Monday, May 4

एहसास-ए-मुकम्मल

 एहसास-ए-मुकम्मल

तू पास हो तो हर ख्वाहिश पूरी लगती है,
तेरे बिना ये ज़िंदगी अधूरी लगती है।
धड़कनों में घुली है एक अजीब सी बेचैनी,
तू जो नहीं, तो हर साँस भी ज़रूरी लगती है।
इन खामोश रास्तों पर तेरा साथ चाहिए,
अँधेरी रातों में तेरा हाथ चाहिए।
बिखरे हुए हैं ख़्वाब ज़मीन पर कांच की तरह,
सहेज ले जो मुझको, वो जज्बात चाहिए।
वक़्त की लहरों में बहता जा रहा हूँ मैं,
तन्हाई के साये में सिमटता जा रहा हूँ मैं।
तू एक बार लौट कर फिर से पुकार ले,
खुद को ढूँढने की कोशिश में मिटता जा रहा हूँ मैं।
तेरी मुस्कुराहट में ही मेरा सवेरा है,
वरना इन आँखों में तो बस यादों का बसेरा है।
फासले जितने भी हों हमारे दरमियान,
ये दिल आज भी सिर्फ और सिर्फ तेरा है।
Written & Composed by Vaibhav Kumar Sejwar

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