वो लम्हे आज भी ज़हन में अक्सर लौट आते हैं,जब हम साथ थे,
वो बीते पल बहुत सताते हैं।
वो अनकही बातें,
वो गुफ़्तगू का सिलसिला,
उसकी दी हुई वो मुस्कान,
आज भी राह दिखाते हैं।
वो अहसास हाथों का,
जो मेरे हाथों में थे,
वो नज़रें,
जो सिर्फ़ मेरी ही तलाशों में थीं।
चेहरा उसका,
जो दिल के कोने में कहीं बस गया,
वो रूहानी चमक,
जो मेरी ही दुआओं में थी।
मगर अब वो पास नहीं,
वो मंजर कहीं खो गया,
हक़ीक़त की धूप में,
वो साया कहीं सो गया।
पर उसकी यादें महकती हैं,
मेरे दिल के आँगन में,
जैसे पतझड़ के बाद भी,
कोई फूल बागों में रह गया।
जब तन्हाई घेरती है,
या उदास होता है ये मन,
मैं उसकी यादों की चादर ओढ़ लेता हूँ हर क्षण।
फिर एक दबी सी मुस्कान लबों पर खिल जाती है,
क्योंकि वो पास न सही,
पर मुझमें है धड़कन बन।
लेखक :- वैभव कुमार सेजवार
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