भाग 1: जन्म और मासूमियत
शुरुआत वहाँ से होती है जहाँ कुछ नहीं था,
सिर्फ एक सन्नाटा था जो सीने में रहता था।
फिर रूह ने धड़कन से एक मशवरा किया,
और पहली बार एक 'शब्द' ने जन्म लिया।
भाग 2: उदासी का गहरा समंदर
पर वक्त की गर्द ने जब लफ्ज़ों को घेरा,
उजालों के बीच हुआ 'उदासी' का बसेरा।
वो लफ्ज़ जो कभी खिलखिलाकर हँसते थे,
अब अंधेरे कमरों के कोनों में बसते हैं।
जब लफ्ज़ 'अकेलापन' लिखना सीखते हैं,
तो समझो वो अपनी ही रूह को चीरते हैं।
भाग 3: यादों की गलियाँ और विरह
वो लफ्ज़ सबसे भारी होते हैं जो 'याद' कहलाते हैं,
आधी रात को सिरहाने आकर शोर मचाते हैं।
किसी पुराने खत की वो आखिरी अधूरी लाइन,
जैसे किसी पुराने ज़ख्म पर छिड़का हुआ नमक।
भाग 4: संघर्ष और इंकलाब
उदासियों से निकलकर जब लफ्ज़ अंगार बनते हैं,
तभी वो सोई हुई बस्तियों के पहरेदार बनते हैं।
जब कलम उठती है मज़लूमों के हक के लिए,
तब 'लफ्ज़ों की धड़कन' एक तूफ़ान बन जाती है।
भाग 5: शब्दों की अमरता
अंत में बस इतना समझ लो ए लिखने वाले,
लफ्ज़ ही हैं जो अँधेरे में जलाते हैं उजाले।
तुम रहो न रहो,
ये कागज़ गवाही देंगे,
तुम्हारी धड़कनों को ये शब्द ही पनाह देंगे।
_वैभव कुमार सेजवार_
#SejwarInkOfficial
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