बस का वो पुराना शोर,
और बाहर सन्नाटा गहरा,
शीशे पर धुंधली सी दिखी,
यादों का एक चेहरा।
कंडक्टर की सीटी,
जैसे किसी ख़्वाब को तोड़ दे,
जैसे कोई पीछे छूटा,
हाथ हवा में छोड़ दे।
पहाड़ नहीं थे रस्ते में,
पर ढलान सी महसूस हुई,
सीट के उस खालीपन में,
तुम्हारी पहचान सी महसूस हुई।
रोडवेज़ की उस लाइट में,
धूल उड़ती दिखती थी,
जैसे मेरी किस्मत भी,
उन रास्तों पर बिकती थी।
लेखक:- वैभव कुमार सेजवार
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