया।
न कोई हमसफर यहाँ उम्र भर का है,
न कोई रास्ता हमेशा के लिए साफ है।
यहाँ खुद ही अपनी मशाल जलानी होगी,
खुद ही अपनी गलतियों का इंसाफ है।
**क्योंकि ये रास्ते ही तो गुरु हैं,**
**जो हमें झुकना भी सिखाते हैं और लड़ना भी।**
**अकेलेपन की धूप में तपना भी सिखाते हैं,**
**और अपनी ही सोहबत में संवरना भी।**
जब तुम पहुँचोगे उस आखिरी मुकाम पर,
जहाँ मंज़िल बाहें फैलाए खड़ी होगी।
तब पीछे मुड़कर देखना एक बार,
क्या तुम्हें वह चमकती मीनार बड़ी होगी?
नहीं, तुम्हें याद आएँगे वे टेढ़े-मेढ़े रास्ते,
वे अनजाने लोग जिनसे सिर्फ नजरें मिली थीं।
वे सर्द रातें जहाँ तुम अकेले जागे थे,
और वे छोटी खुशियाँ जो राहों में खिली थीं।
**हकीकत यही है कि हम मुसाफिर नहीं,**
**हम तो खुद एक चलता-फिरता किस्सा हैं।**
**मंज़िल तो बस एक आखिरी पन्ना है,**
**पर ये रास्ते ही हमारी रूह का हिस्सा हैं।**
तो चलते रहो, बदलते रहो,
कि सफर अभी बाकी है।
मिट्टी की खुशबू और यादों का धुआँ,
जीने के लिए बस इतना ही काफी है।

_वैभव कुमार सेजवार_
#SejwarInkOfficial

The Journey of Words – Part 1“रोशनी के नीचे छुपा अंधेरा”

The Journey of Words – Part 1


“रोशनी के नीचे छुपा अंधेरा”


रात फिर से उतरी है
उसी कमरे में,
जहाँ दीवारें अब भी
मेरी खामोशी को पहचानती हैं।
कोने में टंगा वो बल्ब
आज भी जल रहा है—
जैसे उसे आदत हो गई हो
मेरे टूटने की गिनती रखने की।
उसकी रोशनी सीधी नहीं पड़ती,
थोड़ी टेढ़ी है…
जैसे हर सच
सीधा नहीं होता।
मेज़ पर रखी डायरी
आज भी खुली है उसी पन्ने पर,
जहाँ आखिरी बार
मैंने खुद को समझाने की कोशिश की थी।
शब्द लिखे थे—
पर अधूरे,
जैसे इरादे…
जैसे मैं।
बल्ब की हल्की सी चमक
उन लफ़्ज़ों को छूती है,
और हर बार
एक नया मतलब दे जाती है।
कभी लगता है
वो मेरा साथ दे रहा है,
कभी लगता है
वो मेरी सच्चाई उजागर कर रहा है।
अजीब रिश्ता है हमारा—
वो जलता है,
ताकि मैं छुप न सकूँ।
भीड़ में मैं जितना भी
खुद को संभाल लूँ,
यहाँ आकर
सब बिखर जाता है।
और वो…
वो हर टुकड़े को
खामोशी से देखता रहता है।
कभी-कभी
उसकी रोशनी और भी धीमी हो जाती है,
जैसे पूछ रही हो—
“आज फिर खुद से भागोगे?”
मैं जवाब नहीं देता।
बस नज़रें झुका लेता हूँ,
क्योंकि कुछ सवाल
आवाज़ नहीं मांगते—
सिर्फ सच्चाई।
और सच ये है—
मैं अब भी अधूरा हूँ।
पर शायद…
इसी अधूरेपन में
मेरी पूरी कहानी छुपी है। ✍️✨

Monday, March 23

मोहब्बत से परहेज़



सुकून के बारे में 
हम चाहते ही नहीं कि ये दिल कहीं खो जाए, दिल खोएगा तो हर पल तेरी याद सताएगी, 
याद सताएगी तो हर आहट पे तू याद आएगी, 
तेरी याद आएगी तो सुकून-ए-दिल चला जाएगा, 
जब सुकून ही न रहा तो चैन कहाँ से आएगा? 
हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!

