Thursday, February 26

गाँव की होली (कविता)

गाँव की चौपाल पे जब ढोल की थाप सुनाई देती है,

मस्ती में डूबी टोली हर गली में दिखाई देती है,

पीली सरसों के खेतों में फागुन का रंग निखरता है,

हवा में घुला गुलाल हर चेहरे पर ख़ुशी बिखेरता है,

पुरानी रंजिशें भूलकर सब गले यहाँ मिल जाते हैं,

भाँग की मस्ती में बूढ़े भी बच्चे बन मुस्काते हैं,

घर-घर बनती गुजिया और सोंधी मालपुए की महक,

आँगन में गूँजती बच्चों की वो प्यारी सी चहक,

शाम को जलती होलिका और दुआओं का वो मंजर,

प्रेम के रंग में भीगा हुआ गाँव का हर इक मंजर,

शहरों की भीड़ से दूर यहाँ सादगी का उल्लास है,

गाँव की मिट्टी वाली होली सच में बहुत खास है,

लेखक:- वैभव कुमार सेजवार


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