Sunday, March 22

सफरनामा-ए-जिंदगी


​एक खुली किताब है, ये मेरा सफरनामा-ए-जिंदगी,

जहाँ हर कदम पर है संघर्ष, और हर मोड़ पर बंदगी।

वैभव की इस दास्ताँ में, कोई पन्ना कोरा नहीं,

ज़िंदगी ने जो सिखाया, वो किसी और ने बोला नहीं।

​शुरुआत हुई थी बचपन की, उन छोटी गलियों से,

जहाँ सपने महकते थे, फूलों की कच्ची कलियों से।

फिर जवानी के सफर में, तूफानों से नाता जुड़ गया,

जहाँ से चाहा था सीधा जाना, रास्ता वहीं से मुड़ गया।

​सफरनामे में दर्ज हैं, वो रातें जो जागकर काटीं,

वो खुशियाँ जो कम थीं, पर हमने दिल खोलकर बांटीं।

कभी लगा कि सब खत्म है, अंधेरा बहुत घना है,

पर वैभव ने जाना कि हर अंधेरा, सवेरे का ही तना है।

​लिखा है इसमें उन लोगों का नाम, जो छोड़कर चले गए,

और उनका भी शुक्रिया, जो मुश्किलों में साथ पले-बढ़े।

ज़िंदगी के इस सफरनामे में, जीत से ज़्यादा हार के किस्से हैं,

क्योंकि वही हार तो, मेरी तरक्की के सबसे बड़े हिस्से हैं।

​कभी रेगिस्तान की तपिश, तो कभी पहाड़ों की ठंडक मिली,

ज़िंदगी की इस पाठशाला में, मुझे हर तरह की दस्तक मिली।

वैभव ने सीखा कि मुसाफिर का, कोई पक्का पता नहीं होता,

जहाँ सुकून मिल जाए, वहीं उसका खुदा होता।

​ये सफरनामा अभी जारी है, अभी कई पन्ने बाकी हैं,

अभी कई रास्तों की, हसीन रंगीनियां और झांकियां बाकी हैं।

स्याही मेरी हिम्मत है, और कागज़ मेरा ये हौसला है,

तय करना है अभी मुझे, बहुत बड़ा ये फासला है।

​सफरनामा-ए-जिंदगी, एक मुसाफिर की रूह की गवाही है,

जहाँ शब्दों के रूप में, बहती हुई मेरी ही सच्चाई है।

वैभव की ये यात्रा, बस चलती ही रहेगी यूँ ही,

मंज़िल मिले न मिले, सफर की खूबसूरती रहेगी यूँ ही।

​लेखक: वैभव कुमार सेजवार

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