बिना कहे ये दर्द की पूरी कहानी कहते हैं।
दुनिया की भीड़ में जो लबों से पूछते हैं,
तन्हाइयों में वही बार-बार नदी बन बहती हैं।
ना कोई शोर होता है, ना कोई शिकायत होती है,
बस यात्रा करते लम्हों की एक याद है।
गॉल पर उतरती वो नाम सी एक रूढ़ि,
अंदर ही अंदर किसी उम्मीद की बुनियाद होती है।
लोग समझते हैं कि हम संभल गए हैं अब,
हकीकत में तो जज़्बात अंदर ही अंदर दहाते हैं।
जो जुबां पर न आ सके कभी वो शब्द,
आँखों भरी आँखें उभरती रातों को सहती हैं।
ये वो समंदर हैं फ़्लैट कोई फ़्लैट नहीं,
इनके अलावा कोई और सहारा नहीं।
दिल के कोने में दिखाया गया है जो एक कास्क,
उसे आँखें मूँद कर ही बयाँ करते हैं, कोई और इशारा नहीं।
वैभव कुमार सेजवार द्वारा लिखित और संगीतबद्ध।
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