भीड़ में भी आज कुछ तन्हा सा हूँ,
हँस तो रहा हूँ, पर अंदर से चुप सा हूँ।
लोग पूछते हैं, “सब ठीक है ना?”
मैं कह देता हूँ “हाँ”… पर सच में टूट सा हूँ।
कुछ सपने थे, जो अधूरे रह गए,
कुछ अपने थे, जो दूर कहीं बह गए।
वक़्त ने सिखाया मुस्कुराना,
पर दर्द दिल में ही सह गए।
रातों से अब दोस्ती सी हो गई है,
चाँद भी मेरा हाल समझता है।
मैं किसी से कुछ कहता नहीं,
पर कागज़ सब कुछ सुनता है।
शायद ये दौर भी गुज़र जाएगा,
शायद फिर से दिल मुस्कुराएगा…
पर आज की इस खामोशी में,
मैं खुद को थोड़ा और समझ पाऊँगा।
_वैभव कुमार सेजवार_
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