Tuesday, June 23

बदलती रुत का धोखा



बदलती रुत का धोखा


बदलते मौसम का अब ऐतबार क्या करना,
कभी जो धूप है तीखी, कभी है ठंडी हवा।
सहर की साज़िशें कुछ और थीं मगर देखो,
शाम होते ही बदल गया सारा का सारा समाँ।
ये बादल आए तो थे प्यास को बुझाने को,
मगर तरसा के चले गए वो बेरुखी की तरह।
हवा के झोंकों में वो पहले जैसी बात कहाँ,
जो छू के गुज़रे तो लगती है एक चुभन सी यहाँ।
क़रीब आके जो बदले वो मौसम कैसा है,
जो रंग बदलता रहे पल-पल में इंसानों सा।
भरोसा उठ गया इस आसमाँ के वादों से,
जो धूप छाँव का खेल खेलता है बेपरवाह।
ये बेवफ़ा सी रुत दिल को बहुत दुखाती है,
हँसा के पहले फिर आँसू ये दे के जाती है,
मगर ये दिल भी इसी के ही जाल में उलझा
Written & Composed by Vaibhav Kumar Sejwar

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