Friday, February 27

रात, रास्ता और हम (कविता)

बस का वो पुराना शोर, 
और बाहर सन्नाटा गहरा,
शीशे पर धुंधली सी दिखी, 
यादों का एक चेहरा।
कंडक्टर की सीटी, 
जैसे किसी ख़्वाब को तोड़ दे,
जैसे कोई पीछे छूटा, 
हाथ हवा में छोड़ दे।
पहाड़ नहीं थे रस्ते में, 
पर ढलान सी महसूस हुई,
सीट के उस खालीपन में, 
तुम्हारी पहचान सी महसूस हुई।
रोडवेज़ की उस लाइट में, 
धूल उड़ती दिखती थी,
जैसे मेरी किस्मत भी, 
उन रास्तों पर बिकती थी।



लेखक:- वैभव कुमार सेजवार

Thursday, February 26

गाँव की होली (कविता)

गाँव की चौपाल पे जब ढोल की थाप सुनाई देती है,

मस्ती में डूबी टोली हर गली में दिखाई देती है,

पीली सरसों के खेतों में फागुन का रंग निखरता है,

हवा में घुला गुलाल हर चेहरे पर ख़ुशी बिखेरता है,

पुरानी रंजिशें भूलकर सब गले यहाँ मिल जाते हैं,

भाँग की मस्ती में बूढ़े भी बच्चे बन मुस्काते हैं,

घर-घर बनती गुजिया और सोंधी मालपुए की महक,

आँगन में गूँजती बच्चों की वो प्यारी सी चहक,

शाम को जलती होलिका और दुआओं का वो मंजर,

प्रेम के रंग में भीगा हुआ गाँव का हर इक मंजर,

शहरों की भीड़ से दूर यहाँ सादगी का उल्लास है,

गाँव की मिट्टी वाली होली सच में बहुत खास है,

लेखक:- वैभव कुमार सेजवार


सन्नाटे की गूँज (कविता)



शहर की इस भागदौड़ में जब सब शांत हो जाता है,
 तब मेरे अंदर का एक शोर अचानक जाग जाता है।
 बाहर तो सन्नाटा है,
 पर कानों में इक गूँज है,
 ख्यालों के समंदर में उठती हुई इक तरंग है।
 ये सन्नाटे की गूँज है।

 वो बातें जो दिन के उजाले में कहीं दब गई थीं,
 वो यादें जो वक्त की धूल में कहीं जम गई थीं।
 अब अंधेरी रात में वो साफ़ सुनाई देती हैं,
 खामोश दीवारों पर भी परछाइयाँ दिखाई देती हैं। अकेलेपन का संगीत है ये।

कभी ये गूँज डराती है, 
तो कभी सुकून देती है,
 बीते हुए कल की कड़वी-मीठी सी धुन देती है। 
जब कोई पास नहीं होता, 
तब खुद से मुलाकात होती है, 
सन्नाटे की ज़ुबान में,
 रूह से बात होती है।
 ये अंतर्मन का आइना है।

इस गूँज में छिपे हैं वो सवाल जिनके जवाब नहीं,
 इस सन्नाटे में सिमटे हैं वो ख्वाब जिनकी ताबीर नहीं। हम दुनिया से तो छुप सकते हैं, 
पर खुद से कहाँ जाएंगे, 
इस खामोशी की महफिल में,
 हम खुद को ही पाएंगे।
 ये सच्चाई की आवाज़ है।

सन्नाटा सिर्फ खालीपन नहीं, 
एक गहरी पुकार है, 
शोर के बाद मिलने वाला, 
मन का ही उपहार है। 
सुनो इसे ध्यान से,
 ये तुम्हें बहुत कुछ बताएगी, 
तुम्हारी असल पहचान,
 ये गूँज ही कराएगी।
 ये खामोशी का पैगाम है।

लेखक : वैभव कुमार सेजवार

पुराना प्यार (कविता)

​वो लम्हे आज भी ज़हन में अक्सर लौट आते हैं,जब हम साथ थे, 
वो बीते पल बहुत सताते हैं।
वो अनकही बातें, 
वो गुफ़्तगू का सिलसिला,
उसकी दी हुई वो मुस्कान, 
आज भी राह दिखाते हैं।
​वो अहसास हाथों का, 
जो मेरे हाथों में थे,
वो नज़रें, 
जो सिर्फ़ मेरी ही तलाशों में थीं।
चेहरा उसका, 
जो दिल के कोने में कहीं बस गया,
वो रूहानी चमक, 
जो मेरी ही दुआओं में थी।
​मगर अब वो पास नहीं, 
वो मंजर कहीं खो गया,
हक़ीक़त की धूप में, 
वो साया कहीं सो गया।
पर उसकी यादें महकती हैं, 
मेरे दिल के आँगन में,
जैसे पतझड़ के बाद भी, 
कोई फूल बागों में रह गया।
​जब तन्हाई घेरती है, 
या उदास होता है ये मन,
मैं उसकी यादों की चादर ओढ़ लेता हूँ हर क्षण।
फिर एक दबी सी मुस्कान लबों पर खिल जाती है,
क्योंकि वो पास न सही, 
पर मुझमें है धड़कन बन।


