Thursday, May 7

टूटे हुए ख्वाब

टूटे हुए ख्वाब आँखों में चुभते बहुत हैं,
अधूरे सपनो के मंजर डराते बहुत हैं।
वो जो सजाया था हसरतों का एक महल,
आज उसके खंडहर हमें रुलाते बहुत हैं।
हर ईंट पर लिखा था नाम ख़ुशी का,
अब वो सूखे पत्ते बन कर उड़ते बहुत हैं।
नींद आती नहीं अब इन सूनी रातों में,
बीते हुए लम्हे खामोशी में गूँजते बहुत हैं।
जो वादे किए थे खुद से और ज़माने से,
वो टूटे हुए काँच की तरह चुपके से चुभते बहुत हैं।
मिटा तो दी है हमने यादों की वो लकीरें,
पर जख्म पुराने आज भी सीने में दुखते बहुत हैं।
खोजता हूँ मैं खुद को उन यादों के मलबे में,
जहाँ टूटे हुए ख्वाब अब भी धड़कते बहुत हैं।
Written & Composed by Vaibhav Kumar Sejwar

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