जैसे ठहरे हुए पानी पर कोई पहरा होता है।
कुछ लफ्ज़ जो होंठों तक आकर रुक गए,
वो जज्बात आज भी रूह में कहीं ठहरा होता है।
वो मुलाकातों का सिलसिला जो बीच में ही टूट गया,
हाथों से जैसे रेत का कोई जर्रा छूट गया।
नाराजगी नहीं है तुमसे, न कोई गिला है,
बस मलाल ये है कि मुकद्दर ही रूठ गया।
कभी शाम ढले जब यादों का दरिया बहता है,
एक खालीपन सा इस दिल के कमरे में रहता है।
पूरी हो जाती तो शायद कहानी खत्म हो जाती,
अधूरा है इश्क, तभी तो ये आज भी जिंदा रहता है।
किताब के पन्नों में दबी उस सूखी कली की तरह,
अधूरी मोहब्बत हर धड़कन में चुपके से बहती है।
मुकम्मल न सही, पर ये रूह का किस्सा है,
जो अधूरी होकर भी सबसे मुकम्मल रहती है।
Written & Composed by Vaibhav Kumar Sejwar
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