Monday, February 16

अनसेंड (Unsend) मैसेज की टीस (कविता)


 एक लम्हा लगा लिखने में,
और एक पल उसे मिटाने में, 
कितनी बातें दम तोड़ गईं, 
उस 'Unsend' के बहाने में।
वो जो दिल की बात लबों तक आई थी, 
पर थम गई, 
नीली स्क्रीन पर एक खाली जगह,
यादों में जम गई। 
एक अधूरा सच, 
जो कभी तुम तक पहुँचा ही नहीं।
टाइपिंग का वो निशान शायद तुमने देखा होगा, 
मेरे मन में उठते उस तूफान को तुमने परखा होगा।
मगर डर और हिचकिचाहट ने हाथ खींच लिए,
सच्चे जज़्बात मैंने डिजिटल अँधेरे में ही सी लिए।
वो मिटा हुआ मैसेज,
एक अनकही पुकार है।
क्या था उसमें? शायद माफ़ी,
या फिर सिर्फ़ एक 'Hi',
या बरसों की दबी हुई कोई गहरी तन्हाई। 
अब बस एक नोटिफिकेशन की राख बची है,
मेरे अधूरेपन की एक छोटी सी झाँकी सजी है।
वो खाली जगह, 
किसी ज़ख्म की तरह कचोटती है।
कभी-कभी लगता है कि भेज ही दिया होता, 
अपने दिल का बोझ थोड़ा कम कर लिया होता।
पर अब वो शब्द लौटकर नहीं आएंगे, 
वो राज़ अब मेरे साथ ही दफ़न हो जाएंगे। 
डिलीट करना आसान है,
भुलाना नहीं।
तुम शायद सोचती होगी कि क्या लिखना चाहा था,
मैंने किस दर्द को,
शब्दों में ढालना चाहा था।
पर वो सन्नाटा ही अब हमारी हकीकत है,
मिटे हुए अल्फाजों में ही छिपी, 
मेरी वसीयत है।
वो अनसेंड मैसेज,
मेरी रूह की एक सिसकी है।

लेखक: वैभव कुमार सेजवार 

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