वक़्त लगता है ख़ुद से ही मिलने में।
जो बिखर गए हैं यादों के तिनके यहाँ,
उन्हें समेट कर फिर घरौंदा बनाने में,
वक़्त लगता है।
वो जो ख़ामोशी ओढ़ ली है तुमने आज,
उस दर्द को लफ़्ज़ों में ढालने में,
वक़्त लगता है।
कभी धूप कड़ी है, कभी छाँव का बसेरा,
दिल की इस वीरान ज़मीन को गुलिस्ताँ बनाने में,
वक़्त लगता है।
पुरानी मुलाक़ातों के पन्ने पलट कर,
एक नई कहानी की शुरुआत करने में,
वक़्त लगता है।
गिरकर संभलना, संभल कर फिर चलना,
टूटे हुए ख़्वाबों की किरचें हटाने में,
वक़्त लगता है।
पर यकीन रख, सवेरा ज़रूर आएगा,
बस उस अंधेरी रात को ढलने में,
वक़्त लगता है।
Written & Composed by Vaibhav Kumar Sejwar
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