मैंने तो दिल के दरवाज़े,
तेरे लिए ही खोले थे,
हर एक आंसू, हर एक खुशी,
बस तुझसे ही बोले थे।
पर क्या पता था जिस हाथ को,
मैंने थाम रखा है,
उसी ने पीठ के पीछे,
खंजर भी नाम रखा है।
कांच सा नाज़ुक था यकीन,
तुमने पल में तोड़ दिया,
भरी राह में तन्हा मुझे,
बीच सफ़र में छोड़ दिया।
अब शिकायतों का दौर नहीं,
बस एक खामोश सन्नाटा है,
ज़िंदगी ने वफ़ा के बदले,
आज ज़ख्म गहरा बांटा है।
लोग कहते हैं संभल जाओ,
ज़माना बड़ा बेगाना है,
पर अपनों से मिले धोखे को,
भला किसने जाना है?
अब आंखों में वो चमक नहीं,
बस एक गहरी नमी है,
तुम तो पास हो शायद,
पर अब उस 'भरोसे' की कमी है।
सीख लिया है अब मैंने भी,
खुद की लौ में जलना,
गैरों की बाहों के बदले,
तन्हाई में संभलना।
धोखा देकर तुमने शायद,
खुद को बड़ा पाया होगा,
पर खोया है वो इंसान,
जो तुम पर जान लुटाया होगा।
_वैभव कुमार सेजवार_
#SejwarInkOfficial
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