अब मैं भागता नहीं यादों से,
उन्हें चुपचाप गुजरने देता हूँ,
जो कभी मेरी कमजोरी थीं,
आज उन्हीं से मैं खुद को गढ़ता हूँ।
तेरा नाम अब भी आता है कभी-कभी,
पर दिल अब वैसा नहीं धड़कता,
जो पहले हर धड़कन में तू थी…
अब वहाँ मेरा खुद का वजूद बसता।
मैंने माफ़ भी कर दिया तुझे,
और खुद को भी आज़ाद किया,
जो रिश्ता हमें बांध रहा था,
उससे आगे बढ़ने का इरादा किया।
अब जो आईना देखता हूँ मैं,
तो एक नया इंसान नज़र आता है,
जो टूटकर बिखरा नहीं…
बल्कि हर टुकड़े से और निखर जाता है।
ये कहानी खत्म नहीं हुई अभी,
बस एक नया मोड़ आया है,
जहाँ दर्द नहीं, सुकून है…
और मैंने खुद को फिर से पाया है।
Written & Composed by Vaibhav Kumar Sejwar
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