Tuesday, March 10

“मैं रुकूँगा नहीं”



रुकूँगा नहीं, ये ठान लिया है,
चाहे रास्तों ने मुझे कितना भी परखा है।

ठोकरों ने सिखाया है चलना संभलकर,
गिरकर ही इंसान ने खुद को तराशा है।

रात चाहे कितनी भी गहरी क्यों ना हो,
सुबह ने हर अंधेरे को तोड़ा है।
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जिसने पसीने से सपनों को सींचा है,
उसने ही किस्मत का रुख मोड़ा है।

मंज़िल दूर सही, पर नामुमकिन नहीं,
हौसलों ने हर दीवार गिराई है।

मैं आज भले ही छोटा सा कदम हूँ,
पर कल मेरी ही ऊँचाई है।

*लेखक* _वैभव कुमार सेजवार_

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कुछ लोग बिछड़कर भी अपने रह जाते हैं...

कुछ लोग बिछड़कर भी अपने रह जाते हैं... हर प्रेम... मंज़िल तक पहुँचे... यह ज़रूरी नहीं होता... कुछ प्रेम... रास्तों में बिछड़कर भी... उम्र भर...