Sunday, March 22

मौन के अक्षर



जबान से जो नहीं निकला, 
वो रूह में ठहर गया, 
एक अनकहा एहसास, 
कागज़ के पन्नों पर निखर गया। 
शब्दों की दुनिया में शोर बहुत , 
पर मौन की गलियों में मेरा घर बहुत था।


सुनो! क्या तुम्हें सुनाई देती है ये खामोशी? 
इसमें छिपी है दुनिया की सबसे बड़ी सरगोशी। 
पत्तों का गिरना, 
ओस का ठहरना, 
रातों का ढलना, 
ये खामोशी ही तो है, 
जो सिखाती है हमें संभलना।


कभी-कभी रिश्तों में, 
मौन सबसे बड़ा शोर होता है, 
जब शब्द कम पड़ जाएं, 
तो दिल का दर्द जोर होता है। 
दो लोगों का साथ बैठना, 
बिना किसी बात के, 
खामोशी में घुलना, 
जैसे लहरों का हो रात के।


भीड़ के बीच भी, 
एक तन्हाई का डेरा है, 
शहर की भागदौड़ में, 
ये मौन का ही घेरा है। 
लोग बोलते तो हैं, 
पर दिल से दिल तक नहीं पहुँचते, 
खामोश रहकर ही, 
हम अपनी रूह की गहराइयों तक पहुँचते।


रात की चादर में लिपटी ये खामोशी की महफिल, 
जैसे खुद से खुद का ही हो कोई मुकम्मल हासिल। 
तारे गवाही देते हैं, 
इस चुप के संगीत की, 
ये रात ही तो है, 
रक्षक हमारी प्रेम-प्रीत की।


जब मैं चुप होता हूँ, 
तो अपने करीब होता हूँ, 
भीड़भाड़ के शोर में, 
मैं न जाने कहाँ खोता हूँ। 
खामोशी में ही मिलता है, 
वजूद का असल पता, 
ये चुप ही है, 
जो काटती है मेरे हर गम की खता।


शब्द खत्म हो जाएंगे, 
किताब बंद हो जाएगी, 
पर ये खामोशी, 
सदियों तक याद दिलाई जाएगी। 
क्योंकि जिसे शब्दों ने नहीं कहा, 
उसे चुप ने कह दिया, 
जो था अधूरा जीवन, 
उसे खामोशी ने पूरा कर दिया।


खामोशी में कभी-कभी यादें तैरती हैं, 
जैसे किसी ठहरी हुई झील में, 
लहरें खुद से लड़ती हैं। 
पुरानी यादों का बोझ जब शब्दों से संभाला न जाए, 
तो खामोशी ही है, 
जो मरहम बनकर आ जाए।


पहाड़ों की चोटियों पर, 
जहाँ हवा भी रुक जाती है, 
वहाँ खामोशी, 
अपनी एक नई धुन सुनाती है। 
प्रकृति शोर नहीं करती, 
वो बस 'होती' है, 
और इसी होने के एहसास में, 
रूह सोती है।


जब दुनिया शोर मचाती है, 
तो मैं खामोश हो जाता हूँ। 
ये मौन हार नहीं, 
ये मेरा 'संकल्प' है। 
अक्सर जो शेर खामोश रहते हैं, 
वही शिकार करते हैं।


आखिरकार, सब कुछ खामोशी में ही विलीन होना है। जन्म से पहले भी मौन था, 
मृत्यु के बाद भी मौन होगा। 
खामोशी में ही पूर्णता है, 
खामोशी में ही अनंत है।

_वैभव कुमार सेजवार_
#SejwarInkOfficial

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