कि धड़कनों की आवाज़ भी अब शोर में दब गई है।
सुबह उठते ही तारों का जंजाल सामने होता है,
इंसान तो जाग जाता है, पर अहसास सोता है।
पहिए घूमते हैं वक्त के, और हम साथ चलते हैं,
लोहे के इस शहर में, अरमान रोज़ ढलते हैं।
हाथों में अब मिट्टी की वो सोंधी महक नहीं आती,
डिजिटल स्क्रीन की ये चमक, रूह को नहीं भाती।
बटन दबाते ही खुशियाँ मिलने का वहम पाल लिया,
रिश्तों को भी हमने अब इनबॉक्स में डाल लिया।
थक चुके हैं पुर्जे, थिरकना भूल गए हैं पाँव,
कहाँ खो गई वो ठंडी हवा, और पीपल की छाँव?
लोहे के जिस्म में शायद दिल पत्थर का हो गया,
सपनों का वो कोमल परिंदा, कहीं दफ्तर में सो गया।
चलो इस यांत्रिक ज़माने से ज़रा बाहर निकलें,
मशीन नहीं, फिर से ज़रा इंसान बनकर निखरें।
Written & Composed by Vaibhav Kumar Sejwar
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