चाहे रास्तों ने मुझे कितना भी परखा है।
ठोकरों ने सिखाया है चलना संभलकर,
गिरकर ही इंसान ने खुद को तराशा है।
रात चाहे कितनी भी गहरी क्यों ना हो,
सुबह ने हर अंधेरे को तोड़ा है।
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जिसने पसीने से सपनों को सींचा है,
उसने ही किस्मत का रुख मोड़ा है।
मंज़िल दूर सही, पर नामुमकिन नहीं,
हौसलों ने हर दीवार गिराई है।
मैं आज भले ही छोटा सा कदम हूँ,
पर कल मेरी ही ऊँचाई है।
*लेखक* _वैभव कुमार सेजवार_
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