कभी तुम मेरी बातों में बसती थीं,
मेरे हर ख्वाब की शुरुआत तुमसे होती थी,
सुबह की पहली मुस्कान में तुम्हारा नाम होता था,
और रात की आखिरी सोच भी तुम ही होती थीं।
मैंने सोचा था, ये रिश्ता वक्त से भी लंबा होगा,
जैसे नदी समंदर से मिलने के लिए बनी हो,
वैसे ही मेरी हर राह तुम्हारी तरफ मुड़ती थी,
जैसे मेरी हर धड़कन तुम्हारे नाम लिखी हो।
पर एक दिन सब कुछ बदल गया,
बातें वही थीं मगर एहसास नहीं रहे,
आँखें वही थीं मगर अपनापन नहीं रहा,
और तुम पास होकर भी मेरे नहीं रहे।
मैं समझ नहीं पाया आखिर गलती कहाँ थी,
क्या मेरी मोहब्बत कम थी या किस्मत रूठी थी,
मैं तो हर बार दिल से तुम्हें चुनता रहा,
पर शायद तुम्हारी राह कहीं और मुड़ी थी।
अब जब रात गहरी होती है और दुनिया सो जाती है,
तब मेरी यादें धीरे-धीरे जाग जाती हैं,
तुम्हारी हँसी, तुम्हारी बातें, वो छोटे-छोटे पल,
सब मेरे दिल के दरवाज़े पर दस्तक दे जाती हैं।
कभी लगता है काश तुम लौट आओ,
फिर खुद ही अपने दिल को समझा लेता हूँ,
जो इंसान सच में अपना होता है,
वो छोड़कर इतनी दूर नहीं जाता।
अब मैं चुप रहना सीख गया हूँ,
दर्द को शब्दों में छिपाना सीख गया हूँ,
लोग कहते हैं मैं पहले जैसा नहीं रहा,
शायद इसलिए कि अब मैं टूटकर भी मुस्कुराना सीख गया हूँ।
क्योंकि सच यही है कि मोहब्बत हमेशा साथ नहीं रहती,
कभी-कभी वो बस एक कहानी बन जाती है,
जिसे इंसान अपनी यादों की किताब में रख देता है,
और फिर पूरी जिंदगी धीरे-धीरे पढ़ता रहता है।
और मैं भी अब वही कर रहा हूँ…
तुम्हें भूल नहीं रहा, बस तुम्हें एक कहानी बना रहा हूँ,
ताकि जब कभी दिल बहुत चुप हो जाए,
तो तुम्हारी यादों से दो पल बात कर सकूँ।
*लेखक* _वैभव कुमार सेजवार_
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