लेखक :- वैभव कुमार सेजवार

Monday, February 16

लास्ट सीन की बेचैनी (कविता)

स्क्रीन की नीली रोशनी में एक वक्त ठहरा है, 
ये इंतज़ार का ज़ख्म, 
आज कुछ और गहरा है। 
घड़ी की सुइयों से ज़्यादा उस 'Last Seen' पर नज़र है, तू ऑनलाइन होकर भी खामोश है, 
बस इसी बात का डर है। 
ये डिजिटल युग की नई तन्हाई है।

कभी पाँच मिनट पहले, 
तो कभी अभी-अभी का वो निशान, 
मेरी धड़कनों को जैसे कर रहा हो लहूलुहान। 
मैसेज मेरा 'Delivered' है, 
पर 'Read' नहीं हुआ, 
क्या तूने जानबूझकर, 
मेरे अहसास को नहीं छुआ? 
एक स्टेटस के पीछे हज़ारों सवाल छिपे हैं।

बार-बार रिफ्रेश करना और तेरा चैट खोलना, 
जैसे खुद ही अपनी ही नज़रों में थोड़ा कम होना। 
तू किसी और से बात कर रही है, 
या बस यूँ ही जाग रही है? 
मेरी बेचैनी से शायद तू मीलों दूर भाग रही है। 
ये 'Online' का टैग सुकून भी है और सज़ा भी।

पुराने वक्त में खामोशी का मतलब सिर्फ़ दूरी था, 
अब तो पास होकर भी जवाब न देना, 
एक मज़बूरी है। 
वक्त बदल गया, 
पर इंतज़ार का तरीका वही है, 
सिर्फ़ कागज़ की जगह, 
अब कांच की ये दुनिया सही है। 
पर दर्द की गहराई आज भी उतनी ही है।

थक कर फोन रख देता हूँ, 
पर मन नहीं मानता, 
तू क्या सोच रही है, 
मेरा दिल अब नहीं जानता। 
लास्ट सीन बदल गया, 
पर मेरा हाल वही है, 
इस टेक्नोलॉजी की भीड़ में, 
मोहब्बत कहीं खो गई है। 
बस एक 'Typing...' के इंतज़ार में रात कट जाती है।

लेखक : वैभव कुमार सेजवार

स्क्रीनशॉट में कैद लम्हे (कविता)


वो बातें जो कभी हवा में उड़ जानी थीं,
वो हँसी जो बस एक पल की कहानी थी।
मैंने उन्हें एक क्लिक में रोक लिया, 
वक्त के बहते दरिया को जैसे टोक लिया। 
ये स्क्रीनशॉट मेरी यादों की तिजोरी हैं।

तुम्हारी वो तारीफ और मेरा वो मुस्कुराना, 
पुरानी चैट के मलबे से उन पलों को उठाना। 
गैलरी के किसी अंधेरे फोल्डर में दबे हैं वो, 
आज भी उतने ही ताज़ा और सजे हैं वो। 
जैसे वक्त वहाँ आज भी ठहरा हुआ है।

कभी-कभी डर लगता है उन्हें फिर से देखने में, 
कहीं जल न जाऊं यादों की उस अगन में। 
पर वो सुबूत हैं कि हम कभी करीब थे, 
एक-दूसरे के लिए हम कितने अजीब और खुशनसीब थे। ये डिजिटल कागज़ कभी फटने वाले नहीं।

असली मैसेज तो शायद अब डिलीट हो चुके हैं, 
रिश्ते भी वक्त की गर्द में कहीं खो चुके हैं। 
पर ये स्क्रीनशॉट आज भी गवाही देते हैं, 
मेरे टूटे हुए दिल को थोड़ी पनाह देते हैं। 
ये मेरे बीते हुए कल का वजूद हैं।

फोन बदल जाएगा, 
डेटा भी शायद उड़ जाए, 
पर क्या ये यादें किसी और मोड़ पर मुड़ पाए? 
जब तक ये तस्वीरें हैं, 
तुम मेरे पास हो, 
भले ही हकीकत में अजनबी, 
पर अहसास में खास हो।
स्क्रीनशॉट में कैद,
वो मेरी ज़िंदगी का हिस्सा हैं।

लेखक : वैभव कुमार सेजवार

अनसेंड (Unsend) मैसेज की टीस (कविता)


 एक लम्हा लगा लिखने में,
और एक पल उसे मिटाने में, 
कितनी बातें दम तोड़ गईं, 
उस 'Unsend' के बहाने में।
वो जो दिल की बात लबों तक आई थी, 
पर थम गई, 
नीली स्क्रीन पर एक खाली जगह,
यादों में जम गई। 
एक अधूरा सच, 
जो कभी तुम तक पहुँचा ही नहीं।
टाइपिंग का वो निशान शायद तुमने देखा होगा, 
मेरे मन में उठते उस तूफान को तुमने परखा होगा।
मगर डर और हिचकिचाहट ने हाथ खींच लिए,
सच्चे जज़्बात मैंने डिजिटल अँधेरे में ही सी लिए।
वो मिटा हुआ मैसेज,
एक अनकही पुकार है।
क्या था उसमें? शायद माफ़ी,
या फिर सिर्फ़ एक 'Hi',
या बरसों की दबी हुई कोई गहरी तन्हाई। 
अब बस एक नोटिफिकेशन की राख बची है,
मेरे अधूरेपन की एक छोटी सी झाँकी सजी है।
वो खाली जगह, 
किसी ज़ख्म की तरह कचोटती है।
कभी-कभी लगता है कि भेज ही दिया होता, 
अपने दिल का बोझ थोड़ा कम कर लिया होता।
पर अब वो शब्द लौटकर नहीं आएंगे, 
वो राज़ अब मेरे साथ ही दफ़न हो जाएंगे। 
डिलीट करना आसान है,
भुलाना नहीं।
तुम शायद सोचती होगी कि क्या लिखना चाहा था,
मैंने किस दर्द को,
शब्दों में ढालना चाहा था।
पर वो सन्नाटा ही अब हमारी हकीकत है,
मिटे हुए अल्फाजों में ही छिपी, 
मेरी वसीयत है।
वो अनसेंड मैसेज,
मेरी रूह की एक सिसकी है।

लेखक: वैभव कुमार सेजवार 

पुरानी डायरी का एक कोना (कविता)


      अलमारी की सबसे निचली दराज़ में दबी हुई,
 धूल और वक्त की परतों में कहीं सजी हुई।
 एक पुरानी डायरी का वो मोड़ा हुआ कोना,
 जहाँ छुपा रखा है मैंने, अपना हर पाना-खोने।
 ये मेरे बीते हुए कल का आइना है।

           सूखे हुए उस फूल की महक अब भी बाकी है,
 किसी के नाम की अधूरी सी वो साखी है।
 वो पन्ने जो आंसुओं की बूंदों से थोड़े फूल गए,
 वो वादे जिन्हें दुनिया वाले शायद भूल गए।
 उसी कोने में सब महफ़ूज़ है।

         लिखा था जहाँ कभी "तुम सिर्फ मेरी हो",
 अब वहाँ सिर्फ़ स्याही की काली अंधेरी है।
 बेवजह की कविताएँ और वो बचकाने से ख्वाब
 डायरी का वो कोना देता है मेरे हर मौन का जवाब। 
वो सन्नाटा आज भी गूँजता है।

           कभी-कभी डर लगता है उन पन्नों को पलटने में, कहीं फिर से न खो जाऊं यादों के सिमटने में।
 मगर वो कोना ही तो है जो मुझे मुझसे मिलाता है, 
मैं असल में क्या था, ये चुपके से बताता है।
 वो मेरा सबसे निजी कोना है।

           अब नए पन्ने भरने की फुर्सत नहीं मिलती,
 इस भागती दुनिया में वो रंगत नहीं मिलती। 
पर जब भी दिल भर आता है और अकेला होता हूँ, 
मैं उसी पुरानी डायरी के कोने में जाकर सोता हूँ। 
वो कोना मेरी रूह का घर है।


लेखक: वैभव कुमार सेजवार

कुछ लोग बिछड़कर भी अपने रह जाते हैं...

कुछ लोग बिछड़कर भी अपने रह जाते हैं... हर प्रेम... मंज़िल तक पहुँचे... यह ज़रूरी नहीं होता... कुछ प्रेम... रास्तों में बिछड़कर भी... उम्र भर...