Monday, April 13

The Labyrinth of Love: Finding Myself in the Lost Pieces मोहब्बत: एक ख़ूबसूरत चक्रव्यूह

हम चाहते ही नहीं
कि किसी की मुस्कान
हमारी सुबह बन जाए,
क्योंकि अगर ऐसा हुआ
तो उसकी एक उदासी
हमारी रातों की नींद चुरा ले जाएगी।

हम चाहते ही नहीं
कि किसी की आवाज़
हमारी धड़कनों में बस जाए,
क्योंकि अगर वो खामोश हुई
तो हमारा दिल भी
सन्नाटे में बदल जाएगा।

हम चाहते ही नहीं
कि किसी का नाम
हमारी दुआओं में उतर आए,
क्योंकि अगर वो नाम छूट गया
तो हर प्रार्थना
अधूरी रह जाएगी।

फिर भी न जाने क्यों,
दिल बार-बार
उसी रास्ते पर चल पड़ता है—
जहाँ मोहब्बत
अपने सबसे खूबसूरत
और सबसे खतरनाक रूप में होती है।

मोहब्बत का ये चक्रव्यूह
अजीब ही खेल खेलता है—
पहले ये हमें सपने देता है,
फिर उन्हीं सपनों को
हमारी आँखों में आँसू बना देता है।

पहले ये किसी को
हमारी दुनिया बना देता है,
फिर उसी दुनिया को
हमसे छीन लेता है।

और तब…
हम खुद से पूछते हैं—
क्या मोहब्बत सच में
इतनी जरूरी थी?

लोग कहते हैं
मोहब्बत सबसे खूबसूरत एहसास है,
पर शायद वो भूल जाते हैं
कि उसी एहसास में
सबसे गहरा दर्द भी छुपा होता है।

क्योंकि जब मोहब्बत मिलती है,
तो इंसान खुद को भूल जाता है,
और जब मोहब्बत बिछड़ती है,
तो वही इंसान
खुद को ढूँढता रह जाता है।

रातें लंबी हो जाती हैं,
खामोशी भारी लगने लगती है,
और हर छोटी सी चीज़
उसकी याद दिलाने लगती है।

एक पुराना गीत,
एक अधूरी बात,
एक खाली रास्ता—
सब कुछ
उसी की कहानी सुनाता है।

मोहब्बत का ये चक्रव्यूह
सिर्फ़ दर्द नहीं देता,
ये हमें बदलता भी है—
हमें गहरा बनाता है,
हमें सिखाता है
कि दिल कितना कुछ सह सकता है।

फिर एक दिन
इंसान समझता है—
कि असली मोहब्बत
किसी को पाना नहीं,
बल्कि उसके बिना भी
उसे चाहना है।

कभी-कभी मोहब्बत
मिलकर पूरी नहीं होती,
कभी वो दूर रहकर
और भी सच्ची हो जाती है।

क्योंकि सच्ची मोहब्बत
वक़्त से नहीं हारती,
दूरी से नहीं टूटती—
वो बस
दिल के किसी कोने में
खामोश होकर बस जाती है।

और तब…
इंसान ये भी समझता है
कि मोहब्बत का चक्रव्यूह
असल में कैद नहीं है,
यह एक सफर है—
जहाँ हर मोड़ पर
दिल टूटता भी है,
और थोड़ा और मजबूत भी होता है।

शायद इसी लिए
हर बार टूटने के बाद भी
दिल फिर से मोहब्बत करता है,
क्योंकि मोहब्बत में हारकर भी
इंसान
कुछ नया जीत जाता है।

और आखिर में…
जब सब कुछ खत्म सा लगता है,
दिल धीरे से कहता है—

“मोहब्बत से डरना नहीं चाहिए,
क्योंकि यही वो चक्रव्यूह है
जहाँ खोकर भी
इंसान खुद को पा लेता है।” ✨

_वैभव कुमार सेजवार_

#sejwarinkofficial



Sunday, April 12

मुसाफिर और रास्ते


वह सुबह की पहली धूप सी उम्मीदें,
और शाम की थकी हुई परछाइयाँ।
जिंदगी के इस लंबे सफर में,
सब कुछ है—खामोशियाँ और रुसवाइयाँ।
**मंज़िल तो बस एक निशान है,**
**जो दूर कहीं ठहरा नजर आता है।**
**पर असली जिंदगी तो वह धूल है,**
**जो पैरों से उठकर माथे तक आता है।**
कभी पथरीली राहें मिलेंगी,
जो पैरों में छाले छोड़ जाएँगी।
कभी मखमली हरियाली होगी,
जो जख्मों पर मरहम लगाएँगी।
पर रुकना मत तुम किसी मोड़ पर,
क्योंकि जो रुक गया, वह पीछे छूट गया।
इस सफर में वही निखरा है,
जो हर ठोकर खाकर फिर से टूटकर जुड़ गया।
न कोई हमसफर यहाँ उम्र भर का है,
न कोई रास्ता हमेशा के लिए साफ है।
यहाँ खुद ही अपनी मशाल जलानी होगी,
खुद ही अपनी गलतियों का इंसाफ है।
**क्योंकि ये रास्ते ही तो गुरु हैं,**
**जो हमें झुकना भी सिखाते हैं और लड़ना भी।**
**अकेलेपन की धूप में तपना भी सिखाते हैं,**
**और अपनी ही सोहबत में संवरना भी।**
जब तुम पहुँचोगे उस आखिरी मुकाम पर,
जहाँ मंज़िल बाहें फैलाए खड़ी होगी।
तब पीछे मुड़कर देखना एक बार,
क्या तुम्हें वह चमकती मीनार बड़ी होगी?
नहीं, तुम्हें याद आएँगे वे टेढ़े-मेढ़े रास्ते,
वे अनजाने लोग जिनसे सिर्फ नजरें मिली थीं।
वे सर्द रातें जहाँ तुम अकेले जागे थे,
और वे छोटी खुशियाँ जो राहों में खिली थीं।
**हकीकत यही है कि हम मुसाफिर नहीं,**
**हम तो खुद एक चलता-फिरता किस्सा हैं।**
**मंज़िल तो बस एक आखिरी पन्ना है,**
**पर ये रास्ते ही हमारी रूह का हिस्सा हैं।**
तो चलते रहो, बदलते रहो,
कि सफर अभी बाकी है।
मिट्टी की खुशबू और यादों का धुआँ,
जीने के लिए बस इतना ही काफी है।

_वैभव कुमार सेजवार_
#SejwarInkOfficial

The Journey of Words – Part 1“रोशनी के नीचे छुपा अंधेरा”

The Journey of Words – Part 1


“रोशनी के नीचे छुपा अंधेरा”


रात फिर से उतरी है
उसी कमरे में,
जहाँ दीवारें अब भी
मेरी खामोशी को पहचानती हैं।
कोने में टंगा वो बल्ब
आज भी जल रहा है—
जैसे उसे आदत हो गई हो
मेरे टूटने की गिनती रखने की।
उसकी रोशनी सीधी नहीं पड़ती,
थोड़ी टेढ़ी है…
जैसे हर सच
सीधा नहीं होता।
मेज़ पर रखी डायरी
आज भी खुली है उसी पन्ने पर,
जहाँ आखिरी बार
मैंने खुद को समझाने की कोशिश की थी।
शब्द लिखे थे—
पर अधूरे,
जैसे इरादे…
जैसे मैं।
बल्ब की हल्की सी चमक
उन लफ़्ज़ों को छूती है,
और हर बार
एक नया मतलब दे जाती है।
कभी लगता है
वो मेरा साथ दे रहा है,
कभी लगता है
वो मेरी सच्चाई उजागर कर रहा है।
अजीब रिश्ता है हमारा—
वो जलता है,
ताकि मैं छुप न सकूँ।
भीड़ में मैं जितना भी
खुद को संभाल लूँ,
यहाँ आकर
सब बिखर जाता है।
और वो…
वो हर टुकड़े को
खामोशी से देखता रहता है।
कभी-कभी
उसकी रोशनी और भी धीमी हो जाती है,
जैसे पूछ रही हो—
“आज फिर खुद से भागोगे?”
मैं जवाब नहीं देता।
बस नज़रें झुका लेता हूँ,
क्योंकि कुछ सवाल
आवाज़ नहीं मांगते—
सिर्फ सच्चाई।
और सच ये है—
मैं अब भी अधूरा हूँ।
पर शायद…
इसी अधूरेपन में
मेरी पूरी कहानी छुपी है। ✍️✨

कुछ लोग बिछड़कर भी अपने रह जाते हैं...

कुछ लोग बिछड़कर भी अपने रह जाते हैं... हर प्रेम... मंज़िल तक पहुँचे... यह ज़रूरी नहीं होता... कुछ प्रेम... रास्तों में बिछड़कर भी... उम्र भर...