यहाँ यादों की महफ़िल में,
हर एक लम्हा पराया है,
जिसे अपना कहा हमने,
वही बस एक साया है।
हवाओं के थपेड़ों से,
जो दीपक बुझ नहीं पाया,
उसी ने रात के सीने,
में अपना घर बनाया है॥
कि जैसे झील के पानी,
में हलचल शांत होती है,
कि जैसे सीप के अंदर,
छुपा इक मंत (मोती) होती है।
दिखावे की चमक से तुम,
कभी धोखा नहीं खाना, सच्चाई सदा मन के,
किसी कोने में सोती है॥
ज़माने की शिकायतों से,
किनारा कर लिया हमने,
अकेलेपन की रातों से,
गुज़ारा कर लिया हमने।
जो कल तक अजनबी थे अब,
वही हमराज़ लगते हैं,
कि ख़ुद को आज ख़ुद का ही,
सहारा कर लिया हमने॥
पुराने ज़ख्म को कुरेदो,
तो फिर से दर्द होता है,
मगर जो हँस के सह जाए,
वही तो मर्द होता है।
सफर में धूल उड़ती है,
तो आँखों को मूँद लो तुम,
कि मंज़िल पाने वालों का,
जुदा ही गर्द होता है॥
यही है ज़िंदगी की रीत,
कि पल-पल मुस्कुराना है,
भले ही गम का दरिया हो,
किनारे तक तो जाना है।
मिटा दो नफरतें दिल से,
मुहब्बत ही हकीकत है,
इसी पैगाम को अब तो,
ज़माने को सुनाना है॥
_वैभव कुमार सेजवार_
#SejwarInkOfficial
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