वक्त की बर्बादी 
हम चाहते ही नहीं मोहब्बत का सिलसिला शुरू हो, 
सिलसिला शुरू हुआ तो बातों का दौर बढ़ेगा, 
बातों का दौर बढ़ा तो वक्त हाथों से निकलेगा, 
वक्त निकला तो फिर काम अधूरा रह जाएगा, 
अधूरा काम रहा तो तू खुद से नज़रें चुराएगा। 
हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!

 तन्हाई का डर 
हम चाहते ही नहीं तेरा साथ हमें मिल जाए, 
 साथ मिला तो फिर साथ चलने की आदत होगी, 
 आदत हुई तो फिर बिछड़ने में कयामत होगी, 
 बिछड़ गए तो तन्हाई हमें ज़िंदा जलाएगी, 
 मरने से बेहतर है कि ये नौबत ही न आएगी। 
 हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!

आँखों की नमी
 हम चाहते ही नहीं कि तुझसे आँखें चार हों, 
आँखें मिलीं तो फिर ख़्वाबों का घर सजेगा, 
ख़्वाब सजे तो हकीकत से रिश्ता टूटेगा, 
रिश्ता टूटा तो फिर आँखों में पानी आएगा, 
इतना रोयेगा कि सारा शहर जान जाएगा। 
हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!

दुनिया के सवाल 
हम चाहते ही नहीं कि हम बदनाम हो जाएं, बदनाम हुए तो फिर दुनिया सवाल पूछेगी, 
सवाल पूछा तो फिर जुबां लड़खड़ाएगी, 
जुबां लड़खड़ाई तो राज़ खुलकर आएगा, 
राज़ खुला तो तू महफ़िल में न जा पाएगा। 
हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!

नींद और बेकरारी 
हम चाहते ही नहीं कि तू नींदों में शामिल हो, नींदों में आए तो फिर जागना मुहाल होगा, 
जागे रहे तो तेरी यादों में बुरा हाल होगा, 
हाल बिगड़ा तो फिर चेहरा पीला पड़ जाएगा, 
इतनी उलझन में तू खुद को भूल जाएगा। 
हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!

वादों का बोझ 
हम चाहते ही नहीं कि कोई वादा वफ़ा करें, 
वादा किया तो उसे निभाने की फ़िक्र होगी, 
फ़िक्र हुई तो बस तेरे ही नाम का ज़िक्र होगा, 
ज़िक्र बढ़ा तो ये दिल दुनिया से कट जाएगा, 
दुनिया से कटे तो तू बिलकुल अकेला रह जाएगा। 
हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!

उम्मीद की टूटन 
हम चाहते ही नहीं कि तुझसे कोई उम्मीद हो, उम्मीद हुई तो फिर इंतज़ार करना पड़ेगा, 
इंतज़ार किया तो हर लम्हा मरना पड़ेगा, 
इंतज़ार न खत्म हुआ तो यकीन टूट जाएगा, 
यकीन टूटा तो खुदा भी हमसे रूठ जाएगा। 
हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!

 रश्क और जलन 
हम चाहते ही नहीं कि दिल में कोई जलन हो, जलन हुई तो तू गैरों से भी कतराएगा, 
 कतराया तो फिर अपनों को भी रुलाएगा, 
 अपनों को रुलाकर तू कहाँ चैन पाएगा, 
 इस जलन में तू राख की तरह जल जाएगा। 
 हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!

आखिरी अंजाम 
हम चाहते ही नहीं कि ये दास्तां शुरू हो, 
दास्तां शुरू हुई तो फिर अंत भी तो होगा, 
अंत हुआ तो दिल के टुकड़ों का अंबार होगा, 
टुकड़े समेटने में सारा जीवन गुज़र जाएगा, 
जिंदगी बीत गई तो फिर क्या खाक तू जी पाएगा? 
हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!

उलझन और इनकार

हम चाहते ही नहीं कि ये सिलसिला आगे बढ़े, 
सिलसिला बढ़ा तो मुलाकातों की प्यास जागेगी, 
प्यास जागी तो फिर रूह को तेरी तलाश होगी, 
तलाश हुई तो फिर ये दिल काबू में न रहेगा, 
जो काबू में न रहा तो ये दर-दर भटकता फिरेगा। 
हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!

हम चाहते ही नहीं कि तुम्हारी सादगी हमें लुभाए, 
सादगी ने लुभाया तो फिर तारीफों का दौर चलेगा, 
दौर चला तो फिर लफ़्ज़ों में तेरा ही अक्स ढलेगा, 
अक्स ढला तो फिर हम ख़ुद को भूल जाएंगे, 
खुद को भूलकर हम आखिर किधर जाएंगे? 
हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!

हम चाहते ही नहीं कि खामोशी में तेरी आवाज़ गूँजे, 
आवाज़ गूँजी तो फिर तनहाई का शोर बढ़ जाएगा, 
शोर बढ़ा तो फिर सन्नाटा भी हमें डराएगा, 
सन्नाटा डराया तो फिर हम अपनों से कतराएंगे, 
कतराए तो फिर हम अपनी ही नज़रों से गिर जाएंगे। 
हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!

यादों का बोझ

हम चाहते ही नहीं कि तुमसे कोई बात हो, 
बात हुई तो फिर बातों का सिलसिला बढ़ेगा, 
सिलसिला बढ़ा तो मुलाकातों की हसरत होगी, 
हसरत हुई तो फिर जुदाई का डर सताएगा, 
जुदाई का डर सताया तो इंसान जीते-जी मर जाएगा। 
हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!


पराया रिश्ता

हम चाहते ही नहीं कि कोई पराया अपना हो जाए, 
अपना हुआ तो फिर उससे उम्मीदें बँध जाएंगी, 
उम्मीदें बँधी तो फिर फरमाइशों का सिलसिला चलेगा, 
सिलसिला चला तो फिर हक जताने की बात आएगी, 
हक जताया तो फिर पाबंदियां भी साथ लाएंगी। 
हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!

हम चाहते ही नहीं कि परायों से दिल के तार जुड़ें, 
तार जुड़े तो फिर खामोशी का मतलब समझ आएगा, 
मतलब समझ आया तो फिर हम उसकी फिक्र में जिएंगे, 
फिक्र हुई तो फिर अपनी खुशियाँ दांव पर लगेंगी, 
खुशियाँ दांव पर लगीं तो फिर मन उदास हो जाएगा। 
हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!

हम चाहते ही नहीं कि कोई पराया हमारी आदत बने, 
आदत बनी तो फिर उसके बगैर जीना मुश्किल होगा, 
मुश्किल हुआ तो फिर हर सांस पर उसका नाम होगा, 
नाम हुआ तो फिर ये दुनिया इसे 'पागलपन' कहेगी, 
ज़माने ने पागल कहा तो फिर ये रिश्ता टूट जाएगा, 
रिश्ता टूटा तो फिर पराया तो पराया, 
अपना भी कोई न रहेगा। हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!

मिट्टी का घर

हम चाहते ही नहीं कि मिट्टी का कोई घर बन जाए, 
घर बना तो फिर उसे सहेजने की फ़िक्र होगी, 
फ़िक्र हुई तो फिर बारिशों से डर लगेगा, 
डर लगा तो फिर हर बूंद कलेजा चीर जाएगी, 
बूँदें गिरीं तो फिर दीवारें दरकने लगेंगी, 
दीवारें दरकीं तो फिर छत गिरने का खौफ होगा, 
खौफ हुआ तो फिर रातों की नींद उड़ जाएगी। 
हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!

हम चाहते ही नहीं कि मिट्टी की खुशबू मन को भाए, 
खुशबू भाई तो फिर जड़ों से जुड़ने का मोह जागेगा, 
मोह जागा तो फिर पक्के मकानों से नफरत होगी, 
नफरत हुई तो फिर दुनिया हमें पिछड़ा कहेगी, 
दुनिया ने टोका तो फिर स्वाभिमान को चोट लगेगी, 
चोट लगी तो फिर ये कच्चा घर बोझ बन जाएगा। 
हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!

हम चाहते ही नहीं कि इस घर में यादों के दीये जलें, 
दीये जले तो फिर रौशनी से साये बनेंगे, 
साये बने तो फिर तन्हाई और डराएगी, 
तन्हाई डराई तो फिर हम किसी का साथ ढूंढेंगे, 
साथ ढूंढा और न मिला तो फिर ये घर खंडहर हो जाएगा, 
खंडहर हुआ तो फिर इसमें यादों के सिवा कुछ न बचेगा, 
यादें बचीं तो फिर इंसान जीते-जी दफ़न हो जाएगा। 
हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!


सब चले जाते हैं

हम चाहते ही नहीं कि कोई दिल के करीब आए, 
करीब आया तो फिर साथ रहने की कसम होगी, 
कसम हुई तो फिर रूह को उसकी आदत होगी, 
आदत हुई तो फिर बिछड़ने का खौफ जागेगा, 
खौफ जागा तो फिर हर लम्हा शंका में बीतेगा, 
शंका हुई तो फिर रिश्ते में कड़वाहट आएगी, 
कड़वाहट आई तो फिर वो छोड़कर चला जाएगा, 
जब सब चले ही जाते हैं, 
तो कोई आए ही क्यों? 
हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!

हम चाहते ही नहीं कि किसी से उम्मीद-ए-वफा हो, 
उम्मीद हुई तो फिर इंतज़ार का दीया जलेगा, 
दीया जला तो फिर काली रातों से बैर होगा, 
बैर हुआ तो फिर पलकों पर नमी ठहर जाएगी, 
नमी ठहरी तो फिर चेहरा यादों का घर बन जाएगा, 
जब घर उजड़ना ही है, 
तो फिर ये घर बसे ही क्यों? 
हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!

हम चाहते ही नहीं कि महफिल में रौनक आए, 
रौनक आई तो फिर चिरागों का साथ होगा, 
साथ हुआ तो फिर बुझने का वक्त भी आएगा, 
वक्त आया तो फिर अंधेरा और गहरा लगेगा, 
अंधेरा हुआ तो फिर साया भी साथ छोड़ जाएगा, 
जब अंत में तन्हा ही रहना है, 
तो कोई मिले ही क्यों? 
हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाए!

_वैभव कुमार सेजवार_
#SejwarInkOfficial

मुसाफिर की डायरी


​धूल से सनी एक जिल्द, और कुछ मुड़े हुए पन्ने,
इस डायरी में दफन हैं, मेरे कल के अनगिनत सपने।
पहली तारीख को लिखा था, घर छोड़ते वक्त का वो डर,
जब आंसुओं ने भिगो दिया था, मेरा ये नया सफर।

​डायरी कहती है कि रास्ते कभी खत्म नहीं होते,
बस मुसाफिर बदल जाते हैं, और मंजर पुराने होते।
किसी पन्ने पर सूखे हुए, उस पहाड़ी फूल की गंध है,
जो बताया करता था कि आज भी, मेरी रूह कितनी स्वतंत्र है।

​एक जगह लिखा है मैंने, उस बूढ़े बरगद का किस्सा,
जिसकी छांव बना था कभी, मेरी थकान का हिस्सा।
डायरी के बीच में एक नक्शा है, जो हाथ से बनाया है,
मगर दिल के रास्तों को, इसमें कौन देख पाया है?

​कलम की स्याही कहीं फीकी, तो कहीं गाढ़ी हो गई,
जैसे मेरी जिंदगी की दास्तान, थोड़ी टेढ़ी-मेढ़ी हो गई।
वो रात जब बारिश में, एक अजनबी ने पनाह दी थी,
उस एहसान की स्याही, आज भी डायरी में ताजी सी थी।

​डायरी में दर्ज है वो पल, जब मैं हारकर रोया था,
जब मैंने अपनी कीमती चीज, किसी मोड़ पर खोया था।
मगर अगले ही पन्ने पर, फिर से उठने का संकल्प है,
मुसाफिर के पास चलने के सिवा, और क्या विकल्प है?

​लिखा है कि दुनिया कितनी बड़ी, और हम कितने छोटे हैं,
हमारे अहंकार के सिक्के, रास्तों पर कितने खोटे हैं।
हर स्टेशन की टिकट, इस डायरी के सीने में दबी है,
जैसे मेरी हर याद, इस कागज़ की दुनिया में बसी है।

​अंत में बस इतना लिखा है, कि सफर कभी थमता नहीं,
जो रुक गया वो मुसाफिर, फिर डायरी में जमता नहीं।
ये डायरी नहीं, मेरे संघर्षों का एक जीता-जागता गवाह है,
वैभव की कलम से निकला, ये मेरा ही एक गुनाह है।

​लेखक: वैभव कुमार सेजवार
#SejwarInkOfficial

Sunday, March 22

सफरनामा-ए-जिंदगी


​एक खुली किताब है, ये मेरा सफरनामा-ए-जिंदगी,

जहाँ हर कदम पर है संघर्ष, और हर मोड़ पर बंदगी।

वैभव की इस दास्ताँ में, कोई पन्ना कोरा नहीं,

ज़िंदगी ने जो सिखाया, वो किसी और ने बोला नहीं।

​शुरुआत हुई थी बचपन की, उन छोटी गलियों से,

जहाँ सपने महकते थे, फूलों की कच्ची कलियों से।

फिर जवानी के सफर में, तूफानों से नाता जुड़ गया,

जहाँ से चाहा था सीधा जाना, रास्ता वहीं से मुड़ गया।

​सफरनामे में दर्ज हैं, वो रातें जो जागकर काटीं,

वो खुशियाँ जो कम थीं, पर हमने दिल खोलकर बांटीं।

कभी लगा कि सब खत्म है, अंधेरा बहुत घना है,

पर वैभव ने जाना कि हर अंधेरा, सवेरे का ही तना है।

​लिखा है इसमें उन लोगों का नाम, जो छोड़कर चले गए,

और उनका भी शुक्रिया, जो मुश्किलों में साथ पले-बढ़े।

ज़िंदगी के इस सफरनामे में, जीत से ज़्यादा हार के किस्से हैं,

क्योंकि वही हार तो, मेरी तरक्की के सबसे बड़े हिस्से हैं।

​कभी रेगिस्तान की तपिश, तो कभी पहाड़ों की ठंडक मिली,

ज़िंदगी की इस पाठशाला में, मुझे हर तरह की दस्तक मिली।

वैभव ने सीखा कि मुसाफिर का, कोई पक्का पता नहीं होता,

जहाँ सुकून मिल जाए, वहीं उसका खुदा होता।

​ये सफरनामा अभी जारी है, अभी कई पन्ने बाकी हैं,

अभी कई रास्तों की, हसीन रंगीनियां और झांकियां बाकी हैं।

स्याही मेरी हिम्मत है, और कागज़ मेरा ये हौसला है,

तय करना है अभी मुझे, बहुत बड़ा ये फासला है।

​सफरनामा-ए-जिंदगी, एक मुसाफिर की रूह की गवाही है,

जहाँ शब्दों के रूप में, बहती हुई मेरी ही सच्चाई है।

वैभव की ये यात्रा, बस चलती ही रहेगी यूँ ही,

मंज़िल मिले न मिले, सफर की खूबसूरती रहेगी यूँ ही।

​लेखक: वैभव कुमार सेजवार

कुछ लोग बिछड़कर भी अपने रह जाते हैं...

कुछ लोग बिछड़कर भी अपने रह जाते हैं... हर प्रेम... मंज़िल तक पहुँचे... यह ज़रूरी नहीं होता... कुछ प्रेम... रास्तों में बिछड़कर भी... उम्र भर...