स्क्रीन की नीली रोशनी में एक वक्त ठहरा है,
ये इंतज़ार का ज़ख्म,
आज कुछ और गहरा है।
घड़ी की सुइयों से ज़्यादा उस 'Last Seen' पर नज़र है, तू ऑनलाइन होकर भी खामोश है,
बस इसी बात का डर है।
ये डिजिटल युग की नई तन्हाई है।
कभी पाँच मिनट पहले,
तो कभी अभी-अभी का वो निशान,
मेरी धड़कनों को जैसे कर रहा हो लहूलुहान।
मैसेज मेरा 'Delivered' है,
पर 'Read' नहीं हुआ,
क्या तूने जानबूझकर,
मेरे अहसास को नहीं छुआ?
एक स्टेटस के पीछे हज़ारों सवाल छिपे हैं।
बार-बार रिफ्रेश करना और तेरा चैट खोलना,
जैसे खुद ही अपनी ही नज़रों में थोड़ा कम होना।
तू किसी और से बात कर रही है,
या बस यूँ ही जाग रही है?
मेरी बेचैनी से शायद तू मीलों दूर भाग रही है।
ये 'Online' का टैग सुकून भी है और सज़ा भी।
पुराने वक्त में खामोशी का मतलब सिर्फ़ दूरी था,
अब तो पास होकर भी जवाब न देना,
एक मज़बूरी है।
वक्त बदल गया,
पर इंतज़ार का तरीका वही है,
सिर्फ़ कागज़ की जगह,
अब कांच की ये दुनिया सही है।
पर दर्द की गहराई आज भी उतनी ही है।
थक कर फोन रख देता हूँ,
पर मन नहीं मानता,
तू क्या सोच रही है,
मेरा दिल अब नहीं जानता।
लास्ट सीन बदल गया,
पर मेरा हाल वही है,
इस टेक्नोलॉजी की भीड़ में,
मोहब्बत कहीं खो गई है।
बस एक 'Typing...' के इंतज़ार में रात कट जाती है।
लेखक : वैभव कुमार सेजवार
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