“रोशनी के नीचे छुपा अंधेरा”
रात फिर से उतरी है
उसी कमरे में,
जहाँ दीवारें अब भी
मेरी खामोशी को पहचानती हैं।
कोने में टंगा वो बल्ब
आज भी जल रहा है—
जैसे उसे आदत हो गई हो
मेरे टूटने की गिनती रखने की।
उसकी रोशनी सीधी नहीं पड़ती,
थोड़ी टेढ़ी है…
जैसे हर सच
सीधा नहीं होता।
मेज़ पर रखी डायरी
आज भी खुली है उसी पन्ने पर,
जहाँ आखिरी बार
मैंने खुद को समझाने की कोशिश की थी।
शब्द लिखे थे—
पर अधूरे,
जैसे इरादे…
जैसे मैं।
बल्ब की हल्की सी चमक
उन लफ़्ज़ों को छूती है,
और हर बार
एक नया मतलब दे जाती है।
कभी लगता है
वो मेरा साथ दे रहा है,
कभी लगता है
वो मेरी सच्चाई उजागर कर रहा है।
अजीब रिश्ता है हमारा—
वो जलता है,
ताकि मैं छुप न सकूँ।
भीड़ में मैं जितना भी
खुद को संभाल लूँ,
यहाँ आकर
सब बिखर जाता है।
और वो…
वो हर टुकड़े को
खामोशी से देखता रहता है।
कभी-कभी
उसकी रोशनी और भी धीमी हो जाती है,
जैसे पूछ रही हो—
“आज फिर खुद से भागोगे?”
मैं जवाब नहीं देता।
बस नज़रें झुका लेता हूँ,
क्योंकि कुछ सवाल
आवाज़ नहीं मांगते—
सिर्फ सच्चाई।
और सच ये है—
मैं अब भी अधूरा हूँ।
पर शायद…
इसी अधूरेपन में
मेरी पूरी कहानी छुपी है। ✍️✨
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