Sunday, April 12

मुसाफिर और रास्ते


वह सुबह की पहली धूप सी उम्मीदें,
और शाम की थकी हुई परछाइयाँ।
जिंदगी के इस लंबे सफर में,
सब कुछ है—खामोशियाँ और रुसवाइयाँ।
**मंज़िल तो बस एक निशान है,**
**जो दूर कहीं ठहरा नजर आता है।**
**पर असली जिंदगी तो वह धूल है,**
**जो पैरों से उठकर माथे तक आता है।**
कभी पथरीली राहें मिलेंगी,
जो पैरों में छाले छोड़ जाएँगी।
कभी मखमली हरियाली होगी,
जो जख्मों पर मरहम लगाएँगी।
पर रुकना मत तुम किसी मोड़ पर,
क्योंकि जो रुक गया, वह पीछे छूट गया।
इस सफर में वही निखरा है,
जो हर ठोकर खाकर फिर से टूटकर जुड़ गया।
न कोई हमसफर यहाँ उम्र भर का है,
न कोई रास्ता हमेशा के लिए साफ है।
यहाँ खुद ही अपनी मशाल जलानी होगी,
खुद ही अपनी गलतियों का इंसाफ है।
**क्योंकि ये रास्ते ही तो गुरु हैं,**
**जो हमें झुकना भी सिखाते हैं और लड़ना भी।**
**अकेलेपन की धूप में तपना भी सिखाते हैं,**
**और अपनी ही सोहबत में संवरना भी।**
जब तुम पहुँचोगे उस आखिरी मुकाम पर,
जहाँ मंज़िल बाहें फैलाए खड़ी होगी।
तब पीछे मुड़कर देखना एक बार,
क्या तुम्हें वह चमकती मीनार बड़ी होगी?
नहीं, तुम्हें याद आएँगे वे टेढ़े-मेढ़े रास्ते,
वे अनजाने लोग जिनसे सिर्फ नजरें मिली थीं।
वे सर्द रातें जहाँ तुम अकेले जागे थे,
और वे छोटी खुशियाँ जो राहों में खिली थीं।
**हकीकत यही है कि हम मुसाफिर नहीं,**
**हम तो खुद एक चलता-फिरता किस्सा हैं।**
**मंज़िल तो बस एक आखिरी पन्ना है,**
**पर ये रास्ते ही हमारी रूह का हिस्सा हैं।**
तो चलते रहो, बदलते रहो,
कि सफर अभी बाकी है।
मिट्टी की खुशबू और यादों का धुआँ,
जीने के लिए बस इतना ही काफी है।

_वैभव कुमार सेजवार_
#SejwarInkOfficial

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कुछ लोग बिछड़कर भी अपने रह जाते हैं...

कुछ लोग बिछड़कर भी अपने रह जाते हैं... हर प्रेम... मंज़िल तक पहुँचे... यह ज़रूरी नहीं होता... कुछ प्रेम... रास्तों में बिछड़कर भी... उम्र भर...