Thursday, February 26

सन्नाटे की गूँज (कविता)



शहर की इस भागदौड़ में जब सब शांत हो जाता है,
 तब मेरे अंदर का एक शोर अचानक जाग जाता है।
 बाहर तो सन्नाटा है,
 पर कानों में इक गूँज है,
 ख्यालों के समंदर में उठती हुई इक तरंग है।
 ये सन्नाटे की गूँज है।

 वो बातें जो दिन के उजाले में कहीं दब गई थीं,
 वो यादें जो वक्त की धूल में कहीं जम गई थीं।
 अब अंधेरी रात में वो साफ़ सुनाई देती हैं,
 खामोश दीवारों पर भी परछाइयाँ दिखाई देती हैं। अकेलेपन का संगीत है ये।

कभी ये गूँज डराती है, 
तो कभी सुकून देती है,
 बीते हुए कल की कड़वी-मीठी सी धुन देती है। 
जब कोई पास नहीं होता, 
तब खुद से मुलाकात होती है, 
सन्नाटे की ज़ुबान में,
 रूह से बात होती है।
 ये अंतर्मन का आइना है।

इस गूँज में छिपे हैं वो सवाल जिनके जवाब नहीं,
 इस सन्नाटे में सिमटे हैं वो ख्वाब जिनकी ताबीर नहीं। हम दुनिया से तो छुप सकते हैं, 
पर खुद से कहाँ जाएंगे, 
इस खामोशी की महफिल में,
 हम खुद को ही पाएंगे।
 ये सच्चाई की आवाज़ है।

सन्नाटा सिर्फ खालीपन नहीं, 
एक गहरी पुकार है, 
शोर के बाद मिलने वाला, 
मन का ही उपहार है। 
सुनो इसे ध्यान से,
 ये तुम्हें बहुत कुछ बताएगी, 
तुम्हारी असल पहचान,
 ये गूँज ही कराएगी।
 ये खामोशी का पैगाम है।

लेखक : वैभव कुमार सेजवार

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