मिट्टी की वो सोंधी खुशबू,
वो बारिश का पानी,
याद आती है बहुत,
वो बचपन की कहानी।
न कल की फिकर थी,
न आज का था गम,
बस खिलौनों की दुनिया में,
राजा थे हम।
काँधे पर बस्ते का बोझ,
अब भारी सा लगता है,
वो कागज की कश्ती का दौर,
अब प्यारा सा लगता है।
दौड़ते थे नंगे पाँव,
तपती हुई उन गलियों में,
सुकून ढूंढते थे हम,
महकती हुई कलियों में।
अब तो बस मतलब के रिश्ते और दुनिया की बातें हैं,
बिना लोरी के कटती,
अब ये लंबी रातें हैं।
काश! फिर से वही बेफिक्री का ज़माना आए,
कोई फिर से मुझे,
वो प्यारा सा बचपन लौटाए।
_वैभव कुमार सेजवार_
#SejwarInkOfficial
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