Sunday, March 22

राहों के रंग


​राहों के भी अपने रंग हैं, 
अपनी एक अलग जुबान है,
कहीं मखमली घास है, 
तो कहीं पथरीला श्मशान है।

सुबह की पहली किरण जब, 
कच्ची सड़क पर पड़ती है,
तब सुनहरी धूल की चादर, 
जैसे रूह से लिपटती है।

​हरे भरे खेतों के बीच से, 
जब पगडंडी गुजरती है,
जिंदगी की सारी थकान, 
जैसे मिट्टी में उतरती है।

नीला आसमान ऊपर, 
और नीचे भूरी सी ये राह,
मुसाफिर को मिल जाती है, 
कुदरत की एक पनाह।

​शाम का नारंगी रंग, 
जब क्षितिज पर बिखरता है,
रास्तों का हर मोड़ तब, 
एक नई दुल्हन सा संवरता है।

काली पिच वाली सड़कें, 
जो रात में चमकती हैं,
जैसे अंधेरे में जुगनू की, 
आंखें अचानक दमकती हैं।

​लाल मिट्टी का वो रास्ता, 
जो गाँव की ओर जाता है,
बचपन की उन यादों से, 
गहरा नाता जोड़ जाता है।

बर्फीले रास्तों की सफेदी, 
जो खामोशी सिखाती है,
इंसान के भीतर की हलचल को, 
चुपचाप दबाती है।

​कहीं रास्तों पर उदासी का, 
गहरा स्लेटी रंग छाया है,
जहाँ किसी मुसाफिर ने, 
अपना सब कुछ गंवाया है।

मगर कहीं खुशियों का पीला, 
सरसों जैसा खिलता है, 
जहाँ हर थके हुए राही को, 
नया हौसला मिलता है।

​राहों के इन रंगों में, 
मेरी जिंदगी की तस्वीर है,
हर मोड़ पर बदली हुई, 
मेरी अपनी ही तकदीर है।

रंगों का ये मेला, 
आँखों को सुकून देता है,
मुसाफिर को हर पल, 
एक नया जुनून देता है।

​ये रंग बताते हैं कि, 
जिंदगी एक सादा कैनवास नहीं,
इसमें हर रंग का होना, 
कोई इत्तेफाक या प्यास नहीं।

मैं भी एक रंग हूँ, 
जो इन राहों में घुल गया हूँ,
वैभव बनकर मैं आज, 
खुद की तलाश में खुल गया हूँ।

​लेखक: वैभव कुमार सेजवार
SejwarInkOfficial